सूचना आयोग रिक्तियों पर सरकार का लचर रवैया

                                                                                     - शशिधर खान

	



सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों से केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) तथा राज्य सूचना आयोग (एसआईसी) में रिक्त पदों को भरने के लिए शीघ्र कदम उठाने कहा है ।

चीफ जस्टिस डी॰ वाई॰ चन्द्रचूड़ की अध्यक्षता वाली तीन जजों की सुप्रीम कोर्ट पीठ ने केंद्र को तीन हफ्ते के अंदर राज्यों से यह आकड़ा एकत्र करने का निर्देश दिया है कि सीआईसी और एसआईसी में कितने पद कितने समय से रिक्त हैं तथा कुल क्षमता कितनी है । पीठ ने केंद्र से यह विवरण भी प्रस्तुत करने कहा है कि ३१ मार्च, २०२४ तक कितने पद खाली होंगे और लंबित मामलों की संख्या कितनी हो जा सकती है । 

सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कड़े शब्दों में केंद्र और राज्य सरकारों को निर्देश देते हुए कहा - ‘‘इसके पहले कि केंद्रीय सूचना आयोग और राज्य सूचना आयोग बिल्कुल ‘निsष्क्रिय’ हो जाए तथा जनता का सूचना अधिकार (आरटीआई) ‘डेड लेटर’ बन जाए, रिक्त पदों को भरने के लिए कदम उठाएं ।’’

सुप्रीम कोर्ट इस संबंध में अगली सुनवाई की तारीख तीन हफ्ते के बाद तय करेगी । 

सीआईसी (CIC -केंद्रीय सूचना आयोग) और एसआईसी (SIC -राज्य सूचना आयोग) में खाली पड़े पदों पर नियुक्तियों के प्रति केंद्र और राज्य सरकारों का उदासीन रवैया के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान भारत के प्रधान न्यायाधीश समेत तीन न्यायाधीशों की पीठ ने ३१ अगस्त को यह आदेश जारी किया । 

याचिका सामाजिक कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज, रिटायर कमांडर लोकेश बतरा और अमृता जौहरी ने लगायी थी, जिनकी ओर से सीनियर एडवोकेट प्रशांत भूषण सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए । 

सीआईसी में मुख्य सूचना आयुक्त समेत सूचना आयुक्तों के पद खाली रहने के बावजूद सरकार की उदासीनता नयी नहीं है । यह मामला कई बार सुप्रीम कोर्ट में गया है और शीर्ष कोर्ट की फटकार के बावजूद केंद्र सरकार टालमटोल करती रही । काफी जद्दोजहद और सुप्रीम कोर्ट की अवमानना के जवाब में कैफियत देने के बाद नियुक्ति की गयी । केंद्र सरकार ने देश के सामने साबित कर दिया कि केंद्रीय सूचना आयोग में पद खाली होने से पहले भरने में कोई रूचि नहीं है, ताकि आरटीआई आवेदन लंबित होने की नौबत न आए । 

जाहिर है कि सुप्रीम कोर्ट ने सूचना आयोगों के रिक्त पदों की याचिका पर सुनवाई के दौरान आरटीआई आवेदनों के निष्पादन में अनावश्यक देरी को देखते हुए केंद्र सरकार से यह विवरण मांगा है कि 31/03/2024 तक लंबित आवेदनों की संख्या बढ़कर कितनी हो जाने की संभावना है ।  

सुप्रीम कोर्ट पीठ ने ऐसे समय में केंद्र से इस बाबत जवाबतलब किया है, जब चुनावी बांड के नाम पर विभिन्न घरानों से चंदे के रूप में करोड़ों रूपये की फंड उगाही को पारदर्शी बनाने के लिए सूचना अधिकार के दायरे में लाने की बात खुद चीफ जस्टिस डी॰ वाई॰ चन्द्रचूड़ ने कही है । २०१८ की चुनावी बांड योजना को चुनौती देनेवाली याचिका पर सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट पीठ ने अपनी टिप्पणी में कहा कि यह जानने का अधिकार जनता को है कि किस नियम के तहत विपक्षी दलों को मिलनेवाले बेनामी फंड उजागर हो जाती है और सत्तारूढ़ दल को प्राप्त फंड की जानकारी गुप्त रखी जाती है । 

एक ओर सुप्रीम कोर्ट के कुछ महत्वपूर्ण जनहित फैसलों से सीआईसी पर बोझ बढ़ता जा रहा है, दूसरी ओर केंद्र सरकार ने सीआईसी को लचर बनाने के सारे हथकंडे अपनाए हैं । 

