स्वतंत्र निष्पक्ष चुनाव आयोग तो होना ही चाहिए

                                                                                                 - शशिधर खान

	



संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होते ही राज्यसभा में दो सदस्यों ने प्राइवेट मेम्बर बिल पेश करके मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और चुनाव आयुक्तों (ईसी) की नियुक्ति के लिए स्वतंत्र चयन समिति गठन की मांग रखी । 

दोनों ही सांसदों ने इस बात पर बल दिया कि चुनाव आयेाग जैसी संवैधानिक संस्था का सरकारी प्रभाव से मुक्त पूरी तरह स्वतंत्र और निष्पक्ष होना लोकतंत्र को बचाए रखने के लिए बहुत आवश्यक है । 

सीईसी और ईसी की नियुक्ति के लिए स्वंतत्र चयन समिति बनाने की चर्चा अभी जोर-शोर से चल रही है । चुनाव सुधार के क्रम में चिंता का विषय बना हुआ है कि चुनाव आयोग स्वतंत्र निकाय हो, जिस पर लोकतंत्र का आधार जनादेश टिका है । 

केरल से राज्य सभा सदस्य जॉन बिट्टास ने कहा कि भारत के प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता में सीईसी तथा ईसी की नियुक्ति के लिए चयन समिति गठित की जाए । इस समिति में लोक सभा अध्यक्ष और लोकसभा में विपक्ष के नेता हों । उन्होंने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में पारदर्शिता, निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए संविधान में संशोधन किया जाए, ताकि चुनाव आयोग का अपना स्थायी स्वतंत्र सचिवालय हो । 

सीपीएम सांसद ने सुझाव में चयन समिति में प्रधानमंत्री को शामिल करने का जिक्र नहीं किया । लेकिन अगले दिन 11 दिसंबर को कांग्रेस के राज्य सभा सदस्य मनीष तिवारी ने भी चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और स्वायत्तता के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय चयन समिति गठित करने की मांग उठायी । मनीष तिवारी ने सीईसी और ईसी की नियुक्ति वाली चयन समिति में सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस तथा विपक्ष के नेता को शामिल करने की बात कही । मनीष तिवारी की सुझाव में लोकसभा स्पीकर नहीं हैं और जॉन बिट्टास के द्वारा पेश बिल में प्रधानमंत्री नहीं हैं । जो भी हो दोनों ही सांसदों ने जो राय दी है वो चुनाव आयोग को स्वतंत्र निष्पक्ष बनाने का रास्ता सुझाता है और इस पर तो विचार होना ही चाहिए । 

ये दोनों ही प्राइवेट मेम्बर बिल संसद में ऐसे समय में पेश किए गए हैं, जब सुप्रीम कोर्ट में चुनाव सुधार के संबंध में दायर याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है । सुप्रीम कोर्ट जज के॰ एम॰ जोसेफ ने २२ नवंबर को सुनवाई के दौरान सरकार को कहा कि ‘निष्पक्षता’और ‘तटस्थता’सुनिश्चित करने के लिए सीईसी तथा ईसी की नियुक्ति कमिटी भारत के प्रधान न्यायाधीश को शामिल करके गठित की जा सकती है । सुनवाई कर रही इस सुप्रीम कोर्ट पीठ के दूसरे जज हैं, अजय रस्तोगी । दोनों जजों ने सरकार से जानना चाहा कि सीएजी, केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (सीवीसी), केन्द्रीय सूचना आयुक्त (सीआईसी) की तरह से सीईसी के लिए कोई चयन समिति (कोलेजियम) क्यों नहीं बनी है और अभी तक सरकार इस पर चुप क्यों है । सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से इतना जरूर कहा कि सीईसी और ईसी जैसे संवैधानिक पदों पर नियुक्ति के लिए चयन समिति में भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) शामिल किए जाएं, लेकिन और कौन-कौन हों, यह सरकार पर छोड़ दिया । 

सांसद जॉन बिट्टास का कहना है कि उन्होंने राज्यसभा सचिवालय को अपना बिल सुप्रीम कोर्ट सुनवाई से दो महीना पहले सौंपा था । शायद वे समझ रहे थे कि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से सरकार को कोई फर्क नहीं पड़नेवाला है । अगर ऐसा होता तो सुप्रीम कोर्ट को सरकार को फटकार लगाने की नौबत नहीं आती । 2017 में ही सीईसी और ईसी चयन समिति गठित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान शीर्ष कोर्ट ने सरकार से जवाब तलब किया । 

राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) लागू करने के संबंध में सुप्रीम कोर्ट से नए सिरे से विधायिका-न्यायपालिका विवाद खड़ा हुआ है । उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ को राज्यसभा सभापति के रूप में पहले संसद सत्र के अपने पहले संबोधन भाषण में ‘संसद की सर्वोच्चता’की दुहाई देते हुए इस पर चर्चा की पहल की । संसद से २०१४ में पारित एनजेएसी एक्ट की सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में निरस्त कर दिया । उपराष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट को ‘लक्ष्मण रेखा’की याद दिलाते हुए इसे संसदीय संप्रभुता के साथ गंभीर समझौता और जनादेश का गंभीर उल्लंघन बताया । 

