पूर्वात्तर शांति के लिए शुभ नया साल

- शशिधर खान

	





नया साल पूर्वोत्तर शांति के लिए शुभ माना जा सकता है । क्योंकि २०२३ समाप्त होते-होते असम और उत्तर पूर्वी राज्यों में 40 वर्षों से हिंसा का पर्याय बने यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असोम (उल्फा) के साथ त्रिपक्षीय समझौता शांति के एक नए युग की शुरूआत है । नेशनल सोसलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम (एनएससीएन - आई एम) को छोड़ दें तो उल्फा के साथ शांति समझौते के बाद पूर्वोत्तर में हिंसा और अलगाववाद पर आधारित उग्रवादी का लगभग खात्मा हो गया है । नगालैंड और मणिपुर में सक्रिय एनएससीएन के बाद पूर्वोत्तर क्षेत्र का सबसे मजबूत और खूंखार उग्रवादी गुट उल्फा का नेटवर्क असम ही नहीं समूचे पूर्वोत्तर तक पसरा हुआ था । इसलिए उल्फा के साथ शांति समझौता सही माएने में ऐतिहासिक और बहुत बड़ी उपलब्धि है । एनएससीएन की तरह उल्फा के साथ भी सशस्त्र बलों की बदौलत और वार्ता के जरिए भी किसी नतीजे पर पहुंचना संभव नहीं हो पा रहा था । एनएससीएन के स्वतंत्र संप्रभु नगालिम की मांग भारत की आजादी के समय से चली आ रही है । कुछ मुट्ठी भर अड़ियल नगा नेताओं की अव्यावहारिक हठधर्मी भारतीय संवैधानिक ढांचे के अंतर्गत इस अलगाववादी गुट को आने नहीं दे रही है । 

लेकिन यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असोम (उल्फा) के अस्तित्व में आने की कहानी 1980 के दशक के असम छात्र आंदोलन के समय से जुड़ी हे । 

हिंसा की बदौलत ‘स्वाधीन असोम’की मांग भारत सरकार से मनवाने के लिए 1979-80 में उल्फा की नींव रखी गयी । असम छात्र आंदोलन की आड़ में यह ऐसा उग्रवाद पढ़ाया, जिसे भारत राष्ट्र से अलग ‘स्वाधीन असोम’चाहिए था, जहां असमिया के अलावे कोई अन्य न रहे । 

यह अच्छा संयोग रहा कि 29 दिसंबर को दिल्ली में हुए त्रिपक्षीय समझौते के समय उल्फा के संस्थापक अरविंद राजखोबा मौजूद थे, जो अभी-भी उल्फा के प्रमुख हैं । समझौते पर हस्ताक्षर करनेवाले को अन्य उल्फा नेता अनूप चेतिया और सशाधर चौधुरी भी संस्थापकों में से हैं । यह त्रिपक्षीय समझौता केंद्र, राज्य सरकार और उल्फा नेताओं के बीच हुआ है, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण तथा शुभ यह है कि ये लोग हिंसा छोड़कर भारतीय संवैधानिक दायरे के अंतर्गत राष्ट्रीय मुख्यधारा में शामिल होने को राजी हुए हैं । असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा का इस समझौते को ‘ऐतिहासिक’और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का 29 दिसंबर को असम का ‘स्वर्ण दिवस’कहना सही है । 2009 में बांग्लादेश से प्रत्यर्पण संधि के बाद इन उल्फा नेताओं को भारत लाया गया । पहले कुछ दिन हिरासत में रखा गया, फिर शांति वार्ता शुरू हुई । २०११ से शांति वार्ताओं की जानकारी आने लगी । खुफिया अधिकारियों के प्रयास विफल होने के बाद असम के गणमान्य नागरिकों की भी मदद मिल गयी, जिसमें प्रख्यात असमिया लेखिका ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता इंदिरा गोस्वामी भी शामिल थी । मगर कोई सार्थक परिणाम नहीं निकला । उल्फा हमले से निबटने के लिए सेना और केंद्रीय बल तैनात रहे, वार्ता विफल होने की खबरें आती रही । लेकिन वर्ष २०१९ से २०२३ के दौरान यह पक्का पता नहीं चल पा रहा था कि उल्फा से वार्ता जारी भी है या नहीं । 


