मणिपुर शांति प्रयास में पीछे झांकना जरूरी

                                                                                      - शशिधर खान

	



विभिन्न जनजातीय समुदायों के आपसी संघर्ष के कारण जटिल विवादों से पटे मणिपुर में सामाजिक समन्वय और सद्भाव का नया संदेश केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने चार दिन वहां रहकर दिया । समूचे पूर्वोत्तर समेत देश के अन्य हिस्सों में भी विवादित हिंसाग्रस्त मणिपुर में शांति के इस प्रयास की सराहना हो रही है । यहां तक कि सरकार के हर कदम की सिर्फ निंदा करने के सिद्धांत पर चलनेवाले विपक्षी दलों को भी नकारात्मक टिप्पणी का कोई विंदु नहीं मिल रहा है । मणिपुर में उग्रवादी हिंसा कोई नयी बात नहीं है । लेकिन कई महीनों से बेकाबू चल रही मौजूदा हिंसा में कानून और व्यवस्था के रखवाले ही खुल्लमखुल्ला भेदभावपूर्ण रवैया अपनाकर सामाजिक तनाव बढ़ा रहे हैं । इसमें निर्वाचित सरकार की राजनीति में अदालत के कथित योगदान के कारण भी सामान्य स्थिति बहाली में बाधा आ रही है । ऐसा शायद पहली बार हुआ है, जब जातीय हिंसा को बढ़ावा देने में राज्य सरकार और हाईकोर्ट खुद पक्षकार हो । 

यह भी पहले कभी देखने-सुनने को मिला कि किसी केंद्रीय गृह मंत्री ने सुरक्षा बलों के बजाए समाज के सभी वर्गों को विश्वास में लेने के प्रयास को शांति का हथियार बनाया हो । अमित शाह जातीय हिंसा से लेकर बेघर हुए कुकी समुदाय के शरणार्थी शिविरों में भी गए, उनका दुख-दर्द सुना । जनजातीय संगठनों के प्रतिनिधिमंडल के अलावे मेइती और कुकी प्रतिनिधियों से भी मिले । अमित शाह की अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री एन॰ बीरेन सिंह गृह मंत्री की हर भेंट-मुलाकात में उनके साथ नहीं रहे । केंद्रीय गृह मंत्री को हालात का जायजा लेने के बाद कहना पड़ा की मणिपुर हाईकोर्ट के जल्दबाजी में जारी आदेश के कारण हिंसा फैली । लेकिन अपने मुख्यमंत्री की करतूतों पर अमित शाह चुप्पी साधे रहे । मणिपुर के मुख्यमंत्री एन॰ बीरेन सिंह मेइती और कुकी-जोमी संघर्ष को लगातार उग्रवादी हिंसा बताकर इसके लिए कुकी समुदाय को दोषी ठहरा रहे हैं । जबकि रक्षा स्टाफ प्रमुख    (सीडीएस) अनिल चौहान ने मणिपुर का दौरा करने के बाद स्पष्ट कर दिया किया कि यह पूरी तरह जातीय हिंसा है और इसका उग्रवादी हिंसा से कोई ताल्लुक नहीं है । 


३१ मई को अपने दौरे के तीसरे दिन केंद्रीय गृह मंत्री ने इंफाल में हिंसा की जांच के लिए रिटायर हाईकोर्ट चीफ जस्टिस की अध्यक्षता में न्यायिक आयोग गठित करने का एलान किया । उसके पहले गृहमंत्री ने कुकी बहुल आबादीवाले चूराचन्द्रपुर जिले में सिविल सोसायटी गुटों से मुलाकात के दौरान १५ दिनों की शांति की अपील करते लुटे गए हथियार सौंपने कहा । 

३१ मई को ही दिल्ली में ‘जनजातीय एकजुटता विरोध’प्रदर्शन के दौरान मणिपुर ट्राइवल्स फोरम दिल्ली (एनटीएफडी) महासचिव डब्ल्यू॰ एन॰ हांजसिंग इस जातीय हिंसा में मणिपुर मुख्यमंत्री और भाजपा सांसद लेशेम्बा सानाजओबा की भूमिका की जांच सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में विशेष जांच दल (एनआईटी) से कराने की मांग कर रहे थे । इस संगठन के नेताओं ने हिंसा के लिए मेइती ‘उग्रवादियों’को दोषी ठहराया । 30 मई को अमित शाह के समस्या के समाधान के लिए एक मौका के रूप में १५ दिनों की शांति और पुलिस से लूटे गए हथियार सौंपने की अपील से कोई खास असर की खबर नहीं है । केंद्रीय गृहमंत्री ने सेना और अर्द्धसैनिक बलों को एलर्ट रखा है । 

उन्होंने कुकी उग्रवादियों को अलग से कड़ी चेतावनी दी । 30 मई को ही रक्षा स्टाफ प्रमुख अनिल चौहान ने कहा कि मणिपुर की समस्या पूरी तरह जातीय हिंसा की है, यह कानून व व्यवस्था जैसी स्थिति है और इसका उग्रवादी हिंसा से कोई लेना-देना नहीं है । इतनी सारी प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद गृह मंत्री ने हिंसा पर काबू पाने का जिम्मा सिर्फ सुरक्षा बलों पर नहीं छोड़, जैसा मणिपुर में होता रहा है और अन्यत्र भी होता है । अमित शाह ने लोगों को विश्वास में लेने और सरकार के प्रति भरोसा दिलाने के लिए राज्य सरकार की कथित ‘पक्षपातपूर्ण’नीति से अलग एक नया समन्वय फार्मूला निकाला । 

केंद्रीय गृह मंत्री ने १५ दिनों में शांति के लिए एक शांति कमिटी बनायी, जिसमें सभी समुदाय के प्रतिनिधियों को शामिल किया । उनके दिल्ली लौटने के बाद कमिटी की बैठक सार्थक  रही । 

3 मई से दोबारा उफनी हिंसा का जायजा लेने गृहमंत्री मणिपुर गए थे । जानकार सूत्रों से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार इस दौरान पुलिस से और राज्य शस्त्रगार से लगभग 4,000 हथियार लूटे गए । जातीय हिंसा में सबसे ज्यादा उसी का इस्तेमाल हुआ । 

गृह मंत्री ने यही हथियार सौंपने की बात कही । 2 जून तक मात्र 144 हथियार लौटाने/बरामद होने की रिपोर्ट थी । इंफाल पश्चिम जिले के दो गांवों में असम राइफल्स और सेना के जवान जब हथियार तलाशी अभियान चला रहे थे, तब संदिग्ध कुकी उग्रवादी हमले में १५ लोगों के घायल होने की खबर है । मेइती-कुकी जातीय हिंसा में शामिल कुकी संगठनों ने आरोप लगाया कि हथियार लूटनेवाले ज्यादातर मेइती समुदाय के लोग थे और पुलिस तमाशबीन बनी रही । सुरक्षा सूत्रों का भी कहना है कि दो दबंग मेइती गुटों - अरम्बाई तेन्गोल और मेइती लीपुन को निरस्त्र करना बेहद जरूरी है, जिनके बारे में कहा जा रहा है कि बड़ी संख्या में हिंसक झड़पों में शामिल हैं । सरकार का उनके प्रति नरम रूख है । 

मणिपुर हिंसा की तह में और आगे से पहले जरा पीछे झांके बिना तस्वीर साफ नहीं होगी । केंद्रीय गृह मंत्री किसी रिटायर हाईकोर्ट चीफ जस्टिस की अध्यक्षता में न्यायिक आयोग गठित करने का एलान कर आए । यह न्यायिक आयोग जिस ‘हिंसा के कारणों’की जांच करेगा इसके लिए बकौल अमित शाह मणिपुर हाईकोर्ट जिम्मेदार है । न्यायिक आयोग का गठन कर दिया गया । गृहमंत्री ने मणिपुर दौरे के क्रम में कहा कि मणिपुर हाईकोर्ट द्वारा २० अप्रील को जल्दबाजी में जारी किए गए आदेश के कारण हिंसा भड़की । अमित शाह ने मणिपुर पहुंचने से पहले 28 मई को असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने गुवाहाटी में एक बयान में कहा कि मणिपुर सरकार सभी पक्षों से वार्ता कर रही थी, जो मणिपुर हाईकोर्ट के आदेश के कारण पटरी से उतर गयी । मणिपुर हाईकोर्ट ने २० अप्रील को जारी अपने आदेश में कहा कि मेइती समुदाय को एसटी (अनुसूचित जनजाति) सूची में शामिल करने पर चार महीने के अंदर विचार किया जाये ।