सीईसी और ईसी नियुक्ति के लिए स्वतंत्र चयन समिति बनाने के लिए बिल पेश किए जाने से एक दिन पहले ९ दिसंबर को राज्यसभा में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग बिल, २०२२ नए सिरे से पेश किया गया । सीपीएम के ही विकास रंजन भट्टाचार्य की ओर से पेश इस प्राइवेट मेम्बर बिल के पक्ष में अधिकांश सदस्यों ने ध्वनिमत से सहमति व्यक्त की । यह मामला सीधे तौर पर विधायिका-न्यायपालिका टकराव का है । क्योंकि सरकार सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट जजों की नियुक्ति, तबादला एनजेएसी एक्ट के जरिए चाहती है । जबकि सुप्रीम कोर्ट इसके लिए बनी कोलेजियम प्रणाली बरकरार रखने के पक्ष में है । 

ठीक उसी तरह सीईसी और ईसी की नियुक्ति बिल्कुल कार्यपालिका का महकमा है । सरकार अपनी मर्जी से किसी भी वरिष्ठ आईएएस अधिकारी को पहले चुनाव आयुक्त और फिर मुख्य चुनाव आयुक्त बना देती है । फिर राष्ट्रपति के हाथों उन्हें नियुक्ति पत्र देने की औपचारिकता पूरी की जाती है और वो सिर्फ कहने के लिए संवैधानिक पद हो जाता है । लेकिन नियुक्ति प्रक्रिया सरकारी विभाग की तरह होने के कारण चुनाव आयोग जैसी संस्था संविधान की धारा-324 के अंतर्गत हासिल दायित्वों का स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से निर्वाह नहीं कर पाता । 

संविधान के तहत सीईसी की हैसियत सुप्रीम कोर्ट के जज के समकक्ष है । सीईसी धारा-324 के अंतर्गत प्राप्त शक्तियों के आधार पर न्यायिक अधिकारी के समान निर्णय लेते हैं । लेकिन इनकी नियुक्ति कार्यपालिका के हाथ में है और सिर्फ ब्यूरोक्रेट सीईसी और ईसी बनाए जाते हैं । यह बात राज्य सभा में उठाते हुए जॉन बिट्टास ने कहा कि लोकतंत्र को बचाने के लिए यह व्यवस्था बदली जानी चाहिए । 

सुप्रीम कोर्ट के जज के॰ एम॰ जोसेफ ने कहा कि चुनाव आयोग ईमानदार होगा, मगर इसके निश्चित ही राजनीतिक ताल्लुकात हो सकते हैं । उनका सीधा इशारा इस ओर था कि जब सरकार को ही ईसी, सीईसी नियुक्त करना है तो अवश्य ही ऐसे अधिकारी को नियुक्त करेगी, जो सत्तारूढ़ पार्टी के चहेते रहे हों और चुनाव में उस दल का ‘ख्याल’रखें । 

सुप्रीम कोर्ट के बाद संसद में यह मामला उठा है । जिस प्रकार एनजेएसी बिल के विरोध में बोलने वाले एकमात्र सदस्य थे आम आदमी पार्टी के राघव चड्ढा । लगभग उसी तरह सीईसी और ईसी नियुक्ति के लिए स्वतंत्र चयन समिति के समर्थन में दोनों ही दिन 10 और 11 दिसंबर को अन्य दलों के किसी सांसद की आवाज नहीं सुनी गयी । 

चुनाव आयोग पक्षपातपूर्ण रवैए के आरोप से मुक्त नहीं है । इसके उदाहरण सामने आए   हैं । यह संवैधानिक संस्था स्वतंत्र तरीके से काम नहीं कर पाती, यह आरोप भी आधारहीन नहीं है । इसलिए सरकार चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति अपने हाथ में रखना चाहती है । अब यह मामला एक साथ कार्यपालिका, न्यायपालिका और सुप्रीम कोर्ट में आमने-सामने की नौबत २२ नवंबर को सुनवाई के दौरान ही आ गयी । 

18 नवंबर को जस्टिस के॰ एम॰ जोसेफ ने चुनाव आयोग पर ऊंगली उठायी और उसी दिन आईएएस अधिकारी अरूण गोयल की चुनाव आयुक्त के रूप में नियुक्ति की फाईल एक ही दिन में क्लियर हो गयी । 18 नवंबर को अरूण गोयल ने स्वैच्छिक सेवा निवृति ली और अगले दिन ही राष्ट्रपति ने चुनाव आयुक्त नियुक्त कर दिया । सरकार ने सुनवाई के बीच में ही अपनी मनमर्जी का सबूत दिया । अर्टोनी जनरल ने कैफियत देकर छुट्टी पा ली । सुप्रीम कोर्ट पीठ ने पूछा कि जब इस प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं तो सरकार ने चुनाव आयुक्त की इतनी जल्दीबाजी में नियुक्ति क्यों की । 


सुप्रीम कोर्ट में दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए कानून बनाकर चुनाव आयोग को अधिकार देने के संबंध में याचिकाओं पर काफी पहले से सुनवाई चल रही है । सत्तारूढ़ दल समेत किसी भी पार्टी को इसमें दिलचस्पी नहीं है । सरकार सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को ‘अपनी सीमा’ में रहने कह चुकी है । 

आश्चर्य है कि कांग्रेस सदस्य मनीष तिवारी चुनाव आयोग को राजनीतिक दलों के आंतरिक मामलों में दखल देने का अधिकार देने के पक्ष में तो बोले । मगर दागियों के पर्चे रद्द करने वाला कानून बनाने की बात नहीं की । जॉन बिट्टाल भी सिर्फ चुनाव आयोग को अलग स्वतंत्र सचिवालय देने वाले संविधान संशोधन पर ही अटके रहे । चुनाव आयोग कई वर्षों से स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए ऐसा कानून बनाने की मांग कर रहा है, जिसमें दागियों को चुनाव लड़ने से रोका जा सके । चुनाव सुधार का सबसे अहम मुद्दा यही है ।