मणिपुर को केंद्रीय बलों पर भरोसा नहीं

- शशिधर खान

	





मणिपुर में आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट (आफ्स्पा - AFSPA) वापस लेने के कुछ महीने बाद फिर से लागू किए जाने और केंद्रीय बलों की तैनाती का विरोध हिंसा की तरह ही उफान पर है । लेकिन केंद्र सरकार को इन्हीं सुरक्षा बलों की बदौलत मणिपुर में हिंसा पर काबू पाने की उम्मीद है । मणिपुर का सत्तारूढ़ राजनीतिक नेतृत्व लोगों का विश्वास बनाए रखने में विफल है । मणिपुर की जनता को केंद्र की ओर से तैनात किए सेना और अर्द्धसैनिक बलों की कौन कहे, अपने पुलिस बलों पर भी भरोसा नहीं है । 

मणिपुर की भाजपा गठजोड़ सरकार के मुख्यमंत्री एन॰ बीरेन स्वयं केंद्र से आफ्स्पा वापस लेने की मांग कर चुके हैं । लेकिन केंद्र सरकार को भरोसा है कि केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती किए बगैर मणिपुर हिंसा पर काबू पाना संभव नहीं है । जातीय हिंसा, थाना और सरकारी शस्त्रागार से हथियारों की लूट, आगजनी, अपहरण की वारदातें रूकने का नाम नहीं ले रही हैं । शांति और सामान्य हालात बहाली की आस में मणिपुरवासी १४ महीने से केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के इस आश्वासन पर टिके हैं कि ‘जल्द’ही हिंसा पर काबू पा लिया जाएगा । आम लोगों का आक्रोश चरम पर होने का एक प्रमुख कारण ये भी है कि सेना और अर्द्धसैनिक बलों की भूमिका पर भी सवाल खड़ा हो गया है । मामला मणिपुर हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा हुआ है । लूट, आगजनी, हत्या की आंखोंदेखी जानकारी राज्य सरकार और केंद्र सरकार ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’का हवाला देकर छिपाती है, ये खबरें चर्चा में आयी हैं । राज्य सरकार की नीतियों पर भेदभावपूर्ण रवैया अपनाने के आरोप लगे हैं । पुलिस भी वैसा करने को विवश है । 

जनता त्रस्त है, असुरक्षा और अनिष्ट की आशंका से उबर नहीं पा रही है । इसलिए जनप्रतिनिधियों की ओर प्रशासन के विकल्प की मांग हो रही है । केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा जनता की सुरक्षा के लिए की गयी है, इसमें दो राय नहीं । लेकिन तथ्य बताते हैं कि सुरक्षा बल जवानों को खुद अपनी सुरक्षा के लिए दिन-रात एक करनी पड़ रही है । इसके लिए की गयी कार्रवाई से जन-असंतोष बढ़ा है और राज्य सरकार न तो जनता को, न ही सुरक्षा बलों को आश्वस्त कर पा रही है । 

जातीय हिंसा की दो हालिया वारदातें लगातार सुर्खियों में हैं । घटनास्थल के आसपास गांवों में तनाव बरकरार है । उसी वजह से AFSPA वापसी की मांग तेज हुई है । इसके लिए धरना, प्रदर्शन मणिपुर से निकलकर दिल्ली पहुंचा और संसद सत्र के दौरान सदन के अंदर और बाहर जारी रहा । इंडिया ब्लॉक के नेताओं ने दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन में हिस्सा लिया । उसी समय सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर सरकार से लूट, आगजनी की रिपोर्ट मांगी । 

