न्यायपालिका-कार्यपालिका के रिश्ते सहज नहीं

                                                                                             - शशिधर खान

	


		यह अवसर था, सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों और हाईकोर्टों के मुख्य न्यायाधीशों का 30 अप्रील को विज्ञान भवन में आयोजित 11वें संयुक्त सम्मेलन का प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस दोनों इसमें मौजूद थे । न्यायपालिका और कार्यपालिका के इन दोनों शीर्ष प्रमुखों ने एक-दूसरे की कार्यप्रणाली पर ऊंगली उठायी, तथा विभिन्न कोर्टों में लंबित मुकदमे के लिए एक-दूसरे को जनता के कटघरे में दोषी ठहराया ।


		गत हफ्ते संपन्न मुख्यमंत्रियों और हाईकोर्ट चीफ जस्टिसों के सम्मेलन में भी वही देखने को मिला । सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस ने प्रधानमंत्री के आरोप का जवाब दिया । इस बार ऐसे समय में यह सम्मेलन हुआ है, जब केंद्र सरकार (कार्यपालिका) और विधायिका का सीधे सुप्रीम कोर्ट से टकराव उफान पर है । 


		चीफ जस्टिस एन॰ वी॰ रमना का भाषण प्रधानमंत्री के आरोपों का जवाब पर केंद्रित था । उन्होंने कहा कि 50 प्रतिशत लंबित मुकदमे के लिए सरकारें ही जिम्मेदार हैं । चीफ जस्टिस ने कहा कि कार्यपालिका और विधायिका की विभिन्न शाखाओं के अपनी पूरी क्षमता के साथ कार्य नहीं करने के कारण लंबित मामलों का अंबार लगा हुआ   है । उन्होंने कार्यपालिका द्वारा न्यायिक आदेशों की अवहेलना से उत्पन्न अवमानना मामलों की बढ़ती संख्या का भी उल्लेख किया । चीफ जस्टिस ने हाईकोर्टों में स्थानीय भाषाओं में कार्यवाही के प्रधानमंत्री के सुझाव को भी नकारते हुए कहा कि फिलहाल ऐसा करना संभव नहीं है । 

		प्रायः ऐसा देखा जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार से टकराव टालना चाहती है । जबकि जज लोग अच्छी तरह समझ रहे होते हैं कि सरकार अपने सियासी हित में राजनीतिक कारणों से संविधान और कानून के साथ छेड़छाड़ कर रही है । सुप्रीम केार्ट का इसके खिलाफ जनहित याचिकाओं को स्वीकार करना और सुनवाई करना सरकार बर्दाश्त नहीं करती । ऐसा नौबत आने पर सरकार बार-बार समय लेकर सुप्रीम कोर्ट नोटिस का जवाब टालती है और देशहित की दुहाई देकर कोर्ट को झांसा देने की कोशिश करती है । 


		30/04/2022 के सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने न्याय सुनिश्चित और त्वरित करने की प्रणाली बनाने के सुझाव के समय आजादी की 75वीं वर्षगांठ की दुहाई दी ।

		उसके पांच दिन पहले 25 अप्रील को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को असहज करनेवाले एक और मामले में अपना रूख स्पष्ट किया । यह मामला है 05/08/2019 को जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन एक्ट बनाकर जम्मू व कश्मीर को विशेष संवैधानिक दर्जा देनेवाले 72 वर्ष पुराने प्रावधान अनुच्छेद ३७० को खत्म करके इस राज्य को दो संघशासित क्षेत्रों में बांटने का । इस कानून की संवैधानिक वैद्यता को जम्मू व कश्मीर के राजनीतिक दलों ने २०१९ में ही सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी । लेकिन शीर्ष कोर्ट भाजपा के राजनीतिक मकसद से किए गए इस विवादास्पद फैसले पर सुनवाई तीन वर्षों तक टालती रही । याचिकाकर्ताओं ने बार-बार सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगायी । 25 अप्रील को जब चीफ जस्टिस को बताया गया कि यह धारा-370 का मामला है और चुनाव की तैयारी के लिए विधान सभा सीटों का परिसीमन जारी है, तब सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कहा कि गर्मी की छुट्टी के बाद सुनवाई के लिए लिस्टिंग की जाएगी । चीफ जस्टिस एन॰ वी॰ रमना ने यह भी कहा कि यह पांच जजों की पीठ का मामला है, वे पीठ पुनर्गठित करेंगें । गत 08/04/2022 को भी चीफ जस्टिस एन॰ वी॰ रमना को कहना पड़ा कि सरकार द्वारा न्यायपालिका जजों को बदनाम करने का नया चलन शुरू हुआ है । 

		जजों, राजनीतिक विरोधियों, वकीलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं की जासूसी करनेवाले पेगासस स्पाईवेयर विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रूख सरकार को अच्छा नहीं लगा । यह विवाद गत वर्ष संसद में गूंजा । जवाब में राष्ट्रीय सुरक्षा की सरकार की दुहाई पर चीफ जस्टिस ने कहा - ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सरकार हमेशा फ्री पास नहीं ले सकती और न्यायिक समीक्षा से बच नहीं सकती ।’ 

		संविधान (कानून) दिवस के दिन २६ नवंबर को हर साल सुप्रीम कोर्ट और सरकार के मतभेद उभरते हैं । २०२१ के समारोह में अटोर्नी जनरल के॰ के॰ वेणुगोपाल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट बन गया है - कोर्ट ऑफ अपील । प्रधानमंत्री ने कहा कि न्यायपालिका उपनिवेशवादी मानसिकता समझे और इसकी आड़ में विकास प्रोजेक्टों को लटकानेवाली याचिकाओं को तबज्जो न दे ।