मणिपुर को समझाने से ज्यादा समझने की जरूरत

- शशिधर खान

	





मणिपुर में जारी जातीय हिंसा के एक साल पूरे होने पर सभी सामाजिक संगठनों ने इंफाल से दिल्ली तक राहत और शांति की गुहार लगायी है । दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर मणिपुर की राजधानी इंफाल के विभिन्न हिस्सों में हुए प्रदर्शनों से उन जातीय गुटों की पीढ़ा निकली है, जो इस बेकाबू हिंसा का दंश झेल रहे हैं ।


प्रधानमंत्री ने स्वयं दावा किया कि समय रहते हस्तक्षेप के कारण ही मणिपुर में हालात बेहतर हुए । लेकिन मणिपुर के मतदाताओं में लोकसभा सभा चनुाव को लेकर कोई उत्साह नहीं था । न चुनाव रैलियों में कोई रूचि थी, न ही किसी नेता का भाषण सुनने में । 

लोगों ने वोट जरूर डाला, मगर चुनाव से पहले तक सन्नाटा जैसी स्थिति थी । न कोई रोड शो, न कोई पोस्टर । मणिपुर में आमने-सामने मुकाबले की दोनों पार्टियां - सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्षी कांग्रेस के नेता चुनाव प्रचार की अवधि समाप्त होने के समय वोट मांगने पहुंचे । मणिपुर में वोटिंग का प्रतिशत अन्य राज्यों के मुकाबले ज्यादा ही रहा । लेकिन मणिपुरवासियों की पीड़ा नियत एक वर्ष में राज्य सरकार और केंद्र सरकार ने समझने की कोशिश नहीं की । वही पीड़ा वोटिंग के बाद जातीय हिंसा की बरसी के समय उभरी है । सरकारी आंकड़े को ही अगर सही मानें तो गत एक वर्ष में 221 लोग मारे गए, जिनमें कम-से-कम एक दर्जन सुरक्षा बलों के जवान शामिल हैं । हजारों लोग घायल हुए और अपने घर-द्वार से विस्थापित होकर जहां-तहां रह रहे लोगों की संख्या 50,000  से ज्यादा है । इसके अलावे मेइतेई समुदाय के ३१ लोग और कुकी - जो समुदाय के १५ लोग अभी तक लापता है । 



दिल्ली में रह रहे कुकी छात्र संघ और मेइतेई सिविल सोसायटी संगठनों ने जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करके विरोध प्रकट किया । हिंसा के ठीक बरसी के दिन 03 मई को जंतर-मंतर पर सैकड़ों की संख्या में दोनों समुदायों के लोग जुटे और शांति तथा न्याय की मांग की । बाद में मेइतेई सिविल सोसायटी संगठनों ने प्रेस क्लब में संवाददाता सम्मेलन में अपनी आपबीती और ताजा स्थिति बतायी । संवाददाता सम्मेलन के पीछे रंगे पोस्टर में लापता लोगों की तस्वीरों के नीचे लिखा था - ‘उन्हें शान्ति में सोने दें’। लापता लोगों के परिवार के लोग भी मौजूद थे । 

प्रधानमंत्री को भेजे गए ज्ञापन में कूकी समुदाय ने मौजुदा संकट का राजनीतिक समाधान के लिए चार-सूत्री एजेंडा पर विचार करने का आग्रह किया, जिसमें शांति और सुरक्षा के लिए ऐसे उपाय अपनाने पर जोर दिया गया है ताकि उनकी अपनी सरकार हो । 

मणिपुर के चुराचांदपुर से रिपोर्ट मिली कि ट्राइबल लीडर्स फोरम के नेताओं ने हिंसा में मारे गए लोगों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की । चुराचांदपुर जिला शुरू से ही हिंसा का केंद्र रहा, जहां सबसे ज्यादा आगजनी, गोलीबारी की बारदातें हुई । राजधानी इंफाल में जगह-जगह मणिपुर इंटीग्रिटी कोऑडिनेटिंग कमिटी से जुड़े सिविल सोसायटी संगठनों ने भी सभाएं की । 

सभाओं में स्थायी शांति के लिए ठोस योजना का प्रस्ताव पास किया गया । दोनों समुदायों के लोगों ने इंफाल घाटी और आदिवासी पहाडि़यों में कैंडिल लाईट के साथ मृतकों की आत्मा की शांति के लिए मातम मार्च निकाला । इंफाल घाटी में बहुसंख्यक मेइतेई समुदाय के लोग रहते हैं और पहाड़ी जिलों में आदिवासियों की आबादी ज्यादा है । 

दो लोकसभा सीटों में से इनर मणिपुर क्षेत्र में इंफाल घाटी के इलाके हैं और आउटर मणिपुर क्षेत्र जनजातीय पहाडि़यों में फैला है । 

१५ अप्रील को इंफाल में चुनाव प्रचार के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि इस चुनाव में मुकाबला कांग्रेस तथा भाजपा के बीच नहीं, राज्य को एकजुट रखने और तोड़नेवाली ताकतों के बीच है । अमित शाह के इंफाल आने के विरोध में महिला प्रदर्शनकारियों ने विरोध में नारे लगाए, गाडि़यों से भाजपा के झंटे हटा दिए । दो कुकी - जो महिलाओं को निर्वस्त्र करके उनके साथ दुराचार करने का २०२३ का वीडियो उछाला गया । मई में हिंसा भड़कने के कुछ दिनों बाद अमित शाह मणिपुर जाकर रहे । लेकिन उसके बाद महिलाओं के साथ बदसलूकी हुई और तनाव बढ़ता ही गया ।

