कर्नाटक जीत का असर सीबीआई प्रमुख चयन पर

                                                                                      - शशिधर खान

	



सीबीआई (केंद्रीय जांच ब्यूरो) के डायरेक्टर (प्रमुख) के चयन के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय कमिटी की 13 मई को जब दिल्ली में बैठक चल रही थी, उस समय कर्नाटक विधान सभा चुनाव परिणाम आ रहे थे । 

चयन समिति में विपक्ष की ओर से सदस्य लोकसभा में कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने सरकार द्वारा तय नाम और सीबीआई डायरेक्टर पद के लिए बनायी गयी सूची पर आपत्ति की । बैठक में सरकार द्वारा प्रस्तुत नाम में से पहले नंबर पर थे कर्नाटक के डीजीपी प्रवीण सूद । कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने मुख्य रूप से कनार्टक काडर के आईपीएस अधिकारी प्रवीण सूद का नाम सबसे ऊपर होने के कारण ही इस प्रक्रिया पर सवाल उठाया और अपनी आपत्ति दर्ज कराते हुए फिर से नाम तय करने कहा । 

कनार्टक में कांग्रेस ने जोरदार जीत दर्ज की । भाजपा सत्ता से बाहर हो गयी, मुख्यमंत्री वसवराज बोम्बई ने इस्तीफा दिया । और सीबीआई डायरेक्टर पद के लिए प्रवीण सूद के नाम पर सरकार ने मुहर लगा दी । 

१४ मई को कर्नाटक में कांग्रेस में सरकार गठन प्रक्रिया चल रही थी, उसी दौरान केंद्रीय कार्मिक जन शिकायत और पेंसन मंत्रालय (डीओपीटी) ने प्रवीण सूद के सीबीआई डायरेक्टर पद पर नियुक्ति का आदेश जारी कर दिया । 

हिमाचल प्रदेश निवासी प्रवीण सूद को कर्नाटक की भाजपा सरकार ने डीजीपी बनाया था और इन पर काफी समय से भाजपा के इशारे पर कांग्रेस के खिलाफ पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने के आरोप लग रहे थे । कर्नाटक में जब चुनाव प्रचार चल रहा था, उसी समय डीओपीटी ने नाम तय कर लिया था ।

विश्वस्त सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार सीबीआई डायरेक्टर के लिए लगभग 115 नाम की सूची लोकसभा में कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी और चयन समिति के तीसरे सदस्य भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) डी॰ वाई॰ चन्द्रचूड़ के पास कुछ महीने पहले ही भेजी गयी थी । क्योंकि वर्तमान सीबीआई डायरेक्टर सुबोध कुमार जायसवाल का कार्यकाल 25 मई तक ही है । 

उस सूची में ऐसे भी अधिकारियों का नाम सीबीआई प्रमुख पद के लिए शामिल था, जो चयन वाली सूची में नहीं थे । उस पर अधीर रंजन चौधरी और सीजेआई डी॰ वाई॰ चन्द्रचूड़ दोनों ने ही एतराज करते हुए सरकार से फिर से सूची तैयार करने कहा । 

कर्नाटक विधान सभा चुनाव की अधिसूचना के बाद केंद्र सरकार ने तीन नाम तय कर  लिया । उनमें प्रवीण सूद के बाद दूसरे नंबर पर भी भाजपा शासित मध्यप्रदेश के डीजीपी सुधीर कुमार सक्सेना थे । तीसरा नाम था अग्निशमन सेवा, नागरिक रक्षा और होम गार्ड के डीजी ताज हसन । ताज हसन का नाम तब जोड़ा गया, जब कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने सीबीआई प्रमुख पद के लिए सूची में किसी महिला और अल्पसंख्यक समुदाय के अधिकारी का नाम नहीं होने पर भी ऊंगली उठायी । लोकसभा में कांग्रेस नेता ने यह कहकर सूची बनाने की प्रक्रिया पर असहमति जतायी कि अधिकारियों के सर्विस रिकार्ड, उनकी दक्षता और दायित्व निभाने में ईमानदारी रिकार्ड का कोई विवरण उन्हें नहीं भेजा गया है । बहरहाल ताज हसन का नाम जोड़कर मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति के पास भेजी गयी । 

कर्नाटक में भाजपा हारी और वहां के डीजीपी प्रवीण सूद को सीबीआई डायरेक्टर बना दिया गया । कांग्रेस सरकार के शपथग्रहण के बाद प्रवीण सूद को कर्नाटक डीजीपी पद से हटाया जाना निश्चित था । क्योंकि कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष डी॰ के॰ शिवकुमार समेत सारे कांग्रेसी उनसे नाराज थे । प्रवीण सूद पर चुनाव प्रचार के दौरान और उसके पहले से ही कांग्रेस कार्यकर्ताओं के खिलाफ झूठे केस दर्ज करने तथा भाजपा की तरफ से आंखें मूंदे रहने का आरोप था । डी॰ के॰ शिवकुमार ने इस संबंध में चुनाव आयोग को लिखा था और डीजीपी को ‘नालायक’कहते हुए चेताया था कि ‘हमारी सरकार बनने दो, इसके खिलाफ कार्रवाई करेंगे ।’


