मणिपुर चुनाव अन्य राज्यों से जरा अलग



                                                                                             - शशिधर खान

	

		

पांच राज्यों में हो रहे चुनावों में मणिपुर का चुनाव अन्य राज्यों के मुकाबले कई माएने में बिल्कुल अलग है । पंजाब, गोवा, उत्तराखंड में मतदान संपन्न होने और उत्तर प्रदेश में मतदान का अंतिम चरण करीब आने के बाद राष्ट्रीय दलों के नेताओं का ध्यान मणिपुर की ओर गया । पूर्वोत्तर भारत के सबसे ज्यादा उग्रवाद प्रभावित मणिपुर की 60 विधान सभा सीटों के लिए चुनाव आयेाग को दो चरणों में मतदान की व्यवस्था करनी पड़ी । पहले चरण का मतदान 28 फरवरी को है । इसलिए उसके एक सप्ताह पूर्व वहां चुनाव प्रचार अभियान तेज हो गया । 

	लेकिन मणिपुर का चुनाव और वहां के मुद्दे अन्य राज्यों की तुलना में सर्वथा भिन्न है । सियासी राजनीतिक दृष्टि से रोचक ही नहीं, विचित्र भी है । 

मणिपुर में यह पहला चुनाव है, जहां एक ओर कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए मुख्यमंत्री एन॰ वीरेन सिंह की दलबदल सरकार की कांग्रेस छोड़ो राजनीति दांव पर लगी है । दूसरी ओर कांग्रेस को अपना पुराना जनाधार बचाने की फिक्र है । फुटबाल चैम्पियन रहे वीरेन सिंह ने बिना जनाधार के सिर्फ कांग्रेस विधायकों को फोड़-फोड़कर पांच साल तक भाजपा सरकार को गिरने नहीं दिया । सफल दल-बदल चैम्पियन का भाजपा मुख्यमंत्री के रूप में पहला रिकार्ड बनानेवाले एन॰ वीरेन सिंह के सारे दांव पेंच कसौटी पर है । मणिपुर के मतदाताओं ने दलबदलू विधायकों को स्वीकारा या नहीं, इसकी जांच-परख होनी है । कांग्रेस को इस बात की फिक्फ़्र है कि उसके जनाधार का सियासी फायदा भाजपा दोबारा न उठा लें । 

2017 चुनाव में मणिपुर की कुल 60 सीटों में से 28 सीटें कांग्रेस ने जीती और अकेली सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी । भाजपा को २१ सीटें मिली और जीतनेवाले अधिकांश उम्मीदवार कांग्रेस से भाजपा में आए थे या लाए गए थे । ओकराम इबोबी सिंह के नेतृत्व में १५ साल से कायम कांग्रेस सरकार को किसी भी हालत में सत्ता में नहीं आने देना था और भाजपा को मणिपुर में पहली सरकार बनानी थी । खुद एन॰ वीरेन सिंह चुनाव से कुछ महीने पहले इबोबी सिंह का साथ छोड़कर भाजपा में आए थे । 

कायदे से देखा जाए तो 2017 का जनादेश भाजपा के पक्ष में नहीं गया था । भाजपा को सरकार बनाने का दावा करने के लिए 10 सीटों की जरूरत थी । जबकि कांग्रेस को बहुमत के लिए सिर्फ 3 सीटें कम पड़ रही थी । लेकिन राज्यपाल नजमा हेपतुल्ला ने कांग्रेस विधायकों को फोड़ने का भाजपा को अवसर दिया और 10 सीटें जुटाकर एन॰ वीरेन सिंह मुख्यमंत्री बन गए । समर्थन जुटाने में मुख्य भूमिका निभानेवाले कांग्रेस के टिकट पर जीते विधायक श्याम कुमार सिंह को मंत्री बना दिया गया, जो भाजपा में शामिल हो गए । 

एक कांग्रेस विधायक ने श्याम कुमार सिंह और उनके साथ भाजपा का साथ देनेवाले कांग्रेस विधायकों के खिलाफ अयोग्य घोषित करने की अर्जी स्पीकर वाई॰ खेमचंद के पास लगायी । स्पीकर ने उस पर विचार ही नहीं किया । मामला मणिुपर हाईकोर्ट गया, फिर सुप्रीम कोर्ट गया । भाजपा ने अपने कार्यकाल के तीन साल सुप्रीम कोर्ट में कैफियत देने में गुजार दिए । दलबदल वाले विधायकों पर निर्णय टालते रहे और सरकार बचाए रखा । मार्च, २०२० में सुप्रीम कोर्ट ने आखिकार श्याम कुमार सिंह को विधान सभा में प्रवेश करने से रोक दिया और मंत्रीपद से भी हटा दिया । सुप्रीम कोर्ट ने अन्य सात विधायकों पर भी निर्णय टालने के लिए स्पीकर को फटकार लगायी और एक निश्चित समय सीमा के अंदर निर्णय लेने कहा । आखिरकार मणिपुर हाईकोर्ट ने ही सातों विधायकों को भी विधान सभा में प्रवेश पर रोक लगा दी । इतनी जद्दोजहद के बाद इन विधायकों की सदस्यता समाप्त हुई । लेकिन यह सियासी धींगाकुश्ती अगला चुनाव करीब आने अर्थात् दिसंबर, २०२१ तक चलती रही । स्पीकर ने तीन कांग्रेस विधायकों को जून, २०२० में अयोग्य घोषित कर दिया, जो भाजपा में शामिल होने के बावजूद राज्य सभा के लिए भाजपा उम्मीदवार के समर्थन में वोट नहीं डाला । विधायकों ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जहां स्पीकर के निर्णय को 08/12/2021 को निरस्त कर दिया गया । 

