राज्य आंदोलन यात्रा : लद्दाख, कश्मीर से गोरखालैंड तक
- शशिधर खान
केन्द्र शासित क्षेत्र (UT यूटी) लद्दाख को राज्य का और संविधान की 6ठी अनुसूची के अंतर्गत जनजातीय क्षेत्र का दर्जा देने की मांग पर आंदोलनकारी लद्दाखी नेताओं की केंद्र सरकार के साथ हुई हालिया बातचीत पहले की वार्ताओं की तरह बेनतीजा रही ।
केन्द्रीय गृह मंत्रालय (Mभ। एमएचए) के अधिकारियों से दिल्ली में इस हफ्ते की बैठक पहले की तुलना में अमूमन तनावपूर्ण माहौल में हुई । इसमें शामिल होने के लिए लद्दाख से जनसंगठनों के प्रतिनिधियों को वास्तव में उनके नेता सोनम वांगचुक की रिहाई का बेसब्री से इंतजार है ।
हालात के मद्देनजर एमएचए (गृह मंत्रालय) ने 12 अक्टूबर को लद्दाखी नेताओं को वार्ता का बुलावा भेजा, जिसमें सभी तबके प्रतिनिधियों को २२ अक्टूबर को दिल्ली आकर बातचीत करने कहा । उसके पहले 17 अक्टूबर को एमएचए ने रिटायर सुप्रीम कोर्ट जज बी॰ एस॰ चौहान की अध्यक्षता में २४ सितंबर को पुलिस फायरिंग की न्यायिक जांच का आदेश दिया । गृह मंत्रालय की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार उन हालातों की ‘निष्पक्ष’न्यायिक जांच का आदेश दिया गया है, जिसकी वजह से ‘कानून व व्यवस्था की गंभीर स्थिति’पैदा हुई । लद्दाख के दोनों प्रभावशाली जनसंगठनों (एलबीए और केडीए) की ओर से 18 अक्टूबर को आयोजित मौन प्रदर्शन (साइलेंट मार्च) से एक दिन पहले गृह मंत्रालय ने न्यायिक जांच का आदेश दिया। 17 अक्टूबर को ही लेह अपेक्स बॉडी ने 24/09 पुलिस फायरिंग की न्यायिक जांच के आदेश का स्वागत किया और २२ अक्टूबर को केंद्र के साथ वार्ता के लिए सहमति जतायी । दोरजे लाकरूक ने लचीला रूख अपनाते हुए कहा कि सोनम वांगचुक की रिहाई की मांग बरकरार है, लेकिन इसके लिए वार्ता में रूकावट नहीं आने दी जाएगी । पुलिस फायरिंग के ख्लिाफ 18/10 का विरोध मौन प्रदर्शन के दौरान पूरे लद्दाख में प्रशासन की निषेधाज्ञा समेत विभिन्न पाबंदियों के बावजूद लगभग पूरी तरह ब्लैकआउट रहा ।
कब तक ऐसा ड्राफ्ट बना के दें और अगली बैठक कब हो सकती है, इसकी कोई समय-सीमा तय नहीं हुई । घटनाक्रम के तथ्य बताते हैं कि लेह में 24/09 हिंसा के दिन एमएचए के अधिकारी वार्ता के मजमून पर मशविरा के लिए लेह में ही थे । अब अगली बातचीत जबतक न्यायिक जांच की रिपोर्ट आने और सोनम वांगचुक की रिहाई तक शायद न हो पाए । लद्दाखियों की मांगों में लेह और कारगिल के लिए दो अलग-अलग लोकसभा सीटें भी शामिल हैं । लेकिन एमएचए ने कभी भी इन मांगों को अलग-अलग करके इन पर विचार करने की बात नहीं की । गृह राज्य मंत्री ने हमेशा गोलमटोल जवाब दिया कि केंद्र लद्दाखियों की अकांक्षा पूरी करने को प्रतिबद्ध हैं ।
जम्मू व कश्मीर को विशेष राज्य का संवैधानिक दर्जा देनेवाली धारा-370 को खत्म करने के फैसले को कश्मीर के राजनीतिज्ञों और प्रबुद्ध नागरिकों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी । चार साल के बाद २०२४ लोकसभा चुनाव से चार महीना पहले दिसंबर, २०२३ में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में धारा-370 हटाने के केंद्र के फैसले को तो सही ठहराया, मगर उसके साथ-साथ राज्य दर्जा घटाकर यूटी बनाने पर केंद्र को लताड़ा । जम्मू व कश्मीर का राज्य दर्जा लौटाने के केंद्र के आश्वासन पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के विवेक पर छोड़ दिया । सुप्रीम कोर्ट में और कश्मीर में केंद्र ने बार-बार कहा कि विधान सभा चुनाव के बाद राज्य का दर्जा लौटा दिया जाएगा । २०१८ से जम्मू व कश्मीर में विधान सभा चुनाव नहीं कराए जाने की याचिकाकर्ताओं की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने सीधे चुनाव आयोग को विधान सभा चुनाव कराने का आदेश दिया और इसकी समय-सीमा सितंबर, २०२४ तय कर दी ।
