आखिर उदासीन क्यों हो रहे मतदाता

 - शशिधर खान

	




इसी क्रम में चुनाव आयोग की ओर से दिल्ली में बुलायी गयी हालिया बैठक गौर करने लायक है । 11 राज्यों के नगरपालिका आयुक्तों और जिला अधिकारियों के साथ हुई इस बैठक में चुनाव आयोग ने २०१९ लोकसभा चुनाव में वोट बहुत कम पड़ने को लेकर चिंता जतायी । 

इन 11 राज्यों और केंद्रशासित क्षेत्रों के 266 लोकसभा सीटों की पहचान की गयी है, जहां २०१९ में बहुत कम संख्या में मतदाता वोट डालने पहुंचे । वोटों का प्रतिशत राष्ट्रीय औसत से बहुत कम पाया गया और मतदाताओं की उदासीनता पर चुनाव आयोग ने चिंता जतायी । 

अगले हफ्ते से शुरू होनेवाली २०२४ लोकसभा चुनाव मतदान प्रक्रिया से पहले चुनाव आयोग की बैठक माएने रखती है । मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार, चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और सुखवीर सिंह संधू ने बैठक की अध्यक्षता की । मतदान में भागीदारी बढ़ाने के लिए एक एक्शन कार्ययोजना का मसौदा सम्मेलन में शामिल होने दिल्ली पहुंचे अधिकारियों के साथ मिलकर तैयारी की गयी । चुनाव आयोग की रिपोर्ट के अनुसार कुल 266 चुनाव क्षेत्रों में से 215 ग्रामीण इलाकों के हैं और 51 शहरी इलाकों में आते हैं, जहां 50 से 55 प्रतिशत के बीच वोट पड़े । २०१९ लोकसभा चुनाव में 11 राज्यों के कुल 50 ग्रामीण क्षेत्रों में से 40 सीटें बिहार और यूपी की थी । उनमें यूपी की २२ और बिहार की 18 सीटें थी । सबसे ज्यादा लोकसभा सीटों वाला राज्य उत्तर प्रदेश (यूपी) है । यूपी और बिहार की हमेशा से केंद्र में सरकार गठन में प्रमुख भूमिका रही है । समेकित आंकड़े में चुनाव आयोग के अनुसार पिछले लोकसभा चुनाव में 29.7 करोड़ लोगों ने वोट नहीं डाला । 

हालिया विधान सभा चुनावों में भी चुनाव आयोग ने मतदाताओं की भागीदारी कम होने पर चिंता जतायी थी । लेकिन उन चुनावों में शहरी मतदाताओं का उदासीन रवैया चुनाव आयोग की चिंता का सबब था । २०२३ में पूरे वर्ष विधान सभा चुनावों का सिलसिला चला । पहले कर्नाटक, त्रिपुरा, मेघालय, नगालैंड में और फिर 07 से 30 नवंबर (2023) के बीच छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान, मिजोरम तथा तेलंगाना में चुनाव हुए । उसमें चुनाव आयोग को रिपोर्ट मिली कि शहरी क्षेत्र के मतदाताओं ने मतदान में रूचि कम दिखायी । 

अभी २०१९ लोकसभा चुनाव में मतदान का जो सर्वेक्षण रिपोर्ट चुनाव आयोग ने सार्वजनिक किया है, उसके अनुसार ग्रामीण इलाकों में ही कम मतदाता वोट डालने बूथ पर गए । जम्मू व कश्मीर में वोट कम पड़ने का कारा तो समझ में आता है । २०१९ में जो दहशत का माहौल था, उसमें कमी नहीं आयी है । इस बार मतदाताओं का रूख पता चलेगा । क्योंकि जम्मू व कश्मीर से सम्बन्धित संविधान की विवादास्पद धारा-370 खत्म होने के बाद पहला लोकसभा चुनाव है । २०१९ लोकसभा चुनाव के समय धारा-370 खत्म किए जाने की प्रबल संभावना चुनाव चर्चा का विषय थी । केंद्र में सरकार गठन के तीन महीने बाद २०१९ में यह काम हो गया । 

अभी चुनाव आयोग के लिए सबसे ज्यादा चिंता का कारण है बिहार, जहां मतदाताओं की उदासीनता पिछले कई चुनावों में देखी गयी । 2009, २०१४ और २०१९ लोक सभा चुनावों में अन्य राज्यों की तुलना में मतदान कमतर रहा । कम वोटर टर्न आउट वाले राज्यों में जम्मू व कश्मीर के बाद दूसरे नंबर पर बिहार है । चुनाव पर्व बस प्रचार तक सीमित है । बिहार के मतदाताओं के लिए पर्व नहीं है । 

बिहार के बाद यूपी है, जिन दोनों राज्यों में चुनिंदा जिला निर्वाचन अधिकारियों और नगर निगम आयुक्तों से अलग से विचार विमर्श किया । स्थानीय लोक कलाकारों और स्टारों को मतदाताओं को प्रेरित करने का काम तो चुनाव तैयारी के समय से ही जारी है । 

गत हफ्ते की बैठक में मुख्य चुनाव आयुक्त ने दोनों चुनाव आयुक्तों के साथ सार्वजनिक बाहनों में चुनाव जागरूकता संदेश लगाने और चलन्त शौचालयों की व्यवस्था मतदान केन्द्रों पर करने का भी निर्देश दिया   है । 

यह तो हुआ चुनाव आयोग का दायित्व, जिसमें कोई कमी नहीं हो रही है । लेकिन प्रश्न है कि आखिर क्यों उदासीन होते जा रहे हैं मतदाता ? चुनाव में पारदर्शिता के जितने ही पुख्ता इंतजाम बढ़ते जा रहे हैं, उतनी ही मतदाताओं की वोट डालने में दिलचस्पी कम होती जा रही है । 

वो समय याद कीजिए जब लोग भीड़ में जुटकर घंटों कतार में खड़े रहकर वोट डालते थे । दबंग उम्मीदवारों के फर्जी मतदान, बूथ लूट में भी भीड़ भागीदार बनती थी । सिर्फ ठप्पा मारना या चुनाव चिन्ह पर । आज मतदाताओं का फोटो परिचय पत्र है, इवीएम बटन दबाना है, ताकि वोट पसंदीदा उम्मीदवार को जाए । फिर उसमें वीवीपीटी जुड़ा, ताकि इवीएम में डले वोट की पर्ची वोटर देख सकें । तो उसके बाद से मतदाताओं की उदासीनता बढ़ती जा रही है और दूसरी तरफ इन इलेक्ट्रोनिक मशीनों की संदिग्धता का विवाद भी बढ़ता जा रहा  है । 

आज तक कहीं से भी एक भी ऐसा प्रमाण नहीं मिला कि किसी इवीएम में छेड़छाड़ करके डले वोट में हेराफेरी की गयी हो । किसी भी राजनीतिक दल ने ऐसा करके मतदाताओं के सामने नहीं दिखाया । लेकिन सभी गैर-भाजपा दल अपने-अपने राजनीतिक स्वार्थवश इवीएम में छेड़छाड़ को चुनावी मुद्दा बनाए हुए हैं । जबकि चुनाव आयेाग ने हर चुनाव में मतदाताओं को दिखा दिया है कि इवीएम में छेड़छाड़ असंभव है, यह ‘फूलप्रुफ’है । 2009 में दूसरी बार लोकसभा चुनाव में बहुमत के लायक सीटें नहीं मिल पाने के बाद सबसे पहले भाजपा नेताओं ने ही इवीएम की निष्पक्षता पर ऊंगली उठायी थी । आज भाजपा के नेता चुप हैं । मतदान दिग्भ्रमित हैं । चुनाव आयोग को एक साथ मतदाताओं को भी भरोसा दिलाना है और इवीएम की विश्वसनीयता को चुनौती देनेवाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट को जवाब भी देना है । सबसे पहले सुब्रह्मण्यम स्वामी ने ही इवीएम को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय बहस का विषय बनाया और इस मामलों को सुप्रीम कोर्ट ले गए । वे कभी चुनाव लड़कर लोकसभा या विधान सभा नहीं पहुंचे । भाजपा की मदद से राज्यसभा सदस्य बने । 

मतदाताओं को दिग्भ्रमित करने और असमंजस में डालने के लिए जिम्मेदार राजनीतिक दल हैं, जो अपने सियासी स्वार्थ में न मतदाताओं की परवाह करते हैं न चुनाव आयोग की । 