आज की तारीख में कांग्रेस के पास 28 में से सिर्फ 13 सीटें रह गयी हैं । मणिपुर की चुनावी रूपरेखा कोई राजनीतिक पार्टी तय नहीं कर पाती । राष्ट्रीय दलों में सिर्फ कांग्रेस और भाजपा हैं, जो दोनों मणिपुर के असली मुद्दे को ज्यादा महत्व नहीं दे रहे हैं । मणिपुर में चुनाव का नाप-तौल वहां के जनजातीय बहुल मतदाताओं के क्षेत्रीय मुद्दे, संस्कृति और उग्रवादी गुटों का प्रभाव तय करता है । 

इन सब मुद्दों को साथ लेकर चलनेवाली नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) ने भाजपा का सहयोगी दल होने के बावजूद अपना अलग चुनाव घोषणापत्र सबसे पहले २३ जनवरी को जारी किया । मणिपुर में सबसे ज्यादा विवादास्पद बने आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट (आफ्स्पा) हटाने का वायदा एनपीपी घोषणापत्र में पहले नंबर पर है । 

भाजपा गठजोड़ सरकार में एनपीपी के चार मंत्री हैं । इन चारों विधायकों ने भी जून, २०२० में समर्थन वापस लेकर सरकार को अल्पमत में ला दिया । इन्हें मंत्री बनाकर सरकार बचायी गयी । 

17 फरवरी, २०२२ को भाजपा अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा ने इंफाल में जारी अपने चुनाव घोषणापत्र में आफ्स्पा का कोई जिक्र नहीं किया । जबकि चुनाव तारीखों के एलान से पहले आफ्स्पा हटाने की बात करते थे । 

5/02/2022 को वरिष्ठ कांग्रेस नेता जयराम रमेश भी मणिपुर पहुंचे । ६ वामदलों को मिलाकर ‘मणिपुर प्रोग्रेसिव सेक्युलर एलायंस’के चुनावी गठजोड़ के साथ चुनाव घोषणापत्र जारी किया, लेकिन आफ्स्पा का नाम नहीं लिया । 


13 नबंवर, २०२१ को मणिपुर की म्यांमार से लगी सीमा के पास उग्रवादियों ने घात लगाकर असम राइफल्स के एक काफिले पर हमला करके कमांडिंग ऑफीसर कर्नल विप्लव त्रिपाठी को परिवार समेत मार दिया । उनके साथ चार जवान भी मारे गए । 04/06/2018 के बाद का वो पहला बड़ा उग्रवादी हमला था । जून’ २०१८ वाले हमला चंदेल जिले में हुआ, जिसमें सेना के 18 जवान शहीद हुए । 



प्रधानमंत्री ने इंफाल पूर्व में सही कहा कि उग्रवाद और आर्थिक नाकेबंदी पर काबू पा लिया गया है । लेकिन उनके पहुंचने से दो दिन पहले २० फरवरी को इंफाल के ही ककचिंग जिले में उग्रवादी बिस्फोट में भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के 2 जवान मारे गए । उग्रवादियों की संयुक्त समन्वय समिति ने विरोध में ‘शटडाउन’का एलान कर रखा था । 

उसके पहले १४ फरवरी को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उग्रवादी गुटों को इंफाल पश्चिम की रैली में वार्ता के लिए आमंत्रित किया ।

राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने 13/11/2021 के उग्रवादी हमले में शामिल गुट पीएलए और मणिपुर नगा पीपुल्स फ्रंट का सुराग देने के लिए 06/01/2022 को 50 लाख इनाम का एलान किया । लेकिन उम्मीद कम है कि एक बच्चा भी मुखबिरी करेगा । 04/12/2021 को नगालैंड हमले में असम राइफल्स फायरिंग घटना की जांच का काम डंप है । मारे गए कोयला खान मजदूर मणिपुर के मूल निवासी थे । 

मणिपुर में महिलाएं परिवार समाज चलाती हैं । पांच चुनाव क्षेत्रों के अधिकांश बूथों के संचालन का काम चुनाव आयोग ने महिलाओं को सौंपा है । लेकिन किसी भी दल ने उम्मीदवारों की सूची में महिलाओं को ज्यादा अहमियत नहीं दी । 

याद रहे ‘लौह महिला’के नाम से मशहूर इरोम शर्मिला ने आफ्स्पा हटाने की मांग को लेकर 2000 से 2016 तक अनशन 32 जन संगठनों के संयुक्त मंच ‘अपुन्बा लुप’के अधिकांश महिला कर्यकर्ताओं के समर्थन से किया ।