जम्मू व कश्मीर में धारा-370 वापसी का मुद्दा बरकरार - शशिधर खान जम्मू व कश्मीर में विशेष संवैधानिक दर्जा देनेवाला प्रावधान अनुच्छेद-370 हटाए जाने के 6वें वर्ष में भी वहां के क्षेत्रीय दल बदली हुई स्थिति स्वीकार करने को तैयार नहीं है । इस बार बीते सालों की तुलना में सभी गैर-भाजपा राजनीतिक दलों ने एकजुट होकर जम्मू व कश्मीर का राज्य दर्जा वापसी के लिए केंद्र सरकार पर ज्यादा दवाब बनाया हुआ है । अगस्त, २०१९ में नया जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन एक्ट बनाकर केंद्र की भाजपा नीत राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठजोड़ (एडीए) सरकार ने धारा-370 हटाकर जम्मू व कश्मीर का ‘विशेष’राज्य दर्जा के साथ-साथ राज्य दर्जा भी समाप्त कर दिया और दो संघशासित क्षेत्र (यूटी) में विभाजित कर दिया । जम्मू व कश्मीर और उससे अलग करके लद्दाख को भी यूटी का दर्जा दिया गया । जम्मू व कश्मीर का पूर्ण राज्य दर्जा घटाकर यूटी में तब्दील कर दिया गया । उस समय से हर साल जम्मू व कश्मीर के लोग 05 अगस्त की तारीख को ‘काला दिवस’के रूप में मनाते हैं और धारा-370 के अंतर्गत प्राप्त संवैधानिक प्रावधान के साथ राज्य दर्जा वापसी के लिए संघर्ष जारी रखने को गोलबंद होते हैं । इस बार सारे क्षेत्रीय दल ज्यादा तेज अभियान चला रहे हैं, ताकि केंद्र सरकार पर संसद के चालू मानसून सत्र में ही जम्मू व कश्मीर का राज्य दर्जा लौटानेवाला संविधान संशोधन बिल लाने का दवाब डाला जाए । २१ जुलाई से संसद का मानसून सत्र शुरू होने के पहले से ही राजनीतिक दलों ने मार्च, बैठकें, प्रदर्शन से हवा बनानी शुरू कर दी । गत 05 अगस्त को हुए विरोध प्रदर्शन के बाद भी राजनीतिक गतिविधियां जारी हैं । दूसरी तरफ उसी दिन जम्मू व कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज कुमार सिन्हा आतंकी हमलों से प्रभावित परिवारों के आश्रितों को नौकरी का पत्र बांट रहे थे । इस समारोह का आयोजन कोर्ट कश्मीर कन्वेशन सेंटर में किया गया था । वहां से लगभग 10 किúमीú की दूरी पर नेशनल कान्फ्रेंस और पीडीपी नेता राज्य दर्जा वापसी की मांग कर रहे थे । जम्मू व कश्मीर की नेशनल कान्फ्रेंस सरकार का समर्थन कर रही कांग्रेस के नेता तारिक अहमद ने पुलिस पर जगह-जगह घेराबंदी करने और कार्यकर्ताओं को रोकने के आरोप लगाए । नेताओं ने यह भी कहा कि उनके समर्थन में जुटे प्रदर्शनकारियों को और अवाम को भी कहा कि उनके समर्थन में जुटे प्रदशनकारियों को और अवाम को हर जगह जाने की इजाजत नहीं थी । पार्टी कार्यालयों के नजदीक से आगे का रास्ता रूकावटों से पटा था । सीपीएम नेता तारिगामी ने 05 अगस्त को ‘भारतीय इतिहास का घोर अंधकारमय दिवस’बताते हुए कहा कि ‘धारा-370 हटाया जाना भारत के साथ हमारे ‘‘संवैधानिक रिश्ते’’पर हमला है और हम इंसाफ के लिए शांतिपूर्ण संघर्ष जारी रखेंगे ।’ उधर भाजपा की स्थानीय युनिट ने 05 अगस्त का दिन ऐतिहासिक समारोह की तरह मनाया। कुछ बातें और देखने को मिली । भाजपा के केंद्रीय नेताओं ने इस बार संसद के बाहर या अंदर धारा-370 हटाए जाने को ‘ऐतिहासिक’या इससे जम्मू व कश्मीर में शांति तथा विकास के एक नए युग की शुरूआत जैसी बातें पहले की तरह जोर देकर नहीं कही । किसी भी भाजपा नेता ने जम्मू व कश्मीर का राज्य दर्जा वापसी प्रक्रिया का कोई संकेत नहीं दिया । मानसून सत्र शुरू होने से लेकर अनिश्चित काल के लिए स्थगित होने का समय करीब आने तक संसद में ऐसा कोई बिल लाने की कोई गंध तक नहीं लगी । जम्मू व कश्मीर का राज्य दर्जा वापसी की बात कोई भी भाजपा नेता लोकसभा चुनाव और विधान सभा चुनाव के बाद से नहीं करते । जम्मू व कश्मीर में इसके लिए नए सिरे से संघर्ष को भी उपराज्यपाल मनोज सिन्हा समेत कोई भी केंद्र के प्रतिनिधि या नेता नोटिस नहीं ले रहे हैं । दूसरी बात ये कि कांग्रेस काफी समय तक धारा-370 हटाए जाने के केंद्र के फैसले पर कोई टिप्पणी से परहेज करती रही । कांग्रेस न तो समर्थन में कुछ बोली, न ही विरोध में । जम्मू व कश्मीर कांग्रेस यूनिट ने धारा-370 वापसी के लिए क्षेत्रीय दलों के संघर्ष से खुद को अलग रखा । काफी समय तक राज्य दर्जा लौटाने के संबंध में भी खुलकर काँग्रेस ने समर्थन नहीं किया । वही कांग्रेस विशेष संवैधानिक दर्जा के साथ राज्य दर्जा लौटाने के लिए जम्मू व कश्मