सीबीआई की कार्यशैली संदेह और विवाद के घेरे में

 - शशिधर खान

	



			

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर सीबीआई (केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो) को सरकार की भाषा बोलने वाला ‘पिंजरे में बंद तोता’बताते हुए कहा कि इस प्रमुख जांच एजेंजी को अपनी कार्यशैली में निष्पक्षता और स्वतंत्रता बरतनी चाहिए । सुप्रीम कोर्ट जज उज्जल भुयन ने दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान सीबीआई को २०१३ के कोलब्लॉक आवंटन घोटाले के समय सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी की याद दिलायी कि सीबीआई स्वतंत्र व निष्पक्ष रूप से कोई काम नहीं करती और सरकार की भाषा बोलनेवाला पिंजरे में बंद तोता जैसी छवि इस जांच एजेंसी की हो गयी है । 

जस्टिस उज्जल भुयन ने कहा कि देश की प्रमुख जांच एजेंसी होने के नाते सीबीआई की कार्यशैली में निष्पक्षता, पारदर्शिता होना जनहित में है और ऐसा दीखना भी चाहिए । 

मुख्यमंत्री पद से अरविंद केजरीवाल के इस्तीफे से पहले सुप्रीम कोर्ट में उनकी उस याचिका पर सुनवाई हुई, जिसमें उन्होंने सीबीआई द्वारा उसी समय गिरफ्तार किए जाने को चुनौती दी, जब ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) के दूसरे मामले में केजरीवाल को जमानत मिल गयी । 

जस्टिस भुयन ने कहा कि कानून के शासन के अनुसार जांच बिल्कुल निष्पक्ष और न्यायिक होना चाहिए, जो हमारे संवैधानिक गणतंत्र की बुनियादी विशेषता है । जस्टिस ने इस बात पर सवाल उठाया कि जब सीबीआई को २२ महीने तक अरविंद केजरीवाल को गिरफ्तार करने की जरूरत नहीं महसूस हुई, तो दूसरे मामले में केजरीवाल को जमानत मिल जाने के बाद उन्हें गिरफ्तार करने की जल्दीबाजी क्यों थी ? सुप्रीम कोर्ट जज ने सीबीआई के मकसद पर सवाल उठाते हुए कहा - ‘मैं यह नहीं समझ पाया कि ईडी (एन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट) वाले दूसरे मामले में अरविंद केजरीवाल को शीर्ष कोर्ट से जमानत मिलते ही तुरंत उन्हें गिरफ्तार करना सीबीआई को जरूरी क्यों लगा’?

केजरीवाल की जमानत याचिका पर सुनवाई करनेवाली दो सुप्रीम कोर्ट जजों की पीठ में जस्टिस सूर्यकांत भी थे । जस्टिस उज्जल भुयन और जस्टिस सूर्यकांत दोनों में सीबीआई की गिरफ्तारी के समय को लेकर राय थोड़ी भिन्न थी । लेकिन सीबीआई की कार्यशैली पर दोनों जजों ने सवाल उठाते हुए एक साथ कहा कि देश की इस प्रमुख जांच एजेंसी को अपनी कार्यशैली ऐसी रखनी चाहिए ताकि इसकी छवि ‘पिंजरे में बंद की जगह पिंजरे से मक्त तोता की तरह बने ।’ 

आबकारी (एक्साइज) नीति वाले एक ही मामले में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल दो बार गिरफ्रतार किए गए । 21-03-2024 को पहले ईडी ने और २६ जून को फिर सीबीआई ने उन्हें गिरफ्तार किया, जबकि केजरीवाल पहले से ही हिरासत में थे । 12 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल को ईडी केस में जमानत दी, मगर वे रिहा नहीं हो पाए, क्योंकि सीबीआई शिकायर्ता की प्रक्रिया उस समय लंबित थी । 05 अगस्त को दिल्ली हाईकोर्ट ने केजरीवाल को गिरफ्तार करने के सीबीआई के निर्णय को उचित ठहराया और केजरीवाल के वकील से कहा कि जमानत के लिए ट्रायल कोर्ट जाएं । 12 अगस्त को केजरीवाल ने दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी । १४ अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल को अंतरिम जमानत नहीं दी । लेकिन जस्टिस भुयन और जस्टिस सूर्यकान्त की पीठ ने २३ अगस्त और 05 सितम्बर को सुनवाई करके दोनों पक्षों की दलीलें सुनी । 13 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट पीठ ने अपना फैसला सुनाया और उसी दिन शाम को केजरीवाल तिहाड़ जेल से बाहर आए । 

दोनों ही जजों ने सीबीआई के साथ-साथ ट्रायल कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट को भी लताड़ा, लेकिन सीबीआई ने जो केजरीवाल के साथ रवैया अपनाया उसे गंभीर सवाल उठानेवाला बताया । 

सुप्रीम कोर्ट पीठ ने सीबीआई की इस दलील को खारिज कर दी कि केजरीवाल ने पूछताछ के दौरान ‘हर सवाल का जवाब टालने’वाली नीति अपनायी, इसलिए उन्हें हिरासत में रखना जरूरी है । जजों के अनुसार जमानत किसी भी अभियुक्त की संविधान सम्मत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़ा है, जो देना कानून के शासन का हिस्सा है । 