२०१८ में जब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय सूचना आयुक्त, सीआईसी कार्यालय और राज्य सूचना आयोग में कई महीनों से खाली पड़े पदों पर नियुक्तियों के संबंध में सरकार से जवाबतलब किया, उस समय केंद्र सरकार आरटीआई (संशोधन) बिल लाने की तैयारी में जुटी थी । जस्टिस ए॰ के॰ सीकरी और जस्टिस अशोक भूषण की पीठ ने जुलाई, २०१८ में कहा कि केंद्रीय सूचना आयोग में चार पद रिक्त हैं, तथा दिसंबर में चार और रिक्त हो जाएंगे, इसलिए केंद्र सरकार चार हफ्ते के अंदर बताए कि कितने समय में ये नियुक्तियां हो जाएंगी । सुप्रीम कोर्ट पीठ ने केंद्र के साथ-साथ 7 राज्यों को भी ऐसा ही निर्देश दिया ।

मुख्य सूचना आयुक्त का पद 2015 में भी कई महीनों तक खाली रहा । चयन प्रक्रिया दिल्ली हाईकोर्ट की इस फटकार के बाद शुरू की गयी कि ‘कोर्ट के दखल होते तक लंबे समय के लिए महत्वपूर्ण पद खाली रखी जाती है ।’ जबकि उस समय तक मुख्य सूचना आयुक्त की कुर्सी के खाली हुए ९ महीने गुजर चुके थे और उसके अलावे तीन सूचना आयुक्तों के पद भी रिक्त पड़े थे । आखिरकार दिसंबर, 2015 में पूर्व रक्षा सचिव आर॰ के॰ माथुर सीआईसी नियुक्त हुए । 

अप्रील, २०१८ में विधि आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को सौंपी गयी अपनी रिपोर्ट में कहा कि बीसीसीआई  (BCCI- बोर्ड ऑफ कंट्रोल फॉर क्फि़्रकेट इन इंडिया) सार्वजनिक महकमे में आता है, इसलिए इसे आरटीआई के अंतर्गत लाया जाना चाहिए । 

2016 में सुप्रीम कोर्ट ने यह विचार करने का काम विधि आयोग को सौंपा कि क्रिकेट खेलों से जनता का करोड़ों रूपये भारत क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के खाते में जाता है, इसलिए इसे सूचना अधिकार कानून के दायरे में लाया जा सकता है या नहीं ।

२०१९ में संसद के शीतकालीन सत्र के समय सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में प्रधान न्यायाधीश के कार्यालय को आरटीआई के दायरे में ला दिया । उस समय सुप्रीम कोर्ट पीठ के एक सदस्य डी॰ वाई॰ चन्द्रचूड़ थे । २०१९ में संसद के मानसून सत्र में ही केंद्र सरकार ने विवादों के बीच आरटीआई संशोधन बिल संसद से पास कराकर सीआईसी के पंख कतर दिए । सीआईसी को सरकार विभाग की तहर ऐसा बना दिया गया ताकि कोई ऐसी सूचना जनता तक नहीं पहुंचे जो सरकार न देना चाहे । 

अभी जो ताजा मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा है वो ये है कि मुख्य सूचना आयुक्त वाई॰ के॰ सिन्हा का कार्यकाल 03/10/2023 को पूरा होने के बाद से सीआईसी की कुर्सी खाली पड़ी है । सुप्रीम कोर्ट से नोटिस के जवाब में शीर्ष कोर्ट की ओर से दी गयी समय सीमा समाप्त होने से पहले केंद्र सरकार ने मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति उसके लिए निर्धारित प्रक्रिया अपनाए बिना कर डाली । विवादास्पद मामले में एक और नया विवाद जुड़ गया । 

सूचना आयुक्त हीरालाल समरिया को राष्ट्रपिता द्रौपदी मूर्मू ने 06 नवंबर को मुख्य सूचना आयुक्त की शपथ दिला दी । उसके खिलाफ लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधुरी ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर बताया कि नए सीआईसी की नियुक्ति में सरकार ने उन्हें अंधेरे में रखा । आरटीआई एक्ट, 2005 के अनुसार सीआईसी की नियुक्ति प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन समिति करती है, जिसमें लोकसभा में विपक्ष के नेता या सबसे बड़ी पार्टी के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा तय केंद्रीय मंत्री होते हैं । 

कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधुरी ने अपने पत्र में राष्ट्रपति को लिखा कि 02 नवंबर को प्रधानमंत्री आवास पर तय बैठक की तारीख बदल दी गयी और उन्हें सूचना नहीं दी गयी । 03 नवंबर को प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने धुआंधार चुनाव प्रचार बीच में ही छोड़कर सूचना आयुक्त हीरालाल समरिया को मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में चयन कर लिया - यह लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के नेता ने राष्ट्रपति को लिखा है । दो सूचना आयुक्त भी नियुक्त किए गए । अगली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट के सामने यह मामला लाया जा सकता है ।