तथ्यों और घटनाओं के विवरण में मणिपुर की अराजक स्थिति की तस्वीर देखिए । गत 09 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने मणिपुर सरकार को निर्देश दिया कि मई, २०२३ से जारी जातीय हिंसा के दौरान अबतक कितने मकान, कितनी संपत्ति जलायी गयी, लूटी गयी और तोड़ी गयी उसका पूरा ब्योरा उपलब्ध कराया जाए । सुप्रीम कोर्ट पीठ ने राज्य सरकार की ओर से पेश सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल ऐश्वर्य भाटी से कहा कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए  हैं । यह सूचना भी दें कि जिन लोगों ने गैरकानूनी तरीके से संपत्ति पर कब्जा किया हुआ है, उनके खिलाफ क्या कार्रवाई हुई है और उसके असली मालिक को वापस लौटायी गयी है या नहीं । 

इस मामले की 9.12.2024 को 27वीं सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में थी । हिंसा शुरू होने के पांचवें दिन 08 मई, २०२३ को ही इस संबंध में मणिपुर ट्राइबल फोरम की ओर से याचिका दायर की गयी, जिसमें दावा किया गया कि लगभग 18,000 लोग हिंसा के कारण मणिपुर से भागकर अन्य राज्यों में विस्थापित जिंदगी जी रहे हैं । 

सारे मामलों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित जस्टिस गीता मित्तल कमिटी के बारे में एक डेढ़ साल ज्यादा गुजर जाने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि गीता मित्तल कमिटी विस्थापितों के पुनर्वास के लिए काम कर रही है और कोर्ट से कुछ निर्देश की जरूरत है । 

सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कहा - ‘इस सिलसिले में दायर कई अर्जियों पर हम कोई आदेश जारी नहीं कर रहे हैं । यह काम केंद्र और राज्य सरकार को करना है ।’याचिकाकर्ताओं की ओर से एक वकील ने शीर्ष कोर्ट को बताया कि हिंसा जारी है और स्थिति बद से बदतर होती जा रही है । 


10 दिसंबर को ही इंफाल में सैकड़ों लोगों ने आफ्स्पा के विरोध में प्रदर्शन किया, जिसमें काफी संख्या में छात्र और महिलाएं शामिल थीं । इंफाल से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार पांच किलोमीटर की वैसी रैली अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस को ध्यान में रखकर आयोजित की गयी । आफ्स्पा और नागरिकों की मौत के विरोध में पांच बड़े सिविल सोसायटी संगठनों के लोग सड़कों पर उतरे । 

उसी दिन 09 दिसंबर को इंफाल में राजभवन के पास भी विरोध प्रदर्शन हुए । लोग सेना के शिविर से 56 वर्षीय व्यक्ति के कथित तौर पर लापता होने के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे । पुलिस ने राजभवन के बाहर जिन तीन महिलाओं को हिरासत में लिया, उनमें लापता लैशराम कमलबाबू की पत्नी भी शामिल है । 

कांगपोकपी जिले के लेइमाखोंग में सेना के शिविर से लापता व्यक्ति की कहानी जानने के लिए 04 दिसंबर को मणिपुर हाईकोर्ट में इस मामले पर हुई सुनवाई की रिपोर्ट देखिए । हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस डी॰ कृष्णकुमार और जस्टिस गोलमेइ गाइफूल सिल्लू की खंडपीठ ने इस घटना की जांच के लिए चार सदस्यों की कमिटी गठित करके विस्तृत रिपोर्ट देने का आदेश दिया । खंडपीठ ने कहा कि कांगपोकपी के जिला मजिस्ट्रेट की अध्यक्षता में यह कमिटी इस बात की जांच करेगी कि लापता लैशराम कमलबाबू सिंह 25 नवंबर को सेना के शिविर से खुद भागा या उसको अगवा किया गया ।

27 नवंबर को केंद्रीय गृह मंत्री के मणिपुर दौरे का लोगों ने वायकाट किया और दो दिनों तक विरोध में सारे सरकारी कार्यालय बंद रखे गए । सीआरपी फायरिंग में 10 कुकी उग्रवादियों के मारे जाने की घटना 11 नवंबर को हुई थी । 