जस्टिस उज्जल भुयन ने कहा कि सीबीआई ने अगस्त, २०२२ में अरविंद केजरीवाल के खिलाफ केस दर्ज किया और आरोपपत्र में अभियुक्त के रूप में केजरीवाल का नाम नहीं डाला । लेकिन सीबीआई ने 25 जून, २०२४ को उसी समय केजरीवाल की गिरफ्तारी के लिए याचिका दायर की, जब पांच दिन पहले २० जून को ईडी वाले केस में केजरीवाल को जमानत मिल चुकी की । जज ने कहा कि सीबीआई का यह रवैया जवाब के बजाए कई गंभीर सवालों को जन्म देनेवाला है । 

सीबीआई और ईडी काफी समय से संदेह और विवाद के घेरे में हैं । विगत कुछ वर्षों से इन दोनों जांच एजेंसियों के राजनीतिक इस्तेमाल के आरोप हमेशा सुर्खियों में रहते हैं । 

अभी जो सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही पूर्ववर्ती जजों की टिप्पणी दुहराते हुए सीबीआई को ‘पिंजरे में बंद तोता’वाली छवि से उबरने की सलाह दी, उस पर नया विवाद उभरा ।

इस विवाद में खुलकर सामने आए उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ जो सरकार और सदन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की किसी टिप्पणी का जवाब देने का अवसर प्रायः नहीं चूकते ।

तीन दिन बाद 16 सितंबर को उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने सुप्रीम कोर्ट की ‘पिंजरे में बंद तोता’वाली टिप्पणी पर कड़ा एतराज किया । मुंबई में संविधान मंदिर के उद्घाटन समारोह में उपराष्ट्रपति ने कहा कि ऐसी टिप्पणी संस्थाओं और जांच एजेंसियों को हतोत्साहित तथा उनके काम को नजरअंदाज करनेवाली हैं । सुप्रीम कोर्ट का नाम लिए बगैर उपराष्ट्रपति ने कहा कि सीबीआई पर ‘पिंजरे में बंद तोता’वाली टिप्पणी से राजनीतिक विवाद उभर सकता है और इसके कामकाज प्रभावित हो सकते हैं । जगदीप धनखड़ ने कहा कि सीबीआई स्वतंत्र रूप से कानून के शासन के अंतर्गत काम करती है । उन्होंने कहा - ‘मैं सम्बन्धित सभी पक्षों से अपील करूंगा कि कोई भी टिप्पणी सावधानीपूर्वक अपनी सीमाओं में रहकर करें और ऐसे शब्द बोलने से परहेज रखें जिससे राजनीतिक विवाद भड़के, क्योंकि इससे देश के लिए काम करनेवाली संस्थाओं पर नकारात्मक असर पड़ सकता है ।’ 

पहली बात तो इसी पर अभी संशय बरकरार है कि सीबीआई संविधान के उन कानूनों का हिस्सा है या नहीं, जिसके अंतर्गत कानून के शासन की व्यवस्था चल रही है । 

गुवाहाटी हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस इकबाल अहमद अंसारी और जस्टिस इंदिरा शाह की खंडपीठ ने  6-11-2013 को अपने ऐतिहासिक फैसले में सीबीआई को असंवैधानिक घोषित कर दिया । नवेन्द्र कुमार बनाम संघीय सरकार वाले मामले में दोनों जजों ने अपने फैसले में कहा कि सीबीआई से जुड़ा एक्ट संसद के दोनों सदनों से पारित और राष्ट्रपति की मुहर लगा हुआ बिल नहीं है । जजों ने कहा कि इस आशय का बिल न तो कभी संसद में पेश हुआ और न ही इस पर कोई चर्चा हुई, जो एक्ट बनने की संवैधानिक प्रक्रिया है । 

केंद्र सरकार ने उसके खिलाफ तुंरत सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगायी । उस वक्त चीफ जस्टिस पी॰ सदाशिवम और जस्टिस रंजना देसाई ने सुप्रीम कोर्ट का समय समाप्त होने के बाद चीफ जस्टिस के आवास पर सुनवाई करके तुरंत गुवाहाटी हाईकोर्ट के फैसले पर स्टे दे दिया । उसी स्टे पर सीबीआई का संवैधानिक दर्जा टिका हुआ है । न उस पर आगे कोई सुनवाई हुई, न ही सुप्रीम कोर्ट ने कोई फैसला दिया है । सदाशिवम को इनाम सरकार ने दिया और वे रिटायर होने के बाद चीफ जस्टिस जैसे पद की गरिमा को ताक पर रखकर केरल के राज्यपाल बन गए । 

२०१३ में ही कांग्रेस नीत संयुक्त प्रगतिशील गठजोड़ सरकार के कोलब्लॉक आवंटन और 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला की जांच में सीबीआई द्वारा लीपापोती से नाराज होकर तत्कालीन चीफ जस्टिस आर॰ एम॰ लोढ़ा ने सीबीआई को ‘पिंजरे का तोता’कहा । चीफ जस्टिस लोढ़ा और जस्टिस अल्तमस कबीर की सुप्रीम कोर्ट पीठ ने पूरी जांच प्रक्रिया की मानीटरिंग अपने हाथ में ले ली । उसी समय सीबीआई के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर अर्जी पर सरकार इसे ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष’जांच एजेंसी बता रही थी । जबकि सुप्रीम कोर्ट जज खुलआम कह चुके थे कि सीबीआई सरकार के प्रभाव में काम करती है । 

सीबीआई की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए ही सुप्रीम कोर्ट ने इसके डायरेक्टर के चयन के लिए अन्य संवैधानिक पदों वाली प्रक्रिया अपनायी और 2 साल से पहले नहीं हटाए जाने का प्रावधान कर दिया ।