मणिपुर में हिंसा का इतिहास दुहराना ठीक नहीं

                                                                                       - शशिधर खान

	



मणिपुर में हिंसा कोई नयी बात नहीं है । पूर्वोत्तर के सबसे ज्यादा हिंसाग्रस्त इस राज्य का इतिहास बताता है कि कबीलाई मानसिकता वाले दर्जनों में बंटे उग्रवादी गुट क्षेत्रीय रसूख और दबदवा कायम करने के पीछे कभी-कभार ही शांति रहने देते हैं । मौजूदा हिंसा उसी का ताजा संस्करण है, जिसमें राज्य सरकार की नीतियों पर भी सवाल उठ रहे हैं । 

स्थिति सामान्य धीरे-धीरे हो रही है । सेना और अर्द्धसैनिक बलों ने कानून व व्यवस्था की कमांड अपने हाथ में ले ली है । केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह लगातार मानीटरिंग कर रहे हैं । लेकिन हालात सामान्य होने में समय लग सकता है । क्योंकि तनावपूर्ण शांति मणिपुर के जनजीवन का अमूमन स्थायी हिस्सा बन चुकी है । अभी भी जातीय और सांप्रदायिक हिंसा को टाली जा सकती  थी । ऐसी हिंसा लगभग तीन दशकों के बाद मणिपुर में उफनी है । भाजपा मुख्यमंत्री एन॰ बीरेन सिंह अगर समय से चेत जाते और अपने राजनीतिक हित के बजाए सामाजिक सद्भाव को ज्यादा महत्व देते तो हालात इस तरह बेकाबू शायद न हो पाते । केंद्र सरकार को मणिपुर में अपनी ही पार्टी के सरकार के खिलाफ कानून व व्यवस्था बनाए रखने में विफल होने के कारण संविधान की धारा-355 लागू करनी पड़ी । हिंसा के अनियंत्रित होने के पीछे जितने तथ्य अभी तक मणिपुर से दिल्ली तक के सूत्रों से सामने आए हैं । उनमें केंद्र और राज्य सरकार के मतभेद की भी चर्चा है । 

हिंसा भड़कने का कारण मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा देने के मणिपुर हाईकोर्ट के आदेश का कूकी समुदाय द्वारा प्रबल विरोध बताया जा रहा है । दोनों ही समुदाय कई गुटों में बंटे हैं । मैतेई हिंदू आस्था वाले हैं और कूकी अपने बिरादर जोमी की तरह इसाई हैं । अभी सीधा टकराव कूकियों का मैतेई समुदाय के लोगों के साथ हुआ है । दोनों समुदायों की भौगोलिक के साथ-साथ आर्थिक और राजनीतिक हैसियत में भी फर्क है । मैतेई लोगों का राजनीति में बोलबाला रहा है और इनकी सामाजिक पहचान कूकी के मुकाबले बेहतर है । कूकी आदिवासी समुदायों को एसटी का दर्जा प्राप्त है, लेकिन हैं वे इसाई । उन्हीं की तरह मैतेई को एसटी का दर्जा देने की मांग पर राज्य सरकार का नरम रवैया और कूकी लोगों का गरम होना हिंसा का बैग्राउंड है । 

अपने अधिकारों के लिए हिंसक आंदोलन चलानेवाले कूकी की आबादी मैतेई के मुकाबले कम है और ये पहाड़ी इलाकों में बसे हैं । घाटी इलाके में मैतेई लोग रहते हैं और आर्थिक, सामाजिक दृष्टि से पिछड़े नहीं है । इस तरह मणिपुर दो हिस्सों में पहले से ही बंटा है । जिनमें आपसी भाईचारा नहीं होने के पीछे राजनीतिक कारण है, मैतेई समुदाय लोग तकरीबन 10 वर्षों से एसटी दर्जे की मांग कर रहे थे । मणिपुर में सरकार कांग्रेस की थी और ओकरम इबोबी सिंह का लगातार १५ साल का कार्यकाल 2016 में समाप्त हो गया । 