शुरू से ही वार्ता विरोधी उल्फा संस्थापकों में से एक परेश बरूआ के बारे में कोई पक्की सूचना नहीं है कि वह अपनी हिंसक गतिविधियां म्यांमार से चलाता है या बांग्लादेश से । उल्फा (स्वाधीन) का सर्वसर्वा खुद को बतानेवाला परेश बरूआ का अड्डा किस देश में है, इस पर भी सिर्फ अनुमान लगाया जाता है ।

जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी, तब उल्फा के विषय में रिपोर्ट थी कि इसका अड्डा बांग्लादेश में है । 1993 में प्रधानमंत्री पी॰ वी॰ नरसिंह राव से मिलने अपने गुप्त अड्डे से निकलकर उल्फा नेतागण दिल्ली आए थे, यह जानकारी अभी समझौते के समय असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने दी । उनसे पहले असम के मुख्यमंत्री रहे सर्वानंद सोनोवाल (अभी केंद्रीय मंत्री) उल्फा नेताओं को गुवाहाटी से लेकर 29 दिसंबर को दिल्ली आए थे । 

२०११ में जब उल्फा के राजखोवा गुट की केंद्र से वार्ता शुरू हुई तो, गुवाहाटी से उल्फा नेताओं से मिलकर दिल्ली लौटी लेखिका इंदिरा गोस्वामी ने असम भवन में बातचीत के दौरान मुझसे कहा - ‘दोनों पक्षों में से किसी को पीपुल्स कन्सलटेटिव ग्रुप (पीएसजी) पर भरोसा नहीं है । वार्ता बिना शर्त शुरू होने की बात थी और उल्फा तथा केंद्र दोनों अपनी-अपनी शर्तों में ही उलझे रहे ।’ पीएसजी का गठन इंदिरा गोस्वामी की अध्यक्षता में असम के गणमान्य नागरिकों को मिलाकर उल्फा को केंद्र के साथ वार्ता के टेबुल पर आने के लिए किया गया था । केंद्र के वार्ताकार पूर्व खुफिया प्रमुख पी॰ सी॰ हलदर को उल्फा का विश्वास जीतने में सफलता नहीं मिली । उस समय तक यही चर्चा थी कि उल्फा को बांग्लादेश और म्यांमार से शह मिलती है । प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के शासनकाल के दौरान भुटान सरकार की मदद से उल्फा पर काबू पाने में काफी हद तक सफलता मिली । उसी समय असम ने राज्यपाल ले॰ जनरल (रिटायर) एस॰ के॰ सिन्हा ने केंद्र को रिपोर्ट भेजी कि असम गण परिषद् सरकार की उल्फा से मिलीभगत है । 

वार्ता विरोधी गुट परेश बरूआ का अड्डा असम-म्यांमार-मणिपुर सीमा के आसपास है, जहां के इलाके से अफीम की खेती और तस्करी बरूआ समर्थित उल्फा काडरों की आय का साधन है । यह सूचना खुफिया तंत्र को अवश्य होगी और यह बात भी छिपी नहीं है कि अफीम की सेना के जवानों के बीच भी अच्छी खपत है । 


मणिपुर में शांति कायम न हो पाने की खबरें मई, २०२३ से लगातार आ रही हैं । ज्ञात रहे कि वहां कि हिंसा जातीय है, उग्रवादी नहीं । वहां की अशांति सामाजिक वैमनस्य के कारण है । 

असम हिंसा का अगर छात्र आंदोलन के समय से जिक्फ़्र करें तो उससे असम गण परिषद उभरे नेता सत्ता में आए । मगर जनता का विश्वास नहीं रख पाए और उल्फा के प्रति नरम बने रहे । असम में ज्यादा समय तक आंदोलन से पहले और उसके बाद भी कांग्रेस की सरकार रही । भाजपा दूसरी बार लगातार असम में सत्ता में लौटी, ठीक केंद्र की तरह । पूर्वोत्तर में शांति और विकास गाड़ी सड़क के साथ-साथ रेल पटरियों पर भी दौड़ रही है । त्रिपुरा में खोवाई से हरीना के बीच 135 किमी, एनएच के चौड़ीकरण के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 2,486.78 करोड़ रूपये की परियोजना मंजूर की   है ।