न्यायपालिका ज्यादा पारदर्शी और संयमी

- शशिधर खान

	




सबसे पहले दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस डी॰ के॰ उपाध्याय को ही यशवंत वर्मा पर संदेह हुआ । चारों तरफ से जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग उठी । सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने पहले तो जस्टिस वर्मा का तबादला इलाहाबाद हाईकोर्ट करके वहां के हाईकोर्ट चीफ जस्टिस को निर्देश दिया कि यशवंत वर्मा को कोई न्यायिक कार्य न दिया जाए । उसके साथ ही सीजेआई ने तीन वरिष्ठतम हाईकोर्ट जजों की जांच कमिटी गठित कर दी । पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट चीफ जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जी॰ एस॰ संधाबालिया और कर्नाटक हाईकोर्ट के जज अनु शिवरामन जांच कमिटी के सदस्य बनाए गए । 

05 मई को जांच कमिटी ने अपनी रिपोर्ट सीजेआई संजीव खन्ना को सौंपी और 08 मई को जस्टिस खन्ना ने जांच रिपोर्ट के साथ राष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री को पत्र लिख दिया कि जस्टिस यशवंत वर्मा को हटाने की प्रक्रिया शुरू की जाए । 

संविधान की धारा 217 के अन्तर्गत हाईकोर्ट जज को हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव पर संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत अर्थात् उपस्थित और मतदान में भाग लेनेवाले कम-से-कम दो तिहाई सदस्यों का समर्थन चाहिए । सुप्रीम कोर्ट के लिए भी धारा 217 के तहत वही प्रक्रिया का प्रावधान है । 

सीजेआई संजीव खन्ना इलाहाबाद हाईकोर्ट जज यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग का रास्ता साफ करके सेवानिवृत हो गए । अभी ‘ऑपरेशन सिंदूर’उफान पर है । सरकार और पूरा देश का ध्यान उसी तरफ केंद्रित है । कांग्रेस नेता ऑपरेशन सिंदूर पर संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग कर रहे हैं । इसमें तो महाभियोग की बात नहीं उठेगी । संसद के मानसून सत्र में ही जस्टिस तर्वा को हटाने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है । 

भारत के प्रधान न्यायाधीश के रूप में संजीव खन्ना का कार्यकाल उनके पूर्ववर्तियों की तुलना में जितनी कम अवधी का रहा, उतना ही ज्यादा विवादित रहा । 

विधायिक और कार्यपालिका का न्यायपालिका से टकराव कोई नयी बात नहीं है । सत्तारूढ़ दल के मंत्री, संसद सदस्य सभी चुनाव राजनीति के लिए संविधान की दुहाई देते हैं और सियासी नीतियों के बचाव में संविधान की जगह संसद को ‘सर्वोच्च’बताने लगते हैं । खासकर सुप्रीम कोर्ट से टकराव के समय संसद की ‘सर्वोच्चता’का जुमला सत्ता की ‘सर्वोच्चता’के लिए इस्तेमाल होता है । 

इसी बीच उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने ही यह झंडा उठा लिया । सदन के अंदर और बाहर उपराष्ट्रपति इस तरह से सीधे सुप्रीम कोर्ट को निशाना बनाकर संसद की ‘सर्वोच्चता’की दुहाई देने लगे, मानो न्यायपालिका को संविधान से कोई स्वतंत्र अधिकार ही न हो । ऊपरी सदन के पीठासीन अधिकारी और उपराष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पद पर विराजमान जगदीप धनखड़ के लिए मंत्री या संसद सदस्य की तरह बयानबाजी उनके पद की गरिमा के अनुकूल नहीं है । 

संसद का बजट सत्र शुरू से लेकर अंतिम तक सुप्रीम कोर्ट जजों समेत न्यायपालिका की जवाबदेही तय करने और न्यायपालिका को विधायिका तथा कार्यपालिका के अनुसार चलाने के उपायों पर केंद्रित रहा । इसमें राज्यसभा ज्यादा मुखर थी और उसके सूत्रधार स्वयं सभापति जगदीप धनखड़ थे । 

