सुप्रीम कोर्ट और सरकार में तकरार ठीक नहीं 

                                                                                                 - शशिधर खान

	




उपराष्ट्रपति ने कहा कि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग एक्ट, २०१४ (एनजेएसी एक्ट, 2014) सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द किए जाने पर संसद में ‘कोई चर्चा’नहीं होना’ ‘बेहद गंभीर मामला’ है । उन्होंने कहा कि संसद से पारित एक कानून को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया । आश्चर्य है कि ऐसे किसी कदम के बारे में दुनिया को कोई जानकारी नहीं है और संसद में इस पर कोई चर्चा नहीं हुई । 

उपराष्ट्रपति ने यह बात 02/12/2022 को नयी दिल्ली में एक ऐसे कार्यक्रम में कही, जिसमें सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस डी॰ आई॰ चन्द्रचूड़ और उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ एक साथ आज बाजू बैठे थे । यह कार्यक्रम प्रसिद्ध न्यायविद डा॰ लक्ष्मीमल्ल सिंघवी स्मारक व्याख्यानमाला के सिलसिले में आयोजित था । 

ज्ञात रहे कि एनजेएसी एक्ट, संसद से २०१४ में उच्च न्यायपालिका को जजों की नियुक्ति के लिए बनी कोलेजियम प्रणाली समाप्त करने के लिए पास कराया गया था । राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग एक्ट, २०१४ बनाने का मकसद ये था कि सरकार चाहती थी सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट जजों की नियुक्ति में सरकार की भी चले । सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में एनजेएसी एक्ट को यह कहकर रद्द कर दिया कि स्वतंत्र न्यायपालिका में दखलंदाजी देनेवाला एक्ट है ये । सुप्रीम कोर्ट संचालित कोलेजियम प्रणाली बरकरार रह गयी । हालांकि उच्च न्यायपालिका के जजों की नियुक्ति पर कोलेजियम से अनुशंसित नाम को लेकर सरकार से मतभेद कभी खतम नहीं हुआ और अभी भी कायम है । लेकिन सात साल के बाद यह पहला अवसर है, जब उपराष्ट्रपति ने कार्यपालिका और न्यायपालिका के इस विवाद को नए सिरे से विधायिका को लपेटते हुए उछाला है । 

संसद का शीतकालीन सात दिसंबर से शुरू है, जो 29 दिसंबर तक चलेगा । अब यह तो इसी अवधि में पता चलेगा कि कोई भी संसद सदस्य उपराष्ट्रपति के इस बयान से उत्प्रेरित होते हैं या नहीं । उपराष्ट्रपति ने जब ऐसा भाषण दिया उसके पहले संसद सत्र शुरू होने की अधिसूचना लोकसभा सचिवालय से जारी की जा चुकी थी । इसका मतलब उपराष्ट्रपति चाहते हैं कि संसद में इस विषय पर चर्चा हो । 

ये पहला सत्र है जिसमें उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ राज्यसभा सभापति के आसन पर  बैठेंगे ।

संसद में अभी सरकार के पास चर्चा के लिए कई अहम ताजा मुद्दे हैं । 35 बिल पहले से लंबित हैं और सरकार की ओर से 16 नए बिल लाने की सूचना है । विपक्ष के पास भी सीमा पर लगातार बढ़ रहे तनाव बढ़ती मंहगाई, बेरोजगारी और किसानों के न्यूनतम समर्थन मूल्य समेटे कई सामयिक ज्वलंत मुद्दे हैं । इसलिए उम्मीद कम है कि कोई संसद सदस्य एनजेएसी एक्ट को नए सिरे से उठाएं । सात वर्षों में कानून मंत्रियों ने यदा-कदा किसी-किसी अवसर पर सीधी रार टालने का ध्यान रखते हुए देते रहे हैं, मगर ऐसा मसौदा तैयार होने की जानकारी सार्वजनिक नहीं हुई । 

उपराष्ट्रपति ने देश के सबसे बड़े जनप्रतिनिधि मंच ‘संसद की प्रभुसत्ता’पर जोर देते हुए कहा कि ‘यह सत्ता इस्तेमाल नहीं हुई ।’जगदीप धनखड़ ने कहा - ‘दुनिया को ऐसे किसी उदाहरण की कोई जानकारी नहीं है ।’

