पड़ोस में राजनीतिक उथल-पुथल का वर्ष रहा 2025

- शशिधर खान

	




भारत की पूर्वोत्तर सीमा से सटे म्यांमार एकमात्र ऐसा पड़ोसी है, जहॉं आजादी के 75 वर्ष से ज्यादा बीत जाने के बावजूद सेना सत्ता पर काबीज है । चुनाव होते रहे हैं, मगर वहां की सैनिक जुंटा ने जनप्रतिनिधियों के हाथ में शासन नहीं जाने दिया । 


ऐसे देश म्यांमार से दिसंबर के अंतिम सप्ताह में चुनाव की खबर आयी । झांसा देनेवाला और दिखावे के लिए ही सही, 28.12.2025 को पहले दौर का मतदान हुआ । दूसरे दौर का मतदान 11 जनवरी को और तीसरा दौर 25 जनवरी को होगा । चुनाव का एलान सैनिक जुंटा सरकार ने मतदान से एक हफ्रता पहले किया, लेकिन वोटों की गिनती कब होगी और चुनाव परिणाम कब घोषित होंगे, इसके बारे में कुछ नहीं बताया गया । 


म्यांमार में लोकतंत्र की आवाज नोबेल शांति पुरस्कार विजेता ओंग सान सूकी अंतरराष्ट्रीय जगत की सबसे मशहूर लोकतंत्र की अवतारी संघर्ष जारी मानी जाती है । इनकी तुलना महात्मा गांधी से की जाती है । 80--वर्षीया ओंग सान सूकी ने देश में आजादी और लोकतंत्र बहाली के लिए जनान्दोलन के 40 साल या तो जेल में अथवा अपने घर में ही नजरबंदी में यातनाएं झेलते हुए गुजार दिए । अपने ही देश के सैनिकों की बंदूकों की नोक के आगे शांतिपूर्ण संघर्ष पर डटी सूकी को ‘गांधी के रूप में आंधी’कहा जाता है । म्यांमार के अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति का भी यह 78वां साल है और वहां की जनता गुलामी तथा शोषण के दंश से मुक्त नहीं हो पा रही है । 

२०२१ में ठीक स्वाधीनता दिवस के समय 06 फरवरी को सैनिक तख्तापलट में ओंग सान सू की नीत निर्वाचित सरकार को ही जेल में डाल दिया गया । २०२० चुनाव के कुछ ही महीनों बाद नजरल मिन ओंग हालेंग ने ओंग सान सूकी और उनका चुनाव गठजोड़ एलएलडी समर्थकों पर धांधली, भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर सत्ता हाथ में लेने के बाद सू की के खिलाफ इस तरह मुकदमा चलाया, ताकि वो जेल से बाहर नहीं निकल पाएं । सैनिक जुंटा कोर्ट ने पहले चार साल की सजा सुनायी । भारत समेत अंतरराष्ट्रीय दवाब में जनरल ने सजा 2 साल कम कर दी । लेकिन सेना नियंत्रित कोर्ट ने कोरोना उल्लंघन समेत अन्य मनगढ़न्त आरोपों में फिर 27 साल की सजा सुनायी, जिसमें जज के अनुसार सजा की अवधि 100 साल तक भी हो सकती है । ऐसा इंलजाम लगा दिया गया ताकि ओंग सान सू की अपनी बाकी जिंदगी जेल में ही गुजारें । 

इस अमानवीय और जनविरोधी कृत्य की चारों तरफ निंदा हई । म्यांमार के सैनिक शासक विदेश यात्रा से परहेज करते हैं और किसी विदेशी राजनयिक के आगमन की भी उम्मीद नहीं करते । म्यांमार की आमदनी का मुख्य स्रोत इमारती लकड़ी, रत्न और चावल है । अमेरिका के बाद अन्य यूरोपीय देशों की आर्थिक नाकेबंदी से आर्थिक हालत म्यांमार की खस्ता हो गयी । सैनिक तख्ता पलट के विरोध में आंदोलन कर रहे कारेन, काकेन प्रांत के विद्रोही गुटों ने लोकतंत्र समर्थक आंदोलनकारियों का साथ दिया । सैनिक जुंटा ने तितरफा जनता की आवाज दबाने में देश को दांव पर लगा दिया । लाखों लोग देश छोड़कर भाग गए । उसी पलायन से रोहिंग्या मुसलमानों का संकट पैदा हुआ, जो बौद्धों की प्रताड़ना के कारण यत्र-तत्र भागे । 

पूर्वोत्तर के रास्ते रोहिंग्या घुसपैठ की समस्या भारत भी झेल रहा है । म्यांमार में चुनाव के समय संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य प्रोग्राम की ओर से जारी रिपोर्ट के अनुसार म्यांमार में 12 मिलियन से ज्यादा लोग २०२६ में भयंकर भुखमरी की हालत में होंगे । उनमें एक मिलियन से ज्यादा लोग जीवन रक्षक सहायता पर जी रहे हैं । 