सुप्रीम कोर्ट की ही बार-बार फटकार का असर है कि सरकार ने प्रवीण सूद की सीबीआई प्रमुख की नियुक्ति का आदेश जारी करने के साथ ही कहा कि इनका कार्यकाल 2 साल का होगा । प्रवीण सूद 25 मई को सुबोध कुमार जायसवाल से सीबीआई डायरेक्टर का कार्यभार ग्रहण करेंगे । सीबीआई डायरेक्टर का कार्यकाल 2 साल से कम न हो और उन्हें बीच में हटाया न जाए, यह व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट ने ही दी हुई है । सीबीआई की सरकार सेट-अप टाईप व्यवस्था के खिलाफ विनीत नारायण द्वारा दायर याचिका पर 1997 में सुप्रीम कोर्ट ने डायरेक्टर का कार्यकाल 2 साल फिक्स किया । सीबीआई डायरेक्टर की नियुक्ति अन्य संवैधानिक संस्थाओं की तरह चयन समिति द्वारा किए जाने का नियम सुप्रीम कोर्ट का ही बनाया हुआ है । 

इसलिए केंद्र सरकार चयन समिति के जरिए सीबीआई डायरेक्टर की नियुक्ति किसी-न-किसी बहाने टालती है । अभी प्रवीण सूद की नियुक्ति का मामला भी पहले की तरह सुप्रीम कोर्ट में जा सकता है । क्योंकि चयन समिति के दूसरे सदस्य भारत के प्रधान न्यायाधीश डी॰ वाई॰ चन्द्रचूड़ और लोकसभा में कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने चयन पैनल के लिए अधिकारियों की सूची तैयार करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाया था । 


सिर्फ सीबीआई ही नहीं, भ्रष्टाचार पर शिकंजा कसनेवाली केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (सीवीसी) केंद्रीय सूचना आयुक्त (सीआईसी), ED (एन्फोर्समेंट डायरेक्टर) का कार्यकाल समाप्त होने के बावजूद उसी अधिकारी को सेवा विस्तार देकर चयन समिति की बैठक टालती है । 

अभी सीबीआई डायरेक्टर चयन के लिए आयोजित बैठक में ही सीवीसी की नियुक्ति पैनल ने कार्यकारी सीवीसी पी॰ के॰ श्रीवास्तव को स्थायी बनाने के लिए पहला नाम यही रखा । दूसरा नाम एक्जिम बैंक के पूर्व प्रबंध निदेशक डेविड टासक्विना का नाम पेश किया गया, जिस पर अधीर रंजन चौधरी ने सवाल उठाया । सीवीसी और सतर्कता आयुक्तों की नियुक्ति वाली चयन समिति में तीसरे सदस्य केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह हैं । कांग्रेस नेता ने एतराज करते हुए कहा कि कई ऐसे सक्षम अधिकारी हैं, जिनका नाम सीवीसी के लिए रखा जा सकता था । 

ED प्रमुख संजय कुमार मिश्र को सुप्रीम कोर्ट की रोक क बावजूद सेवा विस्तार देने का मामला फिर शीर्ष कोर्ट में है । 

सुप्रीम कोर्ट जज विक्रम नाथ और संजय करोल की पीठ ने 8 मई को फैसला सुरक्षित रख लिया । 08 सितंबर, २०२१ को संजय मिश्र को 2 के बजाए 3 साल का सेवा विस्तार देने के केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ दायर याचिकाओं पर शीर्ष कोर्ट ने सरकार के निर्णय में तो हस्तक्षेप नहीं किया, मगर कहा कि इसके बाद सेवा विस्तार न दिया जाए । उसकी काट में सरकार ने अध्यादेश के जरिए सीवीसी एक्ट, 2003 में संशोधन करके ED प्रमुख का कार्यकाल ५ साल तक बढ़ाने का पावर अपने हाथ में ले लिया । उतना ही नहीं, दिसंबर, २०२१ में संसद के शीतकालीन सत्र में इस संबंध में बिल पास कराकर सीबीआई प्रमुख और ED (एन्फोर्समेंट डायरेक्टर) दोनों को पांच साल तक का सेवा विस्तार देने का इंतजाम कर लिया । 



कांग्रेस को ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ और राहुल गांधी को ‘शहजादा’बताने का प्रधानमंत्री का चुनावी जुमला कर्नाटक चुनाव परिणाम के बाद कसौटी पर है । कोर्ट के भी राजनीतिकरण की सरकार की मंशा सुप्रीम कोर्ट ने कामयाब नहीं होने दी । यह कोशिश भी गुजरात से ही हुई । सुरत के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी हरीश हसमुख भाई वर्मा के आदेश से मानहानि मुकदमे में राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता समाप्त हो गयी । जिला जज के रूप में प्रोन्नति के लिए न्यायिक अधिकारियों की सूची में गुजरात हाईकोर्ट द्वारा हरीश वर्मा का भी नाम डालने के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने 12 मई को स्टे दे दिया ।