जिस कार्यक्रम में उपराष्ट्रपति ने ऐसा वक्तव्य दिया, उसमें पूर्व सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस आर॰ एम॰ लोढ़ा, कई जज, वकील, केन्द्रीय मंत्री पीयूष गोयल, कांग्रेस नेता पी॰ चिदंबरम, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल समेत गणमान्य लोग मौजूद थे ।’ 

उपराष्ट्रपति ने एनजेएसी एक्ट, २०१४ सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द किए जाने पर नए सिरे से चर्चा की शुरूआत करते हुए कहा - ‘‘इस पर सोचने और विचार करने में कोई ज्यादा देर नहीं हुई   है । क्या संसद की संप्रभुता के साथ कभी समझौता किया गया है ? क्या बाद की संसद उस काम से बंधी है, जो पूर्व संसद कर चुकी है’’ ।

उपराष्ट्रपति के साथ बैठे भारत के प्रधान न्यायाधीश वहां तो इस संबंध में कुछ नहीं बोले । लेकिन उसी दिन अर्थात् 2 दिसंबर को ही सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका की सुनवाई के दौरान जस्टिस एम॰ आर॰ शाह और जस्टिस सी॰ टी॰ रविकुमार की पीठ ने कहा कि मौजूदा कोलेजियम प्रणाली को कुछ ‘व्यस्त निकाय’के बयानों के आधार पर पटरी से उतरने नहीं देना चाहिए । सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच जजों की नियुक्ति को लेकर चल रहे विवाद के मद्देनजर ही सुप्रीम कोर्ट पीठ ने सूचना अधिकार कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज की इसी संबंध में दायर याचिका पर सुनवाई के क्रम में किसी का नाम लिए बगैर कहा कि सुप्रीम कोर्ट सबसे ज्यादा पारदर्शी संस्थाओं में से एक है, इसलिए कोलेजियम प्रणाली के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए । इस विवाद में सुप्रीम कोर्ट के जजों में भी आपस में मतभेद उभरकर सामने आया है । अंजलि भारद्वाज की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट प्रशांत भूषण ने पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज एम॰ बी॰ लोकुर के बयान की ओर सुप्रीम कोर्ट पीठ का ध्यान आकर्षित किया, जो उन्होंने दिसंबर, २०१८ में कोलेजियम के फैसले के संबंध में दिया   था । जस्टिस एम॰ बी॰ लोकुर २०१८ में स्वयं कोलेजियम का हिस्सा थे और उन्होंने सार्वजनिक रूप से 12 दिसंबर, २०१८ को सुप्रीम कोर्ट में कुछ जजों की नियुक्तियों के संबंध में किए गए, फैसले पर सवाल उठाया । जस्टिस एम॰ बी॰ लोकुर ने कथित रूप से अपने सार्वजनिक वक्तव्य में कहा कि 12 दिसंबर, २०१८ की कोलेजियम बैठक में लिए गए निर्णय सुप्रीम कोर्ट के बेबसाईट पर नहीं डाले गए, जो अन्य कोलेजियम की तरह ही बेव्साईट पर होना चाहिए । उस वक्त प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाले कोलेजियम में एम॰ बी॰ लोकुर, जस्टिस ए॰ के॰ सीकरी, एस॰ ए॰ बोबड़े और जस्टिस एन॰ वी॰ रमना थे । उनमें डी॰ वाई॰ चन्द्रचूड़ ने एन॰ वी॰ रमना से कार्यभार लिया है । रमना से पहले बोबड़े थे । इस विवाद पर दो जजों की सुप्रीम कोर्ट पीठ ने मौजूदा कोलेजियम प्रणाली बरकरार रखने की वकालत करते हुए कहा कि ‘वैसे जजों जो स्वयं उस वक्त कोलेजियम का हिस्सा रहे हैं ।’

