सूचना आयोगों का काम-काज डंप होने की हालत में
- शशिधर खान
केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) समेत राज्य सूचना आयोगों में मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों के पद काफी समय से रिक्त पड़े होने के बावजूद केंद्र तथा राज्य सरकारों के उपेक्षापूर्ण रवैए के कारण ये हालत है कि आयोगों के लिए सूचना अधिकार (RTI) आवेदनों का निबटारा करना कठिन हो गया है ।
आम जनता तो अपने इस अधिकार का इस्तेमाल करने के प्रति सचेत है, सूचना पाने के आवेदन दाखिल किए जा रहे हैं । आम लोगों को केंद्र और राज्य सरकारों का आरटीआई (RTI) आवेदन निबटाने के लिए ही गठित सूचना आयोगों में आयुक्तों की नियुक्तियां टालते रहने की नीति से कोई लेना-देना नहीं है । अपनी जिम्मेदारी से भागने के सरकार के चलन की जानकारी अवाम तक तब पहुंचती है, जब कोई जागरूक नागरिक या आरटीआई कार्यकर्ता सरकारों के रवैए के खिलाफ हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दायर करते हैं ।
सरकारों की लचर और उपेक्षापूर्ण नीतियों के कारण केन्द्रीय सूचना आयोग के साथ-साथ राज्य सूचना आयोगों में भी काम-काज लगभग ठप्प होने की नौबत है । हजारों की संख्या में आरटीआई आवेदन निबटाना इक्का-दुक्का सूचना आयुक्तों के वश का नहीं है । इसके लंबित आवेदनों की संख्या बढ़ती जा रही है । कई राज्यों में भी मुख्य राज्य सूचना आयुक्त समेत सूचना आयुक्तों के पद वर्षों से रिक्त हैं ।
राज्यों की कौन कहे, केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) में ये हालत है कि मुख्य सूचना आयुक्त समेत कई सूचना आयुक्त पद कई महीनों से रिक्त पड़े हैं । केंद्र सरकार तब चेती जब सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी करके कैफियत मांगी ।
इस संबंध में दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही सुप्रीम कोर्ट जस्टिस सूर्यकान्त की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल के॰ एम॰ नटराज ने अपने जवाब में कहा कि केंद्रीय सुचना आयोग में रिक्तियां दो से तीन हफ्ते में भर ली जाएंगी । खुद के॰ एम॰ नटराज ने सुप्रीम कोर्ट पीठ को बताया कि केंद्रीय सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त (सी आई सी) समेत कई सूचना आयुक्तों के पद रिक्त हैं और इनकी संख्या घटकर 2 रह गयी है, जबकि सूचना आयोग में कुल स्वीकृत क्षमता 10 सूचना आयुक्तों की है ।
एएसजी (अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल) ने केंद्र की ओर से कैफियत के जरिए चल रहा है । साथ-साथ ए एस जी ने सुप्रीम कोर्ट को यह जानकारी भी दी कि उम्मीदवारों के छंटनी किए गए नाम उच्चस्तरीय चयन कमिटी के पास भेज दिया गया है । इस चयन समिति के अध्यक्ष प्रधानमंत्री हैं और दो अन्य सदस्यों में लोकसभा में विपक्ष के नेता तथा सरकार की ओर से नामित केंद्रीय मंत्री हैं ।
सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाने की नौबत क्यों आयी, यह जानकारी याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट प्रशांत भूषण ने केंद्र की दलील का खंडन करके शीर्ष कोर्ट को दी । मुख्य सूचना आयुक्त के रिटायर हुए कई महीने हो गए । केन्द्रीय सूचना आयोग में रिक्तियां भरने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने 10 महीने पहले दिये थे, लेकिन इस बाबत केंद्र सरकार ने अभी तक कुछ नहीं किया । केंद्र सरकार आरटीआई (सूचना अधिकार) को ही पंगु बनाने के इंतजाम में आहिस्ता-आहिस्ता लगी है । ध्यान रहे कि यह दलील प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में गत 28 अक्टूबर को सुनवाई के दिन पेश की ।
सी आई सी समेत सूचना आयुक्तों के पद काफी समय से रिक्त होने से उत्पन्न स्थिति से सुप्रीम कोर्ट को अवगत कराते हुए प्रशांत भूषण ने बताया कि सूचना अधिकार कानून के तहत सूचना आयुक्तों के पद रिक्त पड़े रहने के प्रति केंद्र सरकार के उपेक्षापूर्ण रवैए के कारण सूचना आयोग में लंबित आवेदनों की संख्या 30,000 तक पहुंच गयी है ।
