उल्फा शांति समझौते के आसार बन रहे हैं

                                                                                                 - शशिधर खान

	



 ‘स्वाधीन संप्रभु असोम’के लिए हिंसक आंदोलन छेड़नेवाले युनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) चेयरमैन अरविंद राजखोवा ने १५ अगस्त को या उससे पहले केंद्र सरकार से अंतिम समझौते की उम्मीद जतायी है । उन्होंने कहा है कि उल्फा और केंद्र के बीच शांति वार्ता अंतिम चरण में पहुंच चुका है, इसलिए अब समझौता हो जाने की उम्मीद है । 

असम के सबसे मजबूत उग्रवादी गुट उल्फा के चेयरमैन अरविंद राजखोवा शांति वार्ता के जरिए इस पेचीदा संकट का समाधान निकालने के समर्थक हैं । उल्फा हिंसा पर काबू पाना असम सरकार और केंद्र सरकार दोनों ही के लिए कई दशकों से सिरदर्द बना हुआ है । सिर्फ हिंसा के जरिए ‘स्वाधीन संप्रभु असोम’की मांग पर अड़ा उल्फा के विद्रोही गुट उल्फा (आई-इंडिपेंडेंट-स्वतंत्र) के भूमिगत चीफ कमांडर परेश बरूआ शांति वार्ता के खिलाफ हैं । असम पुलिस और केंद्रीय बलों के लिए इसे नियंत्रण में लेना चुनौती है । खुफिया एजेंसियां भी उल्फा (आई) के हमलों के बाद भूमिगत परेश बरूआ के कभी चीन, कभी म्यांमार तो कभी बांग्लादेश में होने की अटकलबाजी लगती हैं । 

अरविंद राजखोवा का ऐसे समय में अनुकूल आसार वाला यह बयान स्वागत योग्य है, जब पूरा देश भारतीय आजादी का 75वां वर्ष अमृत महोत्सव के रूप में मना रहा है । बयानबाजी और प्रचार-प्रसार से दूर रहनेवाले उल्फा प्रमुख राजखोवा ने एक अखबार से बातचीत में इस बीच कहा कि वर्षों तक चली शांति वार्ता पूरी हो गयी है । यह पूछे जाने पर कि क्या आपको सरकार के इरादे पर अभी भी संदेह है, उल्फा चेयरमैन ने कहा - ‘हम इसलिए आशावान हैं, क्योंकि कई वर्षों से चल रही वार्ताओं के बाद दोनों पक्षों की समान स्थिति है । हालिया वार्ता से हमें यह संकेत मिला है कि केंद्र सरकार अंतिम समझौते के प्रति गंभीर है । जहां तक हमारे पक्ष की बात है, हम १५ अगस्त को या उससे पहले समझौते की उम्मीद कर रहे हैं ।’

अरविंद राजखोवा ने कहा कि ‘गेंद अब केंद्र सरकार के पाले में है । अभी भी कुछ समय बचा है और हमें भरोसा है कि सरकार जल्द ही बुलाएगी ।’

इसमें गैर करने लायक बात ये है कि भारत के खिलाफ खुला विद्रोह करके ‘स्वाधीन संप्रभु असोम’की मांग के लिए हिंसक आंदोलन की नींच रखनेवाले उल्फा चेयरमैन अरविंद राजखोवा ने अंतिम समझौते की तारीख १५ अगस्त रखी । उल्फा आंदोलन में १५ अगस्त को ‘काला दिवस’के रूप में मनाने, भारतीय संविधान की प्रतियां जलाने और स्वतंत्रता दिवस समारोह के समय हमले की वारदातों का इतिहास दर्ज है । 

उल्फा प्रमुख राजखोवा ने संभावित समझौते के विषय में विस्तृत जानकारी देने से इन्कार कर दिया और यह भी स्पष्ट बताने से मुकर गए कि किन-किन विंदुओं पर सहमति हुई है । 

‘स्वाधीन संप्रभु असोम’वाले अव्यावहारिक पहलू पर कोई चर्चा केंद्र के वार्ताकार से होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता, क्योंकि ऐसा प्रावधान भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में नहीं है । ‘स्वतंत्र संप्रभु नगालिम’का एक देश की तरह ‘अलग झंडा अलग संविधान’के अड़ियल रवैए के कारण नगा शांति समझौता किसी नतीजे पर नहीं पुहंच पा रहा है । केंद्र की ओर से नियुक्त वार्ताकार पूर्व खुफिया अधिकारी अक्षय कुमार मिश्र ने विगत दिनों काफी समय तक नगालैंड में सभी नगा गुटों से उनके बीच रहकर बातचीत की है । अगर अंतिम समझौते पर सहमति बनी होती तो यह बात छिपी नहीं रहती । 