चुनाव आयोग के वश में जो है, वो किया गया है । २०२४ लोकसभा चुनाव में पहली बार चुनाव आयोग ने 85 वर्ष या उससे अधिक उम्र के बुजुर्गों और करीब 40 प्रतिशत दिव्यांग जनों के लिए पोस्टल बैलेट से वोट डालने के लिए उनके घर में मतदान की व्यवस्था की है । 


क्या मतदाता नहीं जानते कि कांग्रेस से इतर वंशवादी राजनीति से उपजे उम्मीदवारों को साथ लेने में भाजपा को परहेज नहीं है ? क्या मदताता नहीं जानते कि शराब और पैसा बांटकर वोट हथियाने पर चुनाव आयोग का शिकंजा है ? मदताताओें को सिर्फ गिने-जुने परिवारों और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को ही वोट देने की विवशता है । जनप्रतिनिधि सिर्फ अपनी सुख-सुविधा के लिए वोट मांगने जाते हैं । मगर उन्हें ज्यादा-से-ज्यादा संख्या में जुटकर लोगों को वोट डालने के लिए प्रेरित करने से कोई मतलब नहीं है । 

चुनाव आयोग काफी समय से दागियों के चुनाव लड़ने से रोकने के लिए उनके पर्चे रद्द करने के अधिकार के लिए विभिन्न सरकारों से कानून बनाने की मांग करता आ रहा है । ऐसा बिल संसद में नहीं लाने पर सभी दल सहमत हैं ।

२०२४ लोकसभा चुनाव में कुल 542 सीटों में से 185 दागी जीते, जिनके खिलाफ आपराधिक मुकदमे लंबित थे । २०१९ में इनकी संख्या बढ़कर 232 हो गयी । 

२०२४ लोकसभा चुनाव से पहले सुप्रीम कोर्ट ने जनप्रतिनिधियों के जेल में रहते हुए चुनाव लड़ने के विशेषाधिकार वाली धारा 8(4) रद्द कर दी । चुनाव आयोग की लाचारी को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने २०१९ लोकसभा चुनाव से पहले सब कुछ मतदाताओं पर छोड़ दिया । 

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को अपना प्रोफाईल अखबारों के जरिए बार-बार प्रचारित करना अनिवार्य कर दे । तब भी दागी जीते । 

जनप्रतिनिधि चुनाव जीतने के बाद अगले चुनाव तक अपने सियासी स्वार्थ के लिए नैतिकता और आदर्श को ताक पर रखकर किसी भी दल से मिलने या किसी का भी साथ छोड़ने में लीन रहते हैं । सारा खेल पैसा भ्रष्टाचार का है । मतदाता खुद को छला हुआ महसूस करते हैं । NOTA (किसी को वोट नहीं) और बूथ पर नहीं जाने से विकल्प के सिवाए मतदाताओं के पास चारा क्या है ? चुनाव आयोग जागरूकता अभियान चलाकर क्या करेगा ।

भाजपा का दो कार्यकाल विपक्षी दलों की सरकार गिराने में गुजरा । कम मतदान वाले दिल्ली में प्राप्त जनादेश के साथ क्या हो रहा है, सभी देख रहे हैं । 


चुनाव आयोग युवा मतदाताओं को ज्यादा जागरूक कर रहा है । युवा लोग फोटो परिचय पत्र दूसरे कार्यों के लिए बनवाते हैं वोट डालने के लिए नहीं ।


दूसरा उदाहरण है, मणिपुर । इस राज्य में चुनाव प्रक्रिया कर्फ्यू की तरह दबी जुवान और दबे पैर से जारी है । मणिपुर में दूसरी बार भाजपा की सरकार बनी और हिंसा पर काबू पाना संभव नहीं हो रहा है । असामान्य हालात के एक साल हो गए । यूपीएससी परीक्षार्थियों ने दूसरे राज्य में परीक्षा केंद्र की व्यवस्था की गुहार लगायी, जिसे संघ लोकसेवा आयोग ने दिल्ली हाईकोर्ट के निर्देश पर स्वीकार कर लिया । वे युवा वोट डालने मतदान केंद्रों पर कैसे जाएंगे । मणिपुर के ६ पूर्वी जिलों के मतदाताओं को अलग स्वायत्तता की तसल्ली देकर पिछले चुनाव में वोट लिया गया, वो अब चुनाव बायकाट पर आमादा हैं ।