ऐसा ही निर्देश मणिपुर हाईकोर्ट ने 28 मार्च को राज्य सरकार को दिया था, जिसके कारण जातीय हिंसा भड़की । पहले से एसटी सूची में शामिल कुकी आदिवासी समुदाय के लोग विरोध में भड़क गए । उनका कहना था कि मेइती लोग सामाजिक-आर्थिक रूप से सबल हैं, हाईकोर्ट का फैसला पक्षपातपूर्ण है । मणिपुर हाईकोर्ट के एकल जज पीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि मेइती को एसटी सूची में शामिल करने की सिफारिश केंद्र को भेजे । इसके लिए सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस डी॰ वाई॰ चन्द्रचूड़ ने मणिपुर हाईकोर्ट को फटकार लगाते हुए कहा कि ऐसा निर्देश अदालत के अधिकारक्षेत्र के बाहर है । 


गुवाहाटी हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस अजय लाम्बा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय जांच आयोग का गठन 04 जून को कर दिया गया, जो ६ महीने में अपनी रिपोर्ट देगा । केंद्रीय गृह मंत्रलय की अधिसूचना के अनुसार यह हिंसा फैलने में अधिकारियों की भूमिका की जांच करेगा । 

जांच आयोग का हेडक्वार्टर इंफाल में ही रखा गया है । अगर यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि आयोग हिंसा भड़कने में मणिपुर हाईकोर्ट जज और मुख्यमंत्री की भूमिका की जांच करेगा या नहीं । 05 जून से हथियार तलाशी तथा बरामदी अभियान तेज कर दिया गया है, ताकि हालात और न बिगड़े । 

एन॰ बीरेन सिंह का पहला कार्यकाल शांति और विकास में गुजरा । फरवरी-मार्च, २०२२ में दूसरा कार्यकाल शुरू होने के बाद मणिपुर के मुख्यमंत्री ने उसका राजनीतिक लाभ उठाना शुरू कर दिया । कुकी और नगा उग्रवाद से विनाश झेल रहे मणिपुर में मुख्यमंत्री ने अपने ही किए-कराए का खातमा करके पहले कुकी उग्रवादी गुटों से केंद्र की पहल पर कायम संघर्षविराम वापस लिया । फिर मेती और कुकी-जोमी के बीच चल रही पुरानी रंजिश को सुलगा दिया । एसटी सूची में मेइती को शामिल करने का प्रयास वही साबित हुआ । 

सरकारी तौर पर पुष्टि की गयी रिपोर्ट के अनुसार इस जातीय हिंसा में 98 लोग मारे गए और 35,000 बेघर हुए । इनमें कुकी-जोमी समुदाय के भी लोग हैं । अमित शाह के 29 मई को इंफाल पहुंचने के दिन ही बीरेन सिंह 40 कुकी उग्रवादियों के मारे जाने का दावा कर रहे थे । 

राजनीति करनेवाले अपने स्वार्थ में समाज को दांव पर लगा देते हैं । उसी को अपना कर्त्तव्य समझते हैं । लेकिन समाज वैसा बेदर्दी नहीं हो पाता । इस जातीय विद्वेष नफरत के माहौल में कुकी और मेइती नर्सों ने अस्पतालों में जिंदगी-मौत से जूझ रहे घायलों की सेवा में कुदरती प्रेम और सेवा भाव का संदेश दिया है । 

पूर्वोतर का सबसे बड़ा सेहत देखभाल सुविधाओं से मुक्त गुवाहाटी मेडिकल कालेज अस्पताल के मणिपुर निवासी कुकी और मेइती नर्सों तथा स्वास्थ्यकर्मियों ने बिल्कुल सेवाभाव से अपने कर्त्तव्यपालन का धर्म निभाते हुए साथ मिलकर दोनों समुदायों की निःस्वार्थ सेवा का अतुलनीय उदाहरण प्रस्तुत किया है । यह रिपोर्ट ३१ मई की है, जब केंद्रीय गृह मंत्री कुकी और मेइती राहत शिविरों में जाकर विस्थापितों का हाल-चाल ले रहे थे ।