भाजपा को सरकार बनाने का दावा करने लायक बहुमत नहीं मिला । लेकिन एन॰ बीरेन सिंह कांग्रेस और अन्य दलों के विधायकों को फोड़कर मुख्यमंत्री बनाने में सफल हो गये । वैसे तो उनका पहला पांच साल का कार्यकाल पूरे समय दलबदल कानून के अंतर्गत विधायकों की सदस्यता समाप्त होने से बचाने और भाजपा विधायकों को एकजुट रखकर सरकार बचाने में गुजरा । लेकिन बाकी समय एन॰ बीरेन सिंह ने हिंसा और तनाव का माहौल अनुकूल बनाने के प्रयासों में लगाया । इसके लिए उन्होंने सभी समुदायों को विश्वास में लेकर उग्रवादी गुटों से संघर्षविराम समझौते किए । हिंसा पर काबू पाने के लिए ही मणिपुर में 1980 से लागू आफ़स्पा (आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर्स) एक्ट, 1958 कई उपद्रवग्रस्त इलाकों से वापस लिए । कूकी जनजातियों को अपने पक्ष में करने के लिए कई सरकारी बैठकें पहाड़ी में की । उग्रवादी हिंसक झड़पों और मुठभेड़ हत्याओं की खबरें कम आने लगी । 

लेकिन दूसरी बार सत्ता में आने के बाद एन॰ बीरेन सिंह मणिपुर में भाजपा के राजनीतिक एजेंडे के अंतर्गत उस विश्वास को भुनाने में जुट गए, जो उन्होंने पहले कार्यकाल में कायम किया   था । उसी का बिस्फोट अभी मैतेई की एसटी दर्जा देने की मांग के खिलाफ कूकी हिंसा उफान है । भाजपा ऐसे दलित या आदिवासियों का एसटी दर्जा बरकरार रखने के खिलाफ है, जो हिंदू धर्म छोड़कर मुसलमान और इसाई बने । सुप्रीम कोर्ट में इस संबंध में दायर याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है । कूकी बहुल आबादी वाले मणिपुर के पहाड़ी एरिया कमिटी के अध्यक्ष विधायक डिन्गानग्लंग गांगमेई ने मणिपुर हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी । हाईकोर्ट ने अपने 27 मार्च के आदेश में राज्य सरकार से कहा कि मैतेई को एसटी दर्जा देने की अनुशंसा केंद्र के पास भेजे । 

भाजपा के ही इस विधायक की ओर से ६ मई को सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में मणिपुर हाईकोर्ट के आदेश में ‘गलतियां’दिखायी गयी है । उनमें सबसे महत्वपूर्ण है कि पहले यही तय नहीं है कि मैतेई जनजातीय (आदिवासी) समुदाय के हैं या नहीं । राज्य सरकार खुद इस नतीजे पर नहीं पहुंची है कि मैतेई को आदिवासी माना जाए या नहीं और यह समुदाय एसटी सूची की श्रेणी में शामिल करने की संवैधानिक आवश्यकताएं पूरी करते हैं या नहीं । मैतेई समुदाय की इस मांग के लिए सौंपे गए ज्ञापन राज्य सरकार के पास लंबित है । ऐसे में ही मणिपुर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दे डाला कि मैतेई को एसटी दर्जा देने की अनुशंसा केंद्र को भेजे । ये दलीलें विधायक  गांगमेई ने हाईकोर्ट आदेश को चुनौती देनेवाली अर्जी में सुप्रीम कोर्ट में बतायी हैं । विधायक ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि ऐसा निर्देश देना राज्य सरकार का महकमा है, हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता ।

चीफ जस्टिस डी॰ वाई॰ चन्द्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट बेंच ने 8 मई को सुनवाई के दौरान हिंसा से हुई मौतों पर चिंता जतायी और पूछा की जिन याचिकाकर्त्ताओं ने मणिपुर हाईकोर्ट में मैतेई को एसटी का दर्जा देने की अर्जी दायर की, उन्होंने जज को क्यों नहीं बताया कि यह पावर राष्ट्रपति को है, हाईकोर्ट को नहीं ।