अर्जियां दायर करनेवालों में अंजलि भारद्वाज, कमांडर लोकेश बतरा (रिटायर) और अमृता जोहरी हैं । इनकी ओर से वकील प्रशांत भूषण ने केंद्र के प्रतिनिधि के॰ एम॰ नटराज की सूचना आयुक्तों की नियुक्तियों के बारे में केंद्र को दी गयी जानकारी के जवाब में कहा कि पूरी नियुक्ति प्रक्रिया में सूचना ब्लैकआउट है । कहीं से भी पारदर्शिता नहीं झलक रही है । आवेदनों की छंटनी और चयन के विषय में सब कुछ गोपनीय है । अचानक नाम उजागर हो जाएगा, चयन समिति के पास नाम जाने और उसकी बैठक की भी सूचना डंप है ।
प्रशांत भूषण के साथ वकील राहुल गुप्ता और चेरिल डीसूजा ने भी सुप्रीम कोर्ट पीठ को बताया कि सूचना आयुक्तों के बारे में किसी को कानोंकान सूचना नहीं है कि किनकी नियुक्ति होने जा रही है । वकीलों ने तर्क दिया कि आरटीआई (RTI - सूचना अधिकार) को ही खतम करने का सबसे अच्छा तरीका है कि नियुक्तियां टाली जाय । केंद्र और राज्य सरकारों को अगर नियुक्तियां करनी है, तो यह अवाम की जानकारी में करनी चाहिए, जिसे आर टी आई एक्ट के अंतर्गत कोई भी सूचना हासिल करने का अधिकार है ।
केंद्रीय सूचना आयोग के साथ-साथ राज्य सूचना आयोगों का भी खस्ता हाल है । केंद्र जैसा ही रवैया राज्य सरकारों का भी चल रहा है ।
केंद्र समेत राज्य सरकारों का काम टालने से नहीं चल पाएगा । क्योंकि सूचना आयुक्तों के खाली पड़े पदों को गंभीरता से लेनेवाले पीठ के जज सूर्यकान्त २० नवंबर को सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस हो जाएंगे और इस महीने के अंतिम सप्ताह से पहले अनुपालन रिपोर्ट पेश करनी है । केंद्र को सी आई सी नियुक्तियों से सुप्रीम कोर्ट चीफ को अवगत कराना है ।
बिहार, तमिलनाडु, ओडिशा, कर्नाटक, महाराष्ट्र में बड़ी संख्या में लंबित अपीलों और शिकायतों को देखते हुए आवश्यकतानुसार अतिरिक्त पद स्वीकृत करने पर शीघ्र निर्णय लेने भी इन राज्यों की सरकारों से सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कहा । स्वीकृत पदों पद वर्षों से सूचना आयोग नियुक्तियां टालते रहनेवाली सरकारें सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर कितने समय में अमल करती हैं, यह तो आनेवाला वक्त बताएगा ।
केंद्रीय सूचना आयोग में सी आई सी और सूचना आयुक्त पदों पर नियुक्तियां केंद्र सरकार की प्राथमिकता कभी नहीं रही । सूचना अधिकार को निष्प्रभावी बनाए रखने के लिए सूचना आयोग को कायदे से काम करने लायक नहीं रहने देना और इसके लिए चयन प्रक्रिया लटकाए रखना केंद्र का पुराना उसूल घिसा-पिटा है । सुप्रीम कोर्ट जज और अर्जियां लगानेवालों की ओर से पेश वकीलों ने गलत नहीं कहा । इस माएने में केंद्र की भाजपानीत गठजोड़ सरकार का भी 11 वर्षों से वही रवैया चल रहा है, जो उसके पहले 10 वर्षों तक कांग्रेस नीत गठजोड़़ सरकार का था । २०१४ में भाजपा के केंद्र में सत्ता में आने के कुछ ही महीने बाद सी आई सी (केन्द्रीय सूचना आयुक्त) का पद रिक्त हो गया । केंद्र सरकार उदासीन बनी रही । मामला सुप्रीम कोर्ट गया और स्रुप्रीम कोर्ट की ओर से दी गयी डेडलाईन समय-सीमा के बाद चयन प्रक्रिया शुरू हुई । अभी तक वही नीति चल रही है । विगत 11 वर्षों में शायद ही किसी सीआईसी की नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बगैर हुई हो ।
कांग्रेस नीत गठजोड़ सरकार ने 2005 में सूचना अधिकार को भ्रष्टाचार पर लगाम का एक कारगर कदम बताते हुए आरटीआई एक्ट लागू करने का श्रेय लिया । जबकि सत्ता के बाहर होनेवाली भाजपा गठजोड़ सरकार पहले ही इसका श्रेय ले चुकी थी । कांग्रेस के चुनाव प्रचार का एक प्रमुख मुद्दा था, आर टी आई एक्ट । उस समय से लेकर अभी तक आर टी आई एक्ट कमजोर होता गया है ।
