नगा विद्रोहियों को क्या दे सकती है सरकार
- शशिधर खान
भारतीय आजादी के ‘अमृत महोत्सव’माहौल में नगा विद्रोहियों का अलग ‘झंडा और अलग संविधान’का हठ विष घोल रहा है । यह मांग पूरी करना भारत सरकार के लिए वर्तमान संवैधानिक ढांचे में असंभव है । अपना अलग संविधान और झंडा स्वतंत्र संप्रभु देश का होता है । नगा विद्रोही खुद को भारत का नागरिक नहीं मानते हैं । नगालैंड के सबसे मजबूत और पुराने नगा विद्रोही संगठन नेशनल सोसलिस्ट काउंसिल और नगालैंड (आइसाक-मुइवा-आईएमगुट) भूमिगत समानान्तर ‘फेडरल गवर्नमेंट ऑफ सोसलिस्ट नगालिम’का दावा करता है, जिसके स्वंयभू ‘प्रधानमंत्री’हैं, टी. मुइवा । स्वयंभू राष्ट्रपति थे आइसाक चिशी स्वू, जिनकी 2016 में मृत्यु हो गयी । इस संगठन के सुप्रीम कमांडर और संचालक टी- मुइवा हैं, जो केंद्र सरकार से हुए समझौतों को भारत सरकार और नगालिम सरकार के बीच की डील बताते हैं । उनके अखबार ‘वॉयस ऑफ नगालिम’में वार्ता को भी दो देशों की बातचीत कह के छापा जाता है । नगा विद्रोही नेताओं को अलग ‘झंडा और अलग संविधान’तभी मिल सकता है, जब भारत की तरह नगाओं का भी ‘स्वतंत्र संप्रभु’नगालिम देश के रूप में अस्तित्व भारत सरकार स्वीकारे । यह तभी संभव है, जब पूर्वोत्तर क्षेत्र के नगा आबादी वाले सारे इलाके भारत सरकार नगा विद्रोहियों के हाथ में सौंपकर उसका संवैधानिक शासक फेडरल नगालिम सरकार को मान ले । इस आशय का समझौता कभी नहीं हो सकता । वार्ता के कितने भी दौर चलें, कितने भी फ्रेमवर्क डील संघर्षविराम सहमति को बरस-दर-बरस खींचते हुए क्यों न हो जाएं, भारत सरकार नगाओं की यह मांग पूरी नहीं कर सकती ।
उस समय से अब तक कई फेरबदल हो गए । आर. एन. रवि को नगालैंड से हटाकर तमिलनाडु का राज्यपाल बना दिया गया । रवि की जगह नगा वार्ताकार अक्षय मिश्रा को नियुक्त कर दिया गया । अक्षय मिश्रा भी रिटायर खुफिया प्रमुख हैं, जो जनवरी, २०२० से नगा नेताओं से वार्ता चला रहे हैं । 1997 के पहले से चल रही बेनतीजा वार्ताओं के तकरीबन 100 दौर हो चुके हैं और बातचीत-मुलाकात जारी है । इतने वर्षों में स्थायी तो क्या कामचलाऊ अस्थायी समाधान तक भी नहीं पहुंचा जा सका । 1997 की संघर्षविराम सहमति की तरह 2015 की ‘फ्रेमवर्क डील’भी उसी सहमति की अगली कड़ी अर्थात् समाधान के प्रयास में एक कदम आगे मात्र है । यह डील भी कोई समझौता नहीं है । एनएससीएन (आईएम) नेता मुइवा ‘अलग झंडा और अलग संविधान’की मांग पर अड़े हैं । उनके संगठन के अनुसार ‘डील’के अनुसार प्रस्तावित ‘ग्रेटर नगालिम’की यही पहचान है, जिसका अस्तित्व भारत के संघीय ढांचे से ‘अलग स्वतंत्र’होगा । भारत सरकार नगाओं की यह मांग संविधान संशोधन तो क्या, नया कानून बनाकर भी पूरी नहीं कर सकती । यह बात नगा नेता बखूबी समझते हैं ।
ऐसे में, जब जम्मू व कश्मीर जैसे विशेष संवैधानिक दर्जा प्राप्त राज्य की ‘अलग झंडा और अलग संविधान’वाली एक देश दो व्यवस्था भारत सरकार ने समाप्त कर दी नगा नेताओं को अपने अड़ियल रवैए की जमीनी हकीकत समझनी होगी ।