भारत में फंसे विदेशी राष्ट्रीयता वाले कहां जाएं ?

- शशिधर खान

	





अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारतीय आप्रवासियों को सैनिक विमान से हाथ-पैर बांधकर बेड़ियों में जकड़कर जबरन वापस भारत भेज रहे थे, उसी समय सुप्रीम कोर्ट में असम में कई वर्षों से बंदी जैसी जिंदगी जी रहे विदेशियों के भविष्य पर सुनवाई चल रही थी । 

सुनवाई के दौरान १४ फरवरी को जस्टिस ए॰ एस॰ ओका और जस्टिस उज्जल भुयन की सुप्रीम कोर्ट पीठ ने केंद्रीय गृह मंत्रालय की दलील के जवाब में अमेरिकी राष्ट्रपति के रवैए की बकालत भी की । 

असम के मारिया ट्रांजिट कैंप में ‘डिटेंशन सेंटर’में रह रहे 270 विदेशियों ने अपने भविष्य के लिए सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगायीं । सुप्रीम कोर्ट पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि विदेशियों को अनिश्चित समय तक डिटेंशन में नहीं रखा जा सकता । यह मानवाधिकार के साथ-साथ संविधान की धारा २१ का भी उल्लंघन है, जो उन्हें राहत की गारंटी देता है । सुप्रीम कोठ पीठ ने कहा - ‘उन अवैध आप्रवासियों को विमान में बैठाएं और उस देश की राजधानी में उतारें जो उनका देश   है ।’ 

यह बात सुप्रीम कोर्ट जजों ने उस समय कही, जब केंद्रीय गृह मंत्रालय ने यह कहकर हाथ खड़े कर दिए कि विदेशी अता-पता के बिना और उस देश से समझौता के बगैर उन आप्रवासियों को निर्वासित नहीं किया जा सकता । 

उसी सिलसिले में सुप्रीम कोर्ट पीठ ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का उदाहरण दिया, जिनके लिए इतना ही जानना बाकी था कि ये अप्रवासी भारतीय हैं । विमान में जबरन डाला और अमृतसर में लाकर छोड़ दिया । 


१४ फरवरी को ही सुप्रीम कोर्ट जजों ने असम सरकार और केंद्रीय गृह मंत्रालय की दलील पर अमेरिकी प्रशासन के रवैए का उदाहरण दिया । लगभग 14-15 वर्षों से असम के मारिया ट्रांजिट कैंप में रह रहे ये 270 विदेशी पासपोर्ट एक्ट का उल्लंघन करने और उसकी वैधता की अवधि बीत जाने के कारण ‘डिटेंशन सेंटर’में रखे गए हैं । उनमें से कितने इस अपराध की सजा काट चुकने के बावजूद बेरोकटोक घूम-फिर नहीं सकते । विदेशियों के कागजात, पासपोर्ट की जांच पड़ताल जारी है । 

केंद्रीय गृह मंत्रत्राय ने सुप्रीम कोर्ट में बताया कि कोई भी विदेशी तभी वापस भेजा जा सकता है, जब उसके पास वैध पासपोर्ट/यात्रा कागजात हो । ऐसा नहीं होने पर उस देश के आवश्यक यात्रा दस्तावेज प्राप्त करना जरूरी है, जहां के वे हैं और उसक विदेशी की की राष्ट्रीयता की जांच का ही यह हिस्सा है, जो सम्बंधित देश के दूतावास/हाई कमीशन के जरिए होनी है । केंद्र सरकार के अनुसार विदेशियों के विवरण के साथ सम्बद्ध राज्य सरकार को विदेशी मंत्रालय से संपर्क करना होगा । केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में कहा - ‘राष्ट्रीयता की जांच विदेशी सरकार का सार्व भौम काम है और प्रक्रिया पूरी करने की कोई समय-सीमा तय नहीं की जा सकती । यात्रा कागजात उपलब्ध हुए बिना और राष्ट्रीयता की जांच किए बगैर किसी विदेशी/अवैध आप्रवासी को उसके देश भेजना संभव नहीं है । निर्वासन होने तक मारिया ट्रांजिट कैंप में रह रहे 270 विदेशियों की गतिविधियों पर नियंत्रण जरूरी है ।’ 