२०१९ में लगातार दूसरी बार केंद्र की बागडोर संभालने के बाद भाजपा गठजोड़ सरकार ने आर टी आई एक्ट, 2005 (संशोधन) बिल, २०१९ संसद से पास कराया । इसमें आर टी आई एक्ट, 2005 की धारा 13, 16 और 27 को बदल कर केंद्रीय सूचना आयोग के पर कतर दिए गए । इस संशोधन के अनुसार सी आई सी और सूचना आयुक्तों की नियुक्ति की समीक्षा करने का अधिकार सरकार ने अपने हाथ में ले लिया । आर टी आई एक्ट, 2005 के अंतर्गत सी आई सी और सूचना आयुक्तों का कार्यकाल ५ (पांच) वर्ष या 65 वर्ष की उम्र तक फिक्स था । यह अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्ववाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ सरकार ने ही किया था ।
आर टी आई एक्ट में कमाल की बात है कि सी बी आई इसके दायरे में नहीं है, जिसके बारे में आम जनता जानती है कि यह भ्रष्टाचार निरोध ‘निष्पक्ष स्वतंत्र’जांच एजेंसी केंद्र सरकार के इशारे पर काम करती है । आर टी आई एक्ट, 2005 (संशोधन), २०१९ के लागू होने के चार महीने बाद नवंबर, २०१९ में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट पीठ ने सीजेआई (भारत के प्रधान न्यायाधीश) कार्यकाल को आरटीआई के दायरे में बताया ।
सबसे ज्यादा बढ़-चढ़कर प्रचार लोकपाल के बारे में होता आया है, जिसके बारे में आम जनता को बताया गया कि यह प्रधानमंत्री, केन्द्रीय मंत्री, संसद सदस्य जैसे हाईप्रोफाईल हस्तियों समेत सरकारी व्यक्तियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायतों की जांच करनेवाली उच्चाधिकार प्राप्त संवैधानिक संस्था होगी । ऐसे लोकपाल के गठन के प्रति केंद्र सरकार का नजरिया देखिए । इसमें कांग्रेस से ज्यादा भाजपा का काम गौर करने लायक है, जो भ्रष्टाचार को कांग्रेस की देन और ईमानदारी/पारदर्शिता का श्रेय खुद को देती है । लोकपाल और लोकायुक्त एक्ट, २०१३ में राष्ट्रपति की मुहर लगने के बाद लोकपाल एक्ट लागू हो गया । २०१४ के मई में कांग्रेस को हराकर सत्ता में आने के बाद भाजपा गठजोड़ ने लोकपाल एक्ट को उसी हालत में सिर्फ सरकारी दस्तावेज बने रहने दिया । लोकपाल गठन की चिंता भाजपा को अपना पहला पांच साल का कार्यकाल पूरा होने तक नहीं हुई । २०१९ आम चुनाव करीब आने के समय 19 मार्च, २०१९ को पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज पिनाकी चन्द्र घोष देश के पहले लोकपाल बने, मगर लोकपाल संस्था का विधिवत् गठन टलता रहा । कई महीनों तक लोकपाल के पास न तो अपना कार्यालय था, न स्टाफ । यही रवैया लोकायुक्त गठन के प्रति राज्य सरकारों का भी रहा, चाहे वो किसी भी दल का गठजोड़ का क्यों न हो । सूचना आयुक्त की तरह विभिन्न राज्यों में लोकायुक्त का भी पद रिक्त है ।
आरटीआई कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज और कमांडर लोकेश बतरा (जिन्होंने सीआईसी वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट में लगायी है) ने सूचना अधिकार के तहत लोकपाल के कामकाज की ताजा जानकारी उपलब्ध करायी है । लोकपाल के अभियोग विंग की अधिसूचना जून, 2025 में गठन के ६ साल बाद जारी की गयी । भ्रष्टाचार पर शिकंजा के प्रति गंभीरता और पारदर्शिता का ये है पैमाना ।
लोकपाल संस्था अभी तक मात्र 289 प्रारंभिक जांच कर पायी है । लोकपाल को मिलनेवाली शिकायतों में लगातार गिरावट आती जा रही है । गठन के समय 2019-20 से 2022-23 तक 2,469 शिकायतें मिली जो इस वर्ष सितंबर तक घटकर 233 हो गयी ।
एक हाईकोर्ट जज को नोटिस भेजने से बिफरे सुप्रीम कोर्ट ने लोकपाल के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठा दिया ।
इन दिनों लोकपाल कार्यालय हाईप्रोफाईल हस्तियों के इस्तेमाल में आनेवाली सात BMW 3 और 330 Lप कारों की खरीद का टेंडर निकालने के कारण विवाद सुर्खियों में है । वर्तमान लोकपाल अध्यक्ष जस्टिस ए॰ एम॰ खानविलकर और सात सदस्यों (स्वीकृत पद 8 हैं) को केंद्रीय मंत्रियों को मिली कारें चाहिए, जो आज तक किसी केंद्रीय मंत्री की कौन कहे, एक संसद सदस्य के खिलाफ शिकायतों की जांच नहीं कर पाए ।
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