08 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने विधायिका की जनता के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए विधान सभाओं द्वारा पास बिलों को मंजूरी देने के लिए राज्यपालों के साथ-साथ राष्ट्रपति के लिए भी समय-सीमा तय कर दी । उसके बाद तो उपराष्ट्रपति बिल्कुल राजनीतिक नेता की तरह सार्वजनिक रूप से सुप्रीम कोर्ट पर सीधा प्रहार करने लगे । 04 अप्रील को संसद सत्र अनिश्चित काल के लिए स्थगित हो चुका था । जगदीप धनखड़ ने राष्ट्रपति के लिए समय-सीमा तय करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को संविधान से परे बताते हुए कहा कि शीर्ष कोर्ट ‘सुपर संसद’के रूप में काम कर रही है । 

सबसे ज्यादा न्यायपालिका की पारदर्शिता सुनिश्चित करने पर राज्यसभा सभापति ने सदन में बजट सत्र शुरू होने के समय फरवरी में ही सवाल उठाए और कहा की राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग एक्ट अगर लागू होता तो तस्वीर दूसरी होती । सदन में यह बात उठायी गयी कि संसद से पास इस एक्ट को राष्ट्रपति से मंजूरी मिलने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में लागू होने पर रोक लगा दी । 

13.02.2025 को यह मामला जिस संदर्भ में उपराष्ट्रपति ने राज्यसभा में उठाया, उसका तार भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के ही जज शेखर यादव से जुड़ा है । शेखर यादव की एक सांप्रदायिक रंग वाली टिप्पणी को लेकर विवाद संसद के शीतकालीन सत्र के समय दिसंबर, २०२४ में ही उभरा । सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से शेखर यादव के विषय में रिपोर्ट मांगी और जनवरी में शीर्ष (सर्वोच्च) न्यायालय के सामने जस्टिस शेखर यादव को पेशी का सम्मन भेजा । 

यह बात राज्यसभा सभापति जगदीप धनखड़ को ‘अखर’गयी और उन्होंने बजट सत्र के दौरान 13 फरवरी को कहा कि हाईकोर्ट जज को हटाने का अधिकार सिर्फ संसद को है । उन्होंने सदन में कहा कि 55 सदस्यों ने संविधान की धारा 124 (4) के तहत इलाहाबाद हाईकोर्ट जज शेखर यादव को हटाने का नोटिस दे रखा है । धनखड़ ने कहा कि यह मामला सिर्फ राज्यसभा सभापति, संसद और राष्ट्रपति के अधिकार क्षेत्र में संविधान के अनुसार आता है । 

उपराष्ट्रपति के हिसाब से जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ नकदी बरामदगी मामले में सीजेआई संजीव खन्ना ने 08 मई को राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को जांच रिपोर्ट पत्र के साथ भेजी वो राज्यसभा सभापति तथा लोकसभा अध्यक्ष को भी भेजी जानी चाहिए । इस संबंध में संवैधानिक प्रक्रिया का सीजेआई ने पालन किया और संसद को क्या करना है, यह राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री के महकमे में डाल दिया । 

जस्टिस बी॰ आर॰ गवई ने भारत के 52वें प्रधान न्यायाधीश पद की शपथ लेने से पहले ही इस विवाद को विराम दे दिया । 04 मई को सीजेआई की शपथ लेने से पहले अपने आवास पर अनौपचारिक बातचीत में जस्टिस गवई ने कहा - ‘देश में संविधान सर्वोच्च है, संसद नहीं ।’उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया कि सेवानिवृत्ति के बाद मैं कोई पद नहीं लूंगा, सीजेआई जैसे पद से सेवानिवृत्त होने के बाद कोई पद नहीं लेना चाहिए । जस्टिस बी॰ आर॰ गवई का इशारा वैसे सीजेआई और सुप्रीम कोर्ट जजों की ओर था जो सरकार के खिलाफ कोई फैसला नहीं सुनाने के कारण ‘गुडविल’में रहते हैं । उनके इनामस्वरूप उन जजों को राज्यपाल, किसी आयोग का अध्यक्ष बना दिया जाता है । 