पांच साल में देश को कंगाली और अराजकता के कगार पर लाकर म्यांमार सैनिक जुंटा चुनाव करा रही है । रिटायर जनरलों द्वारा संचालित यूनियन सोलिडेरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी (यूएनडीपी) उम्मीदवार सबसे ज्यादा मैदान में हैं । सेना नियंत्रित चुनाव आयोग ने एनएलडी समेत लोकतंत्र समर्थक दलों की मान्यता खतम कर रखी है । सैनिक जुंटा विरोधी सभी नेता जेल में हैं । सिर्फ यूएनडीपी और उसके कुछ सहयोगी पार्टियों को चुनाव आयोग से मान्यता प्राप्त है । ऐसे चुनाव के एलान के समय जनरल मिन ओंग ने अपने नियंत्रण वाले ‘म्यांमार डिजिटल न्यूज’पर वक्तव्य जारी करके कहा कि यह ‘लोकतंत्र की वापसी और सेना का विरोध कर रहे विद्रोहियों को शांति कायम करने का मौका है ।’

यह सब जानते-समझते हुए भी म्यांमार के लोगों को नए साल से उम्मीदें हैं । 28 दिसंबर के मतदान की रिपोर्ट म्यांमार की थाइलैंड सीमा से आयी जिसमें मतदाताओं की भागीदारी आशंका और अविश्वास के माहौल के कारण कम बतायी गयी । चुनाव आयोग परिणाम की घोषणा महीनों बाद करता है, लेकिन लोग चुनाव भूलते नहीं हैं । क्योंकि उनके पास इस दमन चक्की में पिसते रहने का अन्य कोई विकल्प नहीं है । 


२२ जनवरी से आयोजित बार्षिक कोलकाता पुस्तक मेला में हर साल की तरह बांग्लादेश की भागीदारी पर इस बार सवालिया निशान लगा है । 03 फरवरी तक चलनेवाले इस पुस्तक मेले में हर साल बांग्लादेश के 45 प्रकाशक हिस्सा लेने आते हैं । 49 वर्षों से कोलकाता पुस्तक मेला का आयोजन हो रहा है । 2025 में मेला नहीं लगा और इस बार भारतीय विदेश मंत्रालय से बांग्लादेश को हरी झंडी मिलेगी, इसकी उम्मीद कम लगती है । क्योंकि हिंदू संगठनों ने कोलकाता स्थित बांग्लादेशी मिसन पर हिंसा के विरोध में हमला किया है और तनाव बढ़ता ही जा रहा है । हालिया हिंसा भड़कने का कारण छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की मौत है । उस्मान हादी को 12 दिसंबर को कुछ नकाबपोश लोगों ने सिर पर गोलियां दागी । अंतरिम सरकार ने उसे इलाज के लिए थाइलैंड भेजा, जहां से उसकी लाश लौटी । बांग्लादेश पुलिस उसका तार भारत से जोड़ रही है । क्योंकि बांग्लादेश की भी सीमा पूर्वोत्तर से लगी है और म्यांमार के रास्ते थाइलैंड भी भारतीय के रूट पर है, जो दक्षिण पूर्व एसियाई देशों का प्रवेश द्वार है । भारतीय आधिकारियों ने इस आरोप का खंडन किया है कि 12 दिसंबर को उस्मान हादी को गोली मारनेवालों में से दो मेघालय में वहां के स्थानीय लोगों की सहायता से घुसे और उनमें से दो संदिग्ध मददगार भारतीय पुलिस की हिरासत में है । उस्मान हादी को लेकर बबाल मचने का कारण ये है कि यही २०२४ विद्रोह का मास्टरमाइंड था, जब शेख हसीना को सत्ता से हटना पड़ा । 

इतना सब देखते-सुनते हुए बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) नेता तारिक रहमान ने तुरंत मतदाता सूची में नाम दर्ज कराया । चुनाव आयोग से पुष्टि मिलते ही 12 फरवरी चुनाव के लिए ढाका-17 संसदीय सीट से पर्चा भर दिया । पर्चा भरने के अगले दिन 30 दिसम्बर को तारिक रहमान की माँ बेगम खालिदा जिया का अस्पताल में इंतकाल हो गया । जब वे ढाका पहंचे उसी समय से उनकी माँ की हालत चिंताजनक थी । दूसरी बड़ी पार्टी इस्लामपंथी जमायत-ए-इस्लामी को पाक-समर्थक माना जाता है । बीएनपी का भी रूख वैसा ही रहा है । 