२६ नवंबर को कानून (संविधान) दिवस के दिन सुप्रीम कोर्ट में और उसके बाहर आयोजित समारोह में हर साल सरकार और न्यायपालिका प्रतिकूल था । क्योंकि कोलेजियम अनुशंसित वकीलों/जजों की उच्च न्यायपालिका में नियुक्ति में सरकार की ओर से ढीले रवैए पर सुप्रीम कोर्ट जज नाराजगी जाहिर कर चुके थे । केंद्रीय कानून मंत्री किरण रिजिजू ने भी कोलेजियम से असहमति और सुप्रीम कोर्ट के काम-काज पर विवादित टिप्पणी कर चुके थे । 

इसी विवाद के आलोक में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग बहाल करने के संबंध में दायर याचिका पर सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट तैयार हो गयी । चीफ जस्टिस डी॰ वाई॰ चन्द्रचूड़ ने स्वयं इस याचिका को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति व्यक्त की । याचिका में कहा गया कि एनजेएसी बहाल की जाए ताकि संवैधानिक कोर्टों में जजों की नियुक्ति में सरकार की भी समान भूमिका हो । याचिका में कोलेजियम प्रणाली में ‘भाई-भतीजावाद’और ‘पक्षपातपूर्ण रवैया’के भी आरोप लगाए गए । कानून मंत्री किरण रिजिजू ने कोलेजियम प्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि दुनिया में भारत एकमात्र देश है, जहां जज अपने साथी जजों की नियुक्ति स्वयं करते हैं ।

संविधान दिवस के दिन चीफ जस्टिस और कानून मंत्री दोनों ने अच्छी बात कही । किरण रिजिजू ने कहा कि कार्यपालिका और न्यायपालिका एक ही संविधान के अंग हैं, इसलिए हमेशा आपस में लड़ते रहना वाला मामला दो दिन बाद 28 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में उठा, जब जजों की नियुक्ति में देरी पर सरकार को फटकार मिली । जस्टिस एस॰ के॰ कॉल और जस्टिस ए॰ एस॰ ओका की पीठ ने डेढ़ साल देरी पर नाराजगी जतायी । जजों ने कहा कि मंजूरी देने की अधिकतम सीमा चार महीना है, लेकिन डेढ़ साल से सरकार की ओर से कोई सूचना नहीं मिली है । ‘अवमानना नोटिस जारी करने के लिए हमारे धैर्य की भी कोई सीमा होती है ।’ 25 नवंबर को सरकार ने हाईकोर्ट जजों की नियुक्ति के लिए कोलेजियम से भेजी गयी २० फाइलें पुनर्विचार के लिए सरकार लौटा चुकी थी । 

उसके पहले कानून मंत्री ने विभिन्न मंचों पर कहा कि कोलेजियम प्रणाली बदली जा सकती है और जजों की नियुक्ति सरकार अपने हाथ में ले सकती है ।

गुजरात, तेलंगाना और तमिलनाडु से हाईकोर्ट जजों के तबादले के खिलाफ वकीलों के विरोध की खबरों की 19-20 नवंबर को दिल्ली में बड़ी चर्चा रही । इस पर कानून मंत्री ने अफसोस   जताया ।

राष्ट्रपति द्रौपदी मूर्मू ने सुप्रीम कोर्ट में आयोजित संविधान दिवस समारोह में बड़े नपे-तुले शब्दों में विवाद का कोई मुद्दा नहीं उठाया, लेकिन जजों और सरकार ने भी कामकाज पर टिप्पणी की । 

राष्ट्रपति ने बहुत अच्छा मानवीय पहलू वाला विचाराधीन कैदियों का मामला उठाते हुए कहा कि सरकार और न्यायपालिका दोनों को इस त्रसदी पर विचार करना चाहिए । राष्ट्रपति द्रौपदी मूर्मू ने कहा - मैं इन दिनों नए जेल बनाने की बात सुन रही हूं, क्योंकि जेलों में भीड़ बहुत हो गयी है । नए जेलों की जरूरत क्यों ? अगर हमें नया समाज बनाना है तो, हमारे जो जेल अभी है, उसे बंद करना चाहिए ।

राष्ट्रपति ने समारोह में उपस्थित चीफ जस्टिस और कानून मंत्री दोनों की ओर इंगित करते हुए कहा - ‘ये काम मैं कानून मंत्री और जजों पर छोड़ती हूं । मैं आशा करती हूं, आपलोग समझ रहे हैं कि क्या मैं कह रही हूं और क्या बोलने से परहेज कर रही है’।