असम के सिलचर मेडिकल कॉलेज अस्पताल की प्रारंभिक पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार मृतकों के शरीर पर सिर और गर्दन समेत कई-कई गोलियों के निशान हैं । पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बारे में पूछे जाने पर सीआरपीएफ डीजी अनीस दयाल सिंह ने कुछ बोलने से इन्कार कर दिया ।

लेकिन केंद सरकार को अगर मणिपुर में शांति चाहिए और लोगों का विश्वास जीतना है तो सुरक्षा बलों की ज्यादतियों पर उठ रहे सवालों का जवाब देना ही होगा । १४ नवंबर को पांच जिलों के उन ६ थाना क्षेत्रों में फिर से आफ्स्पा लागू करके कर्फ़्यू लगा दिया गया । २४ नवंबर को आयी पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सुरक्षा बलों की दिल दहलानेवाली करतूतों का खुलासा हुआ । 

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार 3 साल के बच्चे की एक आंख गायब है और उसकी अंतड़ी में गोली के जख्म हैं । एक महिला की छाती में कई गोलियां लगी हैं, जिसकी लाश घटना के 7 दिनों बाद सिलचर मेडिकल कॉलेज अस्पताल भेजी गयी । जिस बच्चे की आंख गायब है, उसकी दादी को भी छाती और मांसपेशी में गोली मारी गयी है । 

ऐसी रिपोर्ट की जानकरी मिलते ही लोगों का गुस्सा फूट पड़ा । सैकड़ों की संख्या में हर समुदाय की ग्रामीण शहरी जनता ने कर्फ़्यू का उल्लंघन करके आफ्स्पा फिर से लागू करने और अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनाती के विरोध में केंद्र सरकार के फैसले को चुनौती दी । 11 नवंबर की जिरिबाम फायरिंग के बाद की घटना भी समस्या को समझने में सरकार की भूल उजागर करती है । कुकी - जो उग्रवादियों और सीआरपी के बीच हुई फायरिंग के बाद मेइतेइ समुदाय के ६ लोग जिरिबाम के ही राहत शिविर से लापता हो गए । उनकी लाशें कुछ दिनों बाद असम से होकर बहनेवाली जीरी नदी में तैरती पायी गयी । 

27 नवबंर को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के मणिपुर दौरे से पहले संसद का शीतकालीन सत्र शुरू हो चुका था । दौरे का कार्यक्रम बनने से पहले भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ के विधायकों ने केंद्र से आफ्स्पा वापस लेने की मांग की । जिरिबाम हिंसा के मृतकों की अंत्येष्टि मुख्यमंत्री के आश्वासन के बाद की गयी । 


किसी एक समुदाय को या किसी गांव को उग्रवादी नहीं कहा जा सकता । सितंबर की जिस घटना के बाद से हिंसा भड़की है, उसमें कुकी गांव कांगपोकपी पर मेइतेइ समुदाय के लोगों ने गोलाबारी की । 09 सितंबर, २०२४ को राजभवन पर पत्थर फेंकनेवाले और सीआरपी काफिले पर हमला करनेवाले स्कूली बच्चे मेइतेइ समुदाय के थे । 2.12.2024 को कुकी छात्रों ने हिंसा के कारण यूजीसी नेट परीक्षा इंफाल से बाहर लेने की गुहार लगायी । 

सीआरपी के निशाने पर कुकी समुदाय है और उन्हें ही हर उग्रवादी हमले का दोषी बताया जा रहा है । सभी छात्र संगठनों की मांग है कि सीआरपीएफ के पूर्व डीजी कुलदीप सिंह के नेतृत्व में बनी यूनीफाईड कमांड की बागडोर राज्य सरकार को सौंपी जाये ।

मणिपुर हिंसा में मारे गए कम-से-कम 258 लोगों का सरकारी आंकड़ा कभी-भी बढ़ सकता  है । हिंसा के कारणों की जांच के लिए शुरू में ही 04 जून, २०२३ को गठित आयोग का दूसरा कार्यकाल २० मई, 2025 तक के लिए बढ़ाया गया है ।