चुनावी दास्तान दो पहाडि़यों की - शशिधर खान पहाड़ी क्षेत्र लद्दाख और दार्जीलिंग की चुनावी दास्तान देश के अन्य हिस्सों से कई माएने में भिन्न है । लेकिन इन दोनों पहाडि़यों की बहुत सारी बातें एक जैसी है । जम्मू व कश्मीर से धारा-370 हटने के बाद इस राज्य को अगस्त, २०१९ में संघशासित क्षेत्रों (यूटी) में विभाजित कर दिया गया । उसके बाद से ही लद्दाख में राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर आंदोलन शुरू हो गया । इस लोकसभा चुनाव में लद्दाख में मचे राजनीतिक घमासान के अंदर मुख्य रूप से यही मांग हावी है । लद्दाखियों ने बिना विधान सभा का यूटी दर्जा स्वीकार नहीं किया । इसका असर २० मई को लद्दाख में होनेवाली वोटिंग के दिन तक देखने को मिलेगा । क्षेत्रीय दल, राष्ट्रीय दल और वहां के सिविल सोसायटी संगठनों के बीच लद्दाख की एकमात्र लोक सभा सीट पर उम्मीदवारी को लेकर जिच है । लोकसभा चुनाव तारीखों के एलान से कुछ दिन पहले लद्दाख के जलवायु/पर्यावरण कार्यकर्ता मैगसेसे पुरस्कार विजेता सोनम वांगचुक ने सिविल सोसायटी संगठनों के साथ भूख हड़ताल शुरू कर दी । आंदोलनकारियों ने मांग रखी कि लद्दाख को राज्य का दर्जा देने और इस क्षेत्र को संविधान की 6ठी अनुसूची में शामिल करने का ठोस आश्वासन केंद्र सरकार चुनाव से पहले दे । २६ मार्च को सोनम वांगचुक ने २०१९ लोकसभा चुनाव में भाजपा ने इन्हीं मांगों पर विचार करने के वायदे पर लद्दाख सीट जीती । पश्चिम बंगाल की दार्जीलिंग पहाड़ी में राज्य का दर्जा की मांग को लेकर 1980 के दशक से आंदोलन चल रहा है । यहां भी एक ही लोकसभा सीट है और गोरखा बहुल आबादी का वोट निर्णायक होता है । दार्जीलिंग सीट 2009 से भाजपा मांगे पूरी करने के वायदे पर लगातार जीत रही है । अलग गोरखालैंड राज्य की मांग आंदोलनकारी गोरखा गुटों के आपसी मतभेद और उसमें सभी राजनीतिक दलों की चुनावी जुमलेबाजी में घिस गयी है । भाजपा के कदम रखने से पहले तक कांग्रेस और सीपीएम (मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी) ने दार्जीलिंग के मतदाताओं का अपने-अपने हिसाब से समर्थन जुटाया और जीत हासिल की । २०११ से लगातार सत्ता में मौजूद तृणमूल कांग्रेस की सर्वेसर्वा और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (दीदी) की दार्जीलिंग नीति अलग है । पहले तो उन्होंने कभी-भी अन्य दलों की तरह गोरखों को गोरखालैंड राज्य की मांग पर विचार करने का आश्वासन चुनाव जीतने के लिए नहीं दिया । लद्दाख पहाड़ी की लोकसभा सीट पर पहली बार ऐसा चुनाव हो रहा है, जहां मतदान से पहले सामाजिक रिश्तों में खटास पैदा हो गयी । लद्दाख में बौद्ध समुदाय की आबादी ज्यादा है, जिनमें अधिकांश लेह के मतदाता हैं । कारगिल में मुस्लिम मतदाता ज्यादा हैं । लेकिन इसके पहले के लोकसभा चुनावों में बौद्ध उम्मीदवार दोनों समुदायों के समर्थन से जीते । लेह के बौद्ध समाज और कारगिल के मुस्लिम समाज में हमेशा से भाईचारा आपसी सद्भाव रहा । लद्दाख को राज्य का दर्जा देने की मुहिम दोनों समुदायों के सिविल सोसायटी संगठन मिलकर चला रहे हैं । लद्दाख में चुनाव प्रचार करने पहुंचे केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने मतदाताओं को मांगों पर विचार करने का आश्वासन 13 मई को दिया । उन्होंने ग्यालसन को जिताने कहा, ताकि वार्ता का सिलसिला जारी रहे । लेह अपेक्स बॉडी और केडीए की लेह और कारगिल के लिए अलग-अलग लोकसभा सीट की मांग है । २४ फरवरी को केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय से बातचीत करने दिल्ली पहुंचे नेताओं में दोनों संगठनों के प्रतिनिधि शामिल थे । मांगों पर विचार करने के लिए बनी संयुक्त कमिटी में भी दोनों हैं । लेकिन चुनाव के दौरान बिगड़े रिश्ते पाटना आसान नहीं होगा और इसका असर उनके शांतिपूर्ण आंदोलन के साथ-साथ जनजीवन पर भी पड़ेगा । क्योंकि लद्दाख की आय का मुख्य स्रोत पर्यटन है, जिससे समाज जुड़ा है । माहौल के मद्देनजर जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने अपना अनशन स्थगित कर दिया है ।
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Jammu and Kashmir Ladakh
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