अभी 18.10.2025 को जम्मू व कश्मीर में सरकार गठन के एक साल पूरे होने पर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने केंद्र सरकार पर सीधा आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट में केंद्र ने झूठा दावा किया है कि राज्य दर्जा लौटाने के संबंध में जम्मू व कश्मीर सरकार बातचीत चल रही है । 10 अक्टूबर को केंद्र की ओर से सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में यह सफाई दी । चीफ जस्टिस बी॰ आर॰ गवई की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट पीठ सुनवाई कर रही है । याचिकाकर्ताओं ने केंद्र को एक निश्चित समय-सीमा के अंदर जम्मू व कश्मीर को राज्य दर्जा लौटाने का निर्देश देने की मांग की है । उनमें कश्मीर के निवर्तमान विधायक इरफान हफीज लोन, लोक्धर जहूर अहमद भट के अलावे प्रेमशंकर झा और राधा कुमार भी हैं । केंद्र को अगले महीने जवाब देना है कि अभी तक इस संबंध में क्या बात हुई है और कब तक जम्मू व कश्मीर को राज्य दर्जा वापस मिलेगा ।
18 अक्टूबर को जम्मू व कश्मीर सरकार की पहली बरसी पर सत्तारूढ़ नेशनल कान्फ्रेंस - कांग्रेस गठजोड़ के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला समेत सभी नेताओं ने कहा कि राज्य दर्जा लौटाने का वायदा टालने का असली कारण ये है कि जम्मू व कश्मीर में भाजपा की सरकार नहीं बनी । इसलिए केन्द्र संसद में सुप्रीम कोर्ट में झूठे वायदे दुहरा रहा है ।
उसी समय अर्थात् 17-18 अक्टूबर को ही गोरखालैंड राज्य आंदोलन वार्ता भी सुर्खियों में आयी । पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव अगले वर्ष अप्रील-मई में होना है । उसके मद्देनजर केंद्र सरकार ने गोरखा नेताओं से बातचीत के लिए रिटायर लेफ्टिनेंट जनरल विजय मदान को वार्ताकार नियुक्त किया । दार्जीलिंग और उसके आसपास गोरखा तथा जनजातीय पहाड़ी जिलों को मिलाकर अलग गोरखालैंड राज्य आंदोलन 1980 के दशक से चल रहा है । गोरखों को भी संविधान की 6ठी अनुसूची के साथ राज्य का दर्जा चाहिए । लेकिन गोरखा आंदोलन लद्दाख से बिल्कुल अलग सिर्फ हिंसा पर टिका है ।
भाजपा दार्जिलिंग पहाड़ी में लोकसभा और विधान सभा चुनाव गोरखालैंड वायदे पर 2 दशक से जीत रही है । गत 03 अप्रील को तीन साल के अंतराल के बाद केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय गोरखा नेताओं से दार्जीलिंग के भाजपा एमपी राजू विस्टा के साथ मिले । लेकिन आश्वासन सिर्फ गोरखा मांगों पर विचार करने तक सीमित है, गोरखालैंड राज्य पर नहीं । 1980 के दशक में भगोड़े सैनिक सुभाष घीसिंग ने हिंसा के बदौलत गोरखालैंड आंदोलन की नींव रखी । वामदल और कांग्रेस उनके समर्थन से दार्जीलिंग में चुनाव जीतते रहे, सुभाष घीसिंग को दार्जीलिंग का बेताज बादशाह मानते रहे ।
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Jammu and Kashmir Ladakh
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