पाकिस्तान के भारत के साथ रिश्ते 2025 में इतने खराब हुए कि दोनों देशों के नेताओं की मुलाकात बंद है । २२ अप्रील के पहलगाम आतंकी हमले के कारण करारा जवाब में भारतीय सेना का ऑपरेशन सिंदूर पाकिस्तान के बाहरी के अलावे अंदरूनी राजनीति को भी तनावपूर्ण बनाने में सफल रहा । आपसी रिश्ते का आलम ये है कि भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच से पहले या बाद भारत ने क्रिकेटर अपने पाकिस्तानी काउंटरपार्ट से हाथ नहीं मिलाते । भारत से रिश्ते को लेकर ऑपरेशन सिंदूर की आड़ में पाकिस्तानी सेना और सरकार में मतभेद है । पूरे वर्ष जिस सच को पाकिस्तान सरकार नकारती रही, उसे 2025 समाप्त होने के समय स्वीकारा कि ऑपरेशन सिंदूर स्ट्राईक में पाकिस्तानी फौज को नुकसान उठाना पड़ा । पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने 28 दिसंबर को एक कार्यक्रम में माना कि भारतीय हमले के कारण उनकी फौज बंकरों में छिपी, सीजफायर का प्रस्ताव रखना पड़ा । विदेश मंत्री इशाक डार ने भी स्वीकारा कि ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान के नून खॉ एयरवेस को भारी नुकसान हुआ । पाकिस्तान एक ओर अफगान सीमा पर और दूसरी तरफ आजादी की मांग कर रहे विद्रोही बलूच आर्मी के हमलों का सामना कर रहा है । भारत पर बलूचियों को उकसाने का आरोप लगाता है । पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को सेवा जेल से निकलने नहीं देना चाहती । 2025 पूरे वर्ष उनके पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों की पुलिस से झड़प होती रही । 

अफगानिस्तान में चार साल पहले इस्लामी तालिबान ने सत्ता पर कब्जा कर लिया । अफगान विदेश मंत्री आमिर खाँ मुत्ताकी ने अक्टूबर, 2025 में भारत आकर द्विपक्षीय रिश्ते को नया आयाम दिया । ४ साल में किसी अफगान राजनयिक ने पहली यात्रा की और भरोसा दिलाया कि भारत के खिलाफ हमले के लिए अफगान जमीन का इस्तेमाल नहीं होने दिया जायेगा । 

ठीक उसी समय सितंबर में नेपाल में नौजवानों ने विद्रोह कर दिया और प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली को इस्तीफा देना पड़ा । चुनाव 05 मार्च को होना है । सिर्फ सत्ता में बने रहने के लिए जोड़-तोड़ करनेवाले वामदलों से नाराज युवकों ने संसद भवन, सुप्रीम कोर्ट भवन में आग लगा दी । भ्रष्टाचार के खिलाफ हिंसा और आगजनी के माहौल में राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल की अपील के बाद युवक इस आश्वासन पर शांत हुए कि 05 मार्च, २०२६ को चुनाव कराए जाएंगे । इसके लिए पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश सुशीला कार्की को अंतरिम सरकार का प्रमुख बनाया गया । वर्ष २०२४ में तीसरी बार प्रधानमंत्री बने थे के पी शर्मा ओली । 2008 में रिपब्लिक बनने के बाद से १४ प्रधानमंत्री नेपाल में बन चुके हैं और कोई पांच साल नहीं रहे । 

पाकिस्तान और बांग्लादेश में सैनिक तख्तापलट होते रहे हैं । लेकिन चुनाव के बाद जनप्रतिनिधि सरकार संभालते हैं । अभी-भी दोनों देशों में सेना 2025 का रोल नेपथ्य से दिखा रही है । लेकिन म्यांमार की सेना जनभावना और भारतीय भावना की परवाह नहीं करती । भारत से ज्यादा चीन से नजदीकी पड़ोसी देशों की नीति रही है, जिसमें पाकिस्तान, नेपाल के साथ-साथ श्रीलंका भी शामिल है । श्रीलंका में पहली बार वामपंथी पार्टी प्रमुख अनुरा दिसानायके राष्ट्रपति बने हैं, जिन्होंने भारत के साथ रिश्ते में संतुलन बनाने का संकेत दिल्ली आकर दिया । 

एक बार फिर लौटते हैं म्यांमार की ओर, जहां असामान्य हालात से भारत की चिंता बढ़ जाती है । फरवरी, २०२१ सैनिक तख्तापलट के कुछ महीने बाद विदेश सचिव हर्षवर्द्धन श्रृंगला म्यांमार पहुंचे । उन्हें जेल में बंद ओंग सान सू की से मिलने की इजाजत नहीं मिली, जिनके आंदोलन का सबसे बड़ा समर्थक भारत रहा है । 

ताजा पहले दौर के मतदान में ही भारी जीत का दावा म्यांमार की सेना समर्थित पार्टी ने कर डाला । संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख वोल्कर तुर्क समेत युरोप के कई मानवाधिकार संगठनों ने ऐसे चुनाव की तीखी आलोलना करते हुए इसे सैनिक जुंटा का मार्शल लॉ बरकरार रखने का नाटक बताया है ।






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