असम सरकार ने उसके पहले २२ जनवरी को सुनवाई के दौरान कहा कि विदेशी राष्ट्रीयता की पहचान के लिए गठित ट्राइबुनल ने ही उन्हें अवैध आप्रवासी घोषित किया । इसी की प्रतिक्रिया में सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कहा कि जब इतने वर्षों में कागजात/राष्ट्रीयता जांच प्रक्रिया अभी शुरू नहीं हुई, तो उन्हें ‘डिटेंशन सेंटर’में क्यों रखा गया है । सुप्रीम कोर्ट जजों ने कहा कि अगर आपको मालूम है कि कौन किस देश के हैं तो यह उस देश को तय करना है कि उन्हें कहां भेजा जाए । पता नहीं होना विदेशियों को डिटेंशन में रखने का कारण नहीं हो सकता, जिसकी कोई समय सीमा नहीं है । २२ जनवरी को असम सरकार की ओर से दायर हलफनामे को सुप्रीम कोर्ट ने ‘गड़बड़’बताया । 

09-01-2024 को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट जज ए॰ एस॰ ओका ने असम सरकार को फटकार के साथ ६ हफ्ते में हलफनामा दायर करने कहा । 22-01-2025 को ‘हलफनामे’से असंतुष्ट सुप्रीम कोर्ट पीठ ने अगली सुनवाई के दिन असम के मुख्य सचिव को स्वयं उपस्थित रहने का आदेश दिया । 2012 में भीम सिंह वाले मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जो विदेशी सजा की मियाद पूरी कर चुके हैं, उन्हें जेल से रिहा कर दिया जाए और निर्वासन तक उन्हें उपयुक्त स्थान पर रखा जाए, जहां उनकी गतिविधियों पर रोक रहे । जस्टिस ए॰ एस॰ ओका और उज्जल भुयन की पीठ को केंद्र सरकार ने 2012 की याद दिलाते हुए कहा कि केंद्र ने सभी राज्यों को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का अनुपालन करने कहा । 

भारत अवैध आप्रवासियों की समस्या से काफी समय से जूझ रहा है और उसी अनुपात में यहां आकर अनिश्चित तकदीर लिए समय काट रहे विदेशियों की जिंदगी पीढ़ी दर पीढ़ी अधर में लटकी है । असम ही नहीं, समूचे उत्तर पूर्वी राज्यों की आबादी और सामाजिक संतुलन इसके चलते बिगड़ा हुआ है । सबसे ज्यादा समस्या असम को लेकर पैदा हुई, जहां का मामला दो दशकों तक सुप्रीम कोर्ट में 2019-20 तक चला । 

असम में ट्राइबुनल गठन से लेकर नागरिक बने विदेशी घुसपैठियों और मूल नागरिकों की पहचान का काम सीधे सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चला । असम की समस्या मुख्य रूप से बांग्लादेशी घुसपैठियों को लेकर पैदा हुई । जिनकी पहचान भली-भांति कर ली गयी, उन्हें भी बांग्लादेश सरकार उस दौरान वापस लेने को राजी नहीं हुई, जब शेख हसीना प्रधानमंत्री थी और भारत से उनके अच्छे रिश्ते थे । अभी तो असंभव सा ही लगता है । शेख हसीना को अपदस्थ किए जाने के बाद से बांग्लादेश की कामचलाऊ सरकार के भारत से संबंध अच्छे नहीं चल रहे हैं । 

म्यांमार में फरवरी, २०२१ में सैनिक तख्तापलट में औंग सान सू की सरकार को जेल में डाले जाने के बाद से गृहयुद्ध की वजह से पूर्वोत्तर सीमा पर घुसपैठ बढ़ गयी है । मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री एन॰ बीरेन सिंह मई, २०२३ से बेहाल हिंसा का कारण म्यांमार सीमा से कुकी - जो समुदाय की घुसपैठ बता रहे हैं । गत हफ्ते इस्तीफा के बाद भी उन्होंने दुहराया । बौद्ध देश म्यांमार से भागे/भगाए गए रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थियों का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है । 