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गत हफ्ते अपने कश्मीर दौरे के क्फ़्रम में एक प्रकार से नगा नेताओं को भी कड़ा और स्पष्ट संदेश दिया । अमित शाह ने जम्मू में श्यामा प्रसाद मुखर्जी और प्रेमनाथ डोगरा को याद करते हुए कहा कि इन दोनों नेताओं ने 1950 के दशक में नारा दिया था कि एक ही देश में दो झंडा दो संविधान तथा दो शासक जैसी व्यवस्था नहीं चल सकती । इन दोनों नेताओं ने इसके लिए आंदोलन चलाया । श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 1953 में जम्मू व कश्मीर पुलिस हिरासत में ही मौत हुई । केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जोर देकर कहा कि ‘05/08/2019 को जम्मू व कश्मीर की ‘अलग झंडा और अलग संविधान’जैसी विशेष व्यवस्था वाली धारा-370 खत्म करके हमने श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सपने को साकार किया ।’इस जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन एक्ट, २०१९ के लागू होने के बाद यह राज्य पूरी तरह भारतीय संवैधानिक ढांचे के अंतर्गत आ गया । अमित शाह का धारा-370 खत्म होने के बाद कश्मीर का यह पहला दौरा था । गत हफ्ते वे तीन दिन कश्मीर में रहे ।
उसके हफ्ते भर पहले अर्थात् १५ से २० अक्टूबर के बीच नगा वार्ताकार अक्षय मिश्रा ने नगा नेताओं को दिल्ली बुलाकर बातचीत की । एनएससीएन (आईएम) समेत कोई नगा गुट ‘अलग झंडा और अलग संविधान’वाला हठ छोड़ने को राजी नहीं हुए । वार्ताकार बनने के बाद अक्षय मिश्रा ने पहली बार नगा गुटों से दिल्ली में अक्टूबर, २०२१ में वार्ता की । उनका मिलना-जुलना जनवरी, २०२० से जारी है ।
अभी अक्टूबर, २०२१ में गृहमंत्री अमित शाह को कश्मीर जाने से पहले नगा वार्ता में ‘अलग झंडा, अलग संविधान’वाले गतिरोध का फीडबैक निश्चित ही मिल चुका होगा । वार्ताकार अक्षय मिश्रा के साथ दिल्ली की मुलाकात में सात नगा गुटों के संयुक्त मंच एनएनपीजी (नगा नेशनल पोलिटिकल ग्रुप) के प्रतिनिधि शामिल थे । इस बात पर संशय बना रहा कि इसमें हार्डलाइनर एनएससीएन (आईएम) गुट का कोई प्रतिनिधि शामिल था या नहीं । एनएनपीजी प्रतिनिधियों के कोहिमा लौटने के कुछ दिन बाद एनएससीएन (आईएम) की ओर से संदेश जारी हुआ कि नगा संगठन के रवैए में कोई बदलाव नहीं आया है और इस शर्त पर कायम है ।
३१ अक्टूबर, २०१९ की डेडलाईन फेल होने के बाद नगालैंड के राज्यपाल आर. एन. रवि ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर सार्वजनिक रूप से कहा कि ‘सशस्त्र नगा गिरोहों की समानान्तर सरकार चल रही है और वे सरकार की तरह समानान्तर टैक्स वसूली करते हैं ।’मुख्यमंत्री को यह बात अखर गयी । क्योंकि वे खुद और भाजपा समेत अन्य दलों के विधायक भी नगा गुटों के समर्थन के बिना चुनाव नहीं जीत सकते । नगा नेता बिफर उठे । आर. एन. रवि से वार्ता बंद हो गयी । उन्हें राज्यपाल पद से हटाए जाने को नगा नेताओं ने अपनी ‘जीत’बताया ।
नगा गुट दावा करते हैं कि उनके नेता अंगामी जापु फिजो ने भारत की आजादी से एक दिन पहले १४ अगस्त, 1947 को ही नगा आजादी का एलान कर दिया । फिजो के संगठन नगा नेशनल काउंसिल (एनएनसी) से अलग होकर एनएससीएन (आईएम) बना । इसके नेतृत्व में नगा संगठनों को वो हकीकत भी नहीं भूलनी चाहिए जो भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने विद्रोही फिजो को 1952 में कहा था - ‘नगाओं को आजाद नगालिम मैं तो क्या भारत का कोई भी प्रधानमंत्री नहीं दे सकता ।’ Archive quality note: This text is readable and verified for publication, but minor Unicode or source-quality imperfections may remain.
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Internal Security Nagaland
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