केंद्र सरकार ने उल्फा नेताओं से वार्ता चलाने का जिम्मा भी अक्षय मिश्र को ही सौंपा हुआ है । इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) के पूर्व स्पेशल डायरेक्टर अक्षय मिश्र के नगा नेताओं से मिलने-जुलने की सूचना तो कहीं-न-कहीं से बाहर आ जाती है । लेकिन उल्फा नेताओं से अक्षय मिश्र कब-कब मिले, क्या बातचीत हुई, यह बात अभी तक गुवाहाटी से बाहर नहीं निकली थी । उल्फा चेयरमैन अरविंद राजखोवा ने ही यह खुलासा किया कि अक्षय मिश्र से उन्होंने मामले का उल्द समाधान निकालने का आग्रह किया है । वैसे अभी तक केंद्र या असम सरकार के किसी प्रतिनिधि ने वार्ता के अंतिम चरण में पहुंचने या १५ अगस्त तक समझौते पर हस्ताक्षर होने की संभावना व्यक्त नहीं की है । अरविंद राजखोवा के बयान पर दिल्ली या गुवाहाटी से कोई प्रतिक्रिया भी नहीं आयी है । उस संभावना की न तो पुष्टि की गयी है, न ही खंडन हो सकता है, १५ अगस्त के दिन या उसके पहले असम के लोगों के लिए अमृत महोत्सव का ‘कौतुक तोहफा’हो । लेकिन उल्फा प्रमुख ने जितनी बातें कही, उससे तस्वीर साफ नहीं हो रही है । केंद्र के वर्तमान वार्ताकार से उल्फा की बहुत कम बातें हुई हैं । इस बार राजखोवा कभी दिल्ली नहीं गए । अक्षय मिश्र से बातचीत के लिए कोई नया मुद्दा नहीं था । केंद्र द्वारा नियुक्त पहले के वार्ताकारों से उल्फा की सभी मुद्दों/मांगों पर चर्चा हो चुकी है । अब सिर्फ समझौते पर दस्तखत बचा है । ये कहना था, उल्फा प्रमुख का । 

पहले के वार्ताकारों से दिल्ली में और गुवाहाटी दोनों जगह अरविंद राजखोवा उल्फा (आई) चीफ कमांडर परेश बरूआ को शामिल किए बगैर कोई भी शांति वार्ता अधूरी रहने की बात कह चुके हैं । लेकिन अभी राजखोवा ने परेश बरूआ का जिक्र नहीं किया । शांति वार्ता के हिमायती होने के कारण अरविंद राजखोवा को उल्फा चेयरमैन पद से हटाकर परेश बरूआ खुद को असली उल्फा का प्रमुख घोषित कर चुका है । 

अरविंद राजखोवा ने असमिया लोगों के अधिकारों और उसकी संवैधानिक गारंटी की बात कही है तथा धमकी भी दी है कि अगर कोई अनिश्चितता या टालमटोल रवैया सरकार अपनाएगी तो वे दस्तखत नहीं करेंगे तथा मामले को आगे ले जाने के लिए अगली पीढ़ी के जिम्मे छोड़ देंगे ।

उल्फा चेयरमैन ने जोर देकर कहा - ‘अभी मैं यह खुलासा नहीं कर सकता कि किस तरह का आश्वासन हमें केंद्र से दिया गया है, पर इतना कह सकता हॅूं कि हमने संवैधानिक गारंटी मांगी है, अगर सरकार मानती है, तभी समझौते पर दस्तखत करेंगे ।’

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने 01-01-2022 को जनता के नाम प्रसारित अपने बधाई संदेश में कहा कि उल्फा शांति प्रक्रिया अंतिम दौरे में है और उल्फा (आई) को अंतिम रोड़ा बताया ।

परेश बरूआ गुट वाला उल्फा (आई) को लेकर असम सरकार संवेदनशील है और जनता से ज्यादा पुलिस में इसका खौफ है । हाल की एक घटना इसका उदाहरण है । 19 साल की एक कालेज छात्र बर्शाश्री बर्गोहेन को असम पुलिस ने फेसबुक पोस्ट कविता के कारण उल्फा (आई) समर्थक होने के संदेह में यूएपीए (गैर कानूनी गतिविधियां रोक एक्ट) के अंतर्गत गैरजमानती धाराएं लगाकर गिरफ्तार कर लिया । गिरफ्तारी के दो महीने के बाद गुवाहाटी के एक स्थानीय अदालत ने जमानत नहीं दी । परीक्षा देने की इजाजत मांगने पर सिर्फ उसकी व्यवस्था करने का आदेश जेल अधिकारियों को १४ जुलाई को दिया । छात्र की परीक्षा 01 अगस्त तक थी । मुख्यमंत्री ने दावा किया कि बर्गोहेन ने उल्फा (आई) में शामिल होने का इरादा जाहिर किया था, इसलिए गिरफ्तार किया गया । मुख्यमंत्री ने कहा कि छात्र के मां-बाप अगर ऐसी ‘अंडरस्टेडिंग’दें कि वैसा नहीं करेगी तो रिहा कर दिया जाएगा । एफआईआर के अनुसार छात्र का फेसबुक पोस्ट कविता असमिया में यों हैं - ‘स्वाधीन सुरूजोर दिशे अकउ एखुज, अकउ कोरीम राष्ट्रो द्रुह’(आजादी की दिशा में एक और कदम, फिर से हम विद्रोह करेंगे) असम के स्पेशल डीजीपी (कानून व व्यवस्था) जी॰ पी॰ सिंह ने इसे आपराधिक मामला बताया । बर्शाश्री के वकील ने कहा कि कविता में सुरूज (सूर्य) का जिक्र है जो उल्फा (आई) का प्रतीक है, मगर उल्फा (आई) का नाम नहीं है । 



असम में भाजपा के पहले शासनकाल में 22-04-2018 को पीपुल्स कन्सल्टेटिव ग्रुप (पीसीजी) के एक सम्मानित सदस्य रेवती फूकन अपने गुवाहाटी स्थित घर से लापता हो गए । वे परेश बरूआ के ग्रामीण सहपाठी थे । पुलिस की रूखाई के बाद रेवती फूकन के परिवारजनों को सुप्रीम कोर्ट के पास गुहार लगानी पड़ी । कुछ महीने बाद फूकन के मृत पाए जाने की रिपोर्ट मिली ।