अमेरिका से भेजे गए भारतीय आप्रवासियों का मामला जरा इससे अलग है । पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने 17 फरवरी को पंजाब सरकार से 30 दिनों के अंदर यह बताने को कहा कि झांसा देकर फर्जी कागजात के आधार पर पैसे लेकर इन्हें विदेश भेजनेवाले फर्जी एजेंटों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गयी । वकील कंवर पाहुल की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस शील नागू और जस्टिस हरमिनदर सिंह ग्रेवाल ने पंजाब सरकार के साथ-साथ केंद्र सरकार को भी नोटिस जारी करके 1983 के आप्रवासी एक्ट के सेक्शन ६ के अंतर्गत चेक-प्वाइंट बनाने कहा, ताकि इस प्रक्रिया पर रोक लगे । केंद्र सरकार की ओर से कोर्ट में पेश वकील धीरज जैन ने कहा कि कई आप्रवासी अध्ययन का पर्यटक वीसा पर यूरोपीय देशों में अवैध तरीके से घुसे । अमेरिका अब तक 332 अवैध आप्रवासियों को भारत भेज चुका है । 

इसी विवाद के क्रम में यह बात प्रकाश में आयी कि केंद्र सरकार अबतक के सभी चार कानूनों को रद्द करके नया आप्रवासी और विदेशी बिल, 2025 में लाने जा रही है । यह बिल 10 मार्च से शुरू होनेवाले बजट सत्र के दूसरे चरण में संसद में रखने की योजना है । वर्तमान में पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) एक्ट, 1920, विदेशी पंजीकरण एक्ट, 1939, विदेशी एक्ट, 1946 और आप्रवासी (धारक दायित्व) एक्ट, 2000 के आधार पर आप्रवासी तथा विदेशियों की गतिविधियों का मामला डील होता है । इन चारों कानूनों की जगह नया बिल आएगा । इसमें 1983 के आप्रवासी एक्ट का जिक्र नहीं है, जिसके अंतर्गत पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने केंद्र तथा पंजाब सरकार को निटिश जारी किया है । 

प्रस्तावित आप्रवासी और विदेशी बिल, 2025 की जो मसौदा मीडिया को उपलब्ध कराया गया है, उसमें ‘डिटेंशन सेंटर’का अलग से उल्लेख है । इस नए कानून में ‘डिटेंशन सेंटर’की परिभाषा बदल दी गयी है । 

इस बिल के क्लाउज 13 में ‘डिटेंशन सेंटर’का इस्तेमाल ही नहीं किया गया है । उसकी जगह लिखा गया है कि ‘विदेशी आवास लायक जगह पर निगरानी में रहेंगे ।’2019 में सुप्रीम कोर्ट के ही निर्देश पर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने ऐसे विदेशियों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए डिटेंशन सेंटर मैनुअल’बनाया जो वैध कागजात नहीं होने के कारण निर्वासन की प्रतीक्षा में हैं । अभी सुप्रीम कोर्ट में केंद्र और असम सरकार ने मारिया ट्रांजिट कैंप में इस इंतजार में बैठे 270 विदेशियों के भविष्य पर सफाई दी है, उसका आधार २४ अप्रील, २०१४ और 01 जुलाई, २०१९ का दिशानिर्देश है ।  

इस सिलसिले में देहरादून से प्राप्त एक रिपोर्ट गौर करने लायक है, जो सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के समय ही सामने आयी । देहरादून की जेल में बंद सात विदेशी अपराधी डिपोर्ट (निर्वासन) किए जाएंगे । पुलिस सूत्रें के अनुसार जेल से छूटते ही इन्हें देश से बाहर करने की जिला पुलिस और स्थानीय इंटेंलिजेंस विभाग ने तैयारी पूरी कर ली है । पर्यटक और अन्य वीजा लेकर भारत आकर अपराध करनेवाले इन विदेशियों के कागजातों की जांच संबंधित देशों से करा ली गयी । उनकी राष्ट्रीयता भी पहचान में आ गयी । बस उनके जेल से छूटने का इंतजार है । ऐसा फटाफट कैसे हो गया । और असम में अपनी जिंदगी गिरवी रख चुके विदेशियों की तकदीर कब खुलेगी इस सवाल का क्या जवाब है । 

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्यों को विदेशियों की पहचान करने को कमिटियां बनाने कहा है । ये कमिटियां 01 जनवरी, २०११ से पहले और उसके बाद भारत में प्रवेश करनेवाले विदेशियों की पहचान के लिए गठित करने राज्य सरकारों को कहा गया । उन कमिटियों की अद्यतन रिपोर्ट उपलब्ध नहीं है ।