27 मार्च के मणिपुर हाईकोर्ट के आदेश से मैतेई समुदाय को बल मिल गया, जिससे पहले से चले आ रहे तनाव में इजाफा हो गया । एन॰ बीरेन सिंह दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद राजधानी इंफाल में बड़े-बड़े भवनों को यह कहकर गिराने में जुट गए कि सार्वजनिक जमीन पर यह निर्माण ‘अतिक्रमण’है । उनमें कई भवन चर्च के निकले, जिस पर बवाल उठना स्वाभाविक था । कूकी लोग राज्य सरकार की मैतेई की कथित तरफदारी और कूकी की तरह एसटी दर्जा देने के प्रयास से पहले से नाराज थे । कूकी नेताओं का कहना था कि इससे वे मुख्यधारा से और अलग-थलग पड़ जाएंगे । भाजपा के कई विधायक भी मुख्यमंत्री से नाराज चल रहे थे । मुख्यमंत्री चारों तरफ से घिरते चले गए । उसी क्रम में उन्होंने दबंग कूकी नेशनल आर्मी, कूकी रिबोल्यूशनरी आर्मी और जोमी रिवोल्यूशनरी आर्मी के खिलाफ ऑपरेशन स्थगित रखने का प्रस्ताव वापस ले लिया । केंद्र सरकार इससे सहमत नहीं थी । लेकिन इस संदेह में कि ये उग्रवादी गुट मणिपुर की सीमा से सटे पड़ोसी देश म्यांमार से आनेवाले घुसपैठियों के समर्थक हो सकते हैं, केंद्र चुप रहा । कूकी और जोमी का नगा गुटों की तरह एक पैर म्यांमार में है । संयोग से एन॰ बीरेन सिंह का दूसरा कार्यकाल शुरू होने के समय फरवरी, २०२१ में म्यांमार में सैनिक तख्तापलट हो गया । उसके बाद से पूर्वोत्तर में कूकियों की घुसपैठ बढ़ गयी, जिनकी खासी आबादी म्यांमार में है । 

हिंसा 3 मई को उस समय भड़की, जब कूकी समुदाय के नेतृत्ववाले ऑल ट्राइबल स्टडेंट्स यूनियन ऑफ मणिपुर ने मैतेई को एसटी दर्जा देने के खिलाफ सभी पहाड़ी जिलों में विरोध मार्च को एकजुटता मार्च के बहाने मजबूत जुटान के लिए चूराचन्द्रपुर में विशाल जमाबड़ा किया । इस जिले में कूकी की आबादी ज्यादा है । 

एक अधिकारी के अनुसार कूकियों का गुस्सा उस समय भड़क उठा, जब मैतेई लोगों ने अपना अलग विरोध दिवस आयोजित करने के दौरान कूकियों के युद्ध स्मारक में आग लगा दी । यह स्मारक कूकियों के 1990 के दशक में शुरू हुई ‘अलग कूकीलैंड’के लिए हिंसक आंदोलन के बाद आपसी हिंसा में मारे गए लोगों का प्रतीक है । 

वैसे तो पूर्वोत्तर में सारे अलगाववादी की जड़ नगा विद्रोह है, लेकिन कूकियों को उकसानेवाले नगा नेता हैं । 

अभी जिस मजबूत नगा गुट एनएससीएन (आइसाक मुइवा - IM) से केंद्र सरकार की बेनतीजा शांति वार्ता चल रही है, उसके संचालक टी॰ (थुइन्गालेंग) मुइवा का जन्मस्थान मणिपुर है । ये खुद थुइन्गालेंग नगा समुदाय के हैं और अन्य जिन नगा गुटों के साथ केंद्र का संघर्षविराम चल रहा है, उनमें भी कूकी, कोन्यक समेत अलग-अलग समुदायों के हैं । सबका बेस मणिपुर में है । 1990 के दशक में एनएससीएन ने ही आत्मनिर्णय की मांग तेज कर सबको उकसाया और कूकी-जोमी के अलग कूकीलैंड आंदोलन शुरू किया । 1993 में यह आपसी हिंसा में बदल गया और नगा-कूकी झड़पों में सैकड़ों लोग मारे गए । कूकी ने नगाओं की तरह ‘स्वतंत्र संप्रभु नगालिम राष्ट्र’की नहीं, भारतीय संवैधानिक ढांचे के अंतर्गत अलग कूकीलैंड की मांग की । उसी हिंसा में शहीद हुए कूकियों का युद्ध-स्मारक मैतेई ने जला दिया । 

2001 में केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार ने एनएसआईएन (IM) के साथ संघर्षविराम का दायरा नगालैंड से बढ़ाकर मणिपुर कर दिया और हिंसा भड़क उठी । विरोधियों ने विधान सभा भवन में आग लगा दी ।