भारत - श्रीलंका द्विपक्षीय रिश्ते में तमिल फैक्टर
- शशिधर खान
श्रीलंका के राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे ने कहा है कि अल्पसंख्यक तमिलों को सत्ता में भागीदारी का अधिकार देनेवाला 13वां संविधान लागू करना उनका कर्त्तव्य है । विक्रमसिंघे पहले श्रीलंकाई राष्ट्रपति हैं जिन्होंने संसद भवन में सर्वदलीय बैठक के बाद कहा - ‘मैं राष्ट्रपति के रूप में यह कानून लागू करने के कर्त्तव्य से बंधा हूं और अगर कोई इस संशोधन 13A के कार्यान्वयन का विरोध करता है, तो संसद को इस कानून को अवश्य ही समाप्त कर देना चाहिए ।’
राष्ट्रपति ने संविधान से प्राप्त अधिकार का उपयोग करते हुए संसद का मौजूदा सत्र 08 फरवरी तक के लिए स्थगित कर दिया । अब संसद सत्र फिर से आधिकारिक तौर पर 08 फरवरी को शुरू होगा । असाधारण परिस्थितियों में ही राष्ट्रपति को ऐसा निर्णय लेना होता है । संसद सत्र समाप्त करने से पहले श्रीलंका के राष्ट्रपति ने इस बात को दुहराया कि 13A संविधान संशोधन अपने मौजूदा स्वरूप में ही लागू होगा और अगर ऐसा नहीं हुआ तो संसद इस कानून को खतम करने का कदम अवश्य उठाए ।
भारत समर्थित श्रीलंका का 13 संविधान संशोधन 1987 के भारत-श्रीलंका समझौते की उपज है, जो मुख्य रूप् से अल्पसंख्यक तमिलों को नागरिक के रूप में सत्ता में भागीदारी और समानता का अधिकार देने के लिए लाया गया था । उस वक्त भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी और श्रीलंका के राष्ट्रपति जे॰ आर॰ जयवर्द्धने के बीच यह करार हुआ था कि श्रीलंका में रह रहे भारतीय मूल के तमिलों को बहुसंख्यक सिंहलियों के समान अधिकार मिलना चाहिए । 1987 में हुए इस भारत-श्रीलंका समझौते के बाद श्रीलंका ने 13वां संविधान संशोधन लाया तो, मगर आज तक किसी सरकार ने इसे कानून लागू नहीं किया ।
जयशंकर के कोलंबो जाने से पहले तमिल नेताओं से राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंधे की कई दौर की बातचीत हो चुकी थी । राष्ट्रपति संसद के अंदर और बाहर तमिल नेताओं से बातचीत के बाद बार-बार बोल चुके थे कि यह श्रीलंका का लंबे समय से लटका राष्ट्रीय सवाल है, जिसका समाधान उनका दायित्व है । रानिल विक्रमसिंघे ने कहा कि इस जातीय विवाद का हल इसी फरवरी महीने में निकाला जाएगा, जब श्रीलंका की आजादी के 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं । तमिल बहुल आबादी वाले पूर्वी प्रांत के मुख्यालय जाफना में १५ जनवरी को आयोजित पारंपरिक पोंगल समारोह के अवसर पर विक्रमसिंघे ने कहा कि आत्मनिर्णय और समानता के अधिकार की तमिलों की मांग ही जातीय झमेले से जुड़ी है, जो आजादी के 75वें वर्ष में सुलझा लिया जाएगा ।
टीएनए सांसद ने कहा - ‘पहले उन्हें ये सारे कदम उठाने दें । अन्यथा हम समझेंगे कि सिर्फ सरकार से वार्ता जारी रखने का कोई अर्थ नहीं है ।’
भारत-श्रीलंका द्विपक्षीय रिश्ते में सबसे अहम फैक्टर है, तमिल मुद्दा । भारत के प्रधानमंत्री या कोई राजनयिक जब भी श्रीलंका जाते हैं, वहां की सरकार के पास तमिलों के अधिकारों की बात जरूर उठाते हैं । ठीक उसी तरह श्रीलंका के कोई राजयनिक जब भारत आते हैं तो तमिल मामले का जिक्फ़्र किसी-न-किसी रूप में करते हैं । रानिल विक्रमसिंघे श्रीलंका के प्रधानमंत्री भी रह चुके हैं । ये एकमात्र सिंहली नेता हैं, जिन्हें तमिलों का हितैषी माना जाता है । विक्रमसिंघे राजनयिक के रूप में भारत यात्रा के दौरान तमिलनाडु जाकर वहां की भावनाओं को मरहम लगा आए हैं । 