अब देखिए कि मणिपुर हिंसा की बरसी से एक हफ्ता पहले 27-04-2024 को वहां शांति के लिए तैनात केंद्रीय सुरक्षा बलों के साथ क्या हुआ । 

केंद्रीय सुरक्षा बलों को लक्ष्य करके किए गए हमले में सीआरपीएफ के दो जवान मारे गए और दो गंभीर रूप से घायल हो गए । पुलिस सूत्रें के अनुसार विष्णुपुर जिले में स्थित सीआरपीएफ कैंप पर अज्ञात उग्रवादियों ने फायरिंग की और बम फेंका । गत एक साल में सुरक्षा बलों पर यह पहला हमला है । मुख्यमंत्री एन॰ बीरेन सिंह ने कहा कि पहले कभी मेइतेई या कुकी - जो समुदायों में से किसी ने भी केंद्रीय बलों पर हमला नहीं किया । पुलिस ने ‘कुकी उग्रवादियों’को दोषी ठहराया है, मगर सभी गुटों ने इसमें हाथ होने से इन्कार किया है । 

कुछ दिन पहले मुख्यमंत्री ने एक स्थानीय समारोह में सार्वजनिक रूप से केंद्रीय सुरक्षा बलों को हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराया । मुख्यमंत्री एन॰ बीरेन सिंह ने कहा कि केंद्रीय सुरक्षा बलों को हिंसा पर काबू पाने के लिए बुलाया गया था, लेकिन केंद्रीय बल इसमें विफल साबित हुए हैं । 

16-02-2024 की चुराचांदपुर की एक वारदात सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठानेवाली है । स्थानीय पुलिस के एक हेड कांस्टेबल को बचाने के लिए लोगों की भीड़ ने सुरक्षा बलों पर हमला कर दिया । ‘सशस्त्र हमलावरों’और ‘ग्राम रक्षा दलों’से मिलीभगत का वीडियो वायरल होने के बाद उस हेड कांस्टेबल को सस्पेंड कर दिया गया । 

उसके विरोध में जुटी भीड़ ने एसपी और डीएम के कार्यालय में घुसकर तोड़फोड़ की । सुरक्षा बलों की जबाबी फायरिंग में 2 लोग मारे गए और 35 अन्य घायल हो गए । 

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इंफाल पहुंचने से पहले कुकी - जो समुदाय के दो ग्राम रक्षा दल जवानों की हत्या हो गयी । 14-04-2024 को हुई इस हत्या का असर 19 और २६ अप्रील के मतदान तक रहा । पूरे राज्य में और दिल्ली में रह रहे कुकी समुदाय के लोगों ने विरोध में मार्च निकाला । सभी समुदाय के लोगों ने उस समय भी प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को पत्र लिखकर आग्रह किया कि वोट मांगने से पहले उनकी सुरक्षा तो सुनिश्चित करें । हर गुट के महिला संगठनों ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर कहा कि ‘प्रशासन पर से भरोसा उठ चुका है, राज्य सरकार और केंद्र सरकार दोनों ही हमारी सुरक्षा सुनिश्चित करने को तैयार नहीं है, ऐसे में हमारे पास चुनाव बायकाट के शिवाए कोई चारा नहीं है ।’ 

चुनाव वायकाट के माहौल के बावजूद कुकी - जो समुदाय के लगभग 18,000 विस्थापितों ने अप्रील के पहले सप्ताह में ही सुप्रीम कोर्ट में अर्जी देकर आग्रह किया कि उनके मतदान का प्रबंध करने का निर्देश चुनाव आयोग केा दिया जाए । 


गत वर्ष जून में मणिपुर के १५ सामाजिक संगठनों ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव, संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी आयुक्त, अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस कमिटी, एम्नेस्टी इंटरनेशनल समेत कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों को ज्ञापन सौंपा । ज्ञापनों में सुरक्षा बलों पर भेदभाव पूर्ण रवैया अपनाने का आरोप लगाया गया । 

50,000 विस्थापितों को अपने अनिश्चित भविष्य और अधर में लटकी जिंदगी की चिंता है । उन्होंने अच्छे दिनों की आस में वोट डाला है । प्रधानमंत्री से वे कुछ आश्वासन चाहते थे । 

मणिपुर के लोग समझना चाहते हैं कि मणिपुर हाईकोर्ट ने ऐसा निर्देश क्यों जारी किया जो सुप्रीम कोर्ट को कहना पड़ा कि यह कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता । हाईकोर्ट के फैसले में मुख्यमंत्री की कोई भुमिका थी या नही, जो मेइती समुदाय के हैं । 

एन। बीरेन सिंह के दूसरे कार्यकाल में भी इंफाल से दिल्ली तक यही चर्चा है कि कांग्रेस की कोई नीति सही नहीं थी और भाजपा की कोई नीति सही नहीं थी और भाजपा की कोई नीति गलत नहीं थी । 2008 में कुकी संगठनों से हुए त्रिपक्षीय समझौते की अवधि बढ़ाने के लिए आयोजित बैठक में राज्य सरकार ने 29-02-2024 को अपना कोई प्रतिनिधि नहीं भेजा ।