दरअसल विवाद बढ़ा राज्यपालों के लिए बिल मंजूरी की समय-सीमा और उसमें राष्ट्रपति को शामिल करने और वक्फ एक्ट को चुनौती देनेवाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से । 

जस्टिस जे बी पादरीवाला और जस्टिस महादेवन की सुप्रीम कोर्ट पीठ ने तमिलनाडु की गैर-भाजपा सरकार की याचिका पर 12 अप्रील को अपने फैसले में कहा कि संविधान  की धारा 200 तथा 201 के अंतर्गत राज्यपाल और राष्ट्रपति अपनी संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल मनमाने ढंग से नहीं कर सकते । विधान सभा से पास बिल को मंजूरी राज्यपाल धारा 200 के तहत देते हैं और वो बिल राष्ट्रपति के पास धारा 201 के अंतर्गत भेजा जाता है । फैसले के बाद तमिलनाडु के २०२० से लंबित 10 बिल राज्यपाल की मंजूरी के बगैर लागू हो   गए ।

राज्यपालों को बिल मंजूरी प्रक्रिया 3 महीने के अंदर पूरी करनी होगी । किसी बिल पर मंजूरी रोककर उसे मंत्रिमंडल की सहायता और सलाह से राष्ट्रपति के लिए सुरक्षित रखने की अधिकतम समय-सीमा सुप्रीम कोर्ट ने 1 (एक) महीना तय कर दी । 


उसके बाद वक्फ एक्ट पर सुनवाई के दौरान 17/04 को सीजेआई की अध्यक्षता वाली पीठ ने अंतरिम आदेश जारी करने से पहले केंद्र को अपना पक्ष रखने और सुनवाई पूरी होने तक यथास्थिति बनाए रखने कहा । बजट सत्र के अंतिम दिन पास एक्ट को लागू होते ही सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी । 

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने उसकी तीखी प्रक्रिया में कहा कि सुप्रीम कोर्ट धारा-142 की नाजायज इस्तेमाल करके विधायिका और कार्यपालिका के महकमे में इस्तक्षेप कर रहा है । उन्होंने संवैधानिक कानून पर विचार करने के लिए धारा 145(3) के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट के पीठ गठन अधिकार में संशोधन चाहा । 

वक्फ एक्ट लागू होने के बाद सबसे ज्यादा पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में दंगा भड़का । भाजपा सांसद निशिकांत दूबे ने सीधे सीजेआई को इसके लिए दोषी ठहराया । तीखी टिप्पणियों से आहत सीजेआई संजीव खन्ना ने 21/04 को पश्चिम बंगाल हिंसा के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा कि हिंसा से बंगाल की ‘रक्षा’के लिए केंद्र को निर्देश देना क्या कार्यपालिका के काम में न्यायपालिका का इस्तक्षेप नहीं होगा ? वकील विष्णु शंकर जैन ने अपनी याचिका में सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया कि केंद्र को संविधान की धारा-355 के तहत प्राप्त आपात् शक्तियों का इस्तेमाल करके बंगाल को हिंसा से ‘रक्षा’का निर्देश दें । 

कायदे से देखा जाए तो विधायिका और कार्यपालिका की तुलना में न्यायपालिका ज्यादा संयमी तथा पारदर्शी है । सांसद निशिकांत दूबे के खिलाफ अवमानना याचिका सीजेआई संजीव खन्ना ने खारिज कर दी । उतना ही नहीं, सेवानिवृत्त होने से चार दिन पहले वक्फ बोर्ड की सुनवाई पीठ से खुद को अलग कर लिया और अपनी समेत सभी सुप्रीम कोर्ट जजों की संपत्ति की सार्वजनिक घोषणा कर दी ।