1987 के जिस भारत-श्रीलंका समझौते के बाद 13वां संशोधन लाया गया, उसी के तहत भारत ने तमिल उग्रवाद का सफाया करने सेना श्रीलंका भेजी । उग्रवादी गुट लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे -LITTE) श्रीलंका में तमिल अधिकारों की मांग को लेकर 1980 के दशक में उपजा । 2009 में राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षा ने लिट्टे का सफाया करने में मानवाधिकार कानूनों की धज्जियां उड़ा दी । लिट्टे तमिलनाडु की कमजोर नस है और वहां का यह जख्म भरा नहीं है कि भारत सफाए में सहयोगी रहा । 1991 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी की तमिलनाडु में मानव बम बिस्फोट में हत्या कथित रूप से लिट्टे की जवाबी कार्रवाई मानी जाती है । लिट्टे अभी तक तमिलनाडु में राजनीतिक मुद्दा बना हुआ है ।
सिंहली बहुल आबादी वाले श्रीलंका में यह दबंग समुदाय तमिलों को दोयम दर्जे का समुदाय समझते हैं । तमिलों को सेना, पुलिस में नहीं लिया जाता । सिंहली तमिलों को अपनी बाजू बाजी कुर्सी पर बैठने लायक नागरिक अधिकार देने के पक्ष में नहीं हैं । सिंहलियों में केंद्रित सत्ताधारी तमिलों के साथ जमीन, पुलिस अधिकार बांटना नहीं चाहते ।
1948 में श्रीलंका की आजादी के समय बने सीलोन नागरिकता कानून ने ही भारतीय मूल के मलाइयाहा (पहाड़ी) तमिलों को बेघर कर दिया । 1956 में उससे भी कड़ा भेदभावपूर्ण ‘सिर्फ सिंहली एक्ट’बना ।
अब राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे ने श्रीलंकाई आजादी की 75वीं वर्षगांठ पर अधिकार देने की बात कही है, रानिल विक्रमसिंघे ने अपनी संसद में 13ए संविधान संशोधन लागू करने की बात भारत में संसद का बजट सत्र शुरू होने से तीन दिन पहले कही । अगर श्रीलंका में लागू हुआ तो या समाप्त हुआ तो, संभव है यह मामला भारत में संसद के दोनों सदनों में उठे । बजट सत्र का पहला भाग 10 फरवरी तक चलेगा और श्रीलंकाई में संसद सत्र दोबारा 08 फरवरी को शुरू होगा ।
तमिलनाडु में सत्तारूढ़ द्रमुक (DMK) समेत सभी दल श्रीलंका से भागकर आए तमिलों के नागरिक अधिकार के प्रति भी संवेदनशील हैं । ये वही तमिल शरणार्थी हैं जो श्रीलंका में 30 वर्षों तक चले लिट्टे युद्ध के दौरान भागे या भगाए गए । सुप्रीम कोर्ट में लंबित विवादास्प्द सीएए (नागरिकता संशोधन कानून), २०१९ पर द्रमुक सरकार ने एक हलफनामा दायर करके कहा है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान से भागकर भारत आए और गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों को सीएए-2019 के तहत नागरिकता प्रदान करने में सरकार ने तमिल अल्पसंख्यकों के साथ सौतेला व्यवहार किया है । हलफनामे के अनुसार तमिल शरणार्थी भी श्रीलंका के बौद्ध सिंहलियों द्वारा धार्मिक प्रताड़ना के शिकार रहे हैं ।
दिसंबर में जब श्रीलंका में तमिल नेताओं से वार्ता चल रही थी, उसी दौरान 19 दिसंबर को तमिलनाडु के तिरूचिरापल्ली तमिल शरणार्थी शिविर से राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने ९ श्रीलंकाई तमिलों को ड्रग (नशीली दवा) और हथियारों की कथित तस्करी के मामले में गिररफ्तार किया । एनआईए के अनुसार यह लिट्टे को पुनर्जीवित करने का कथित प्रयास है । भारत - श्रीलंका द्विपक्षीय रिश्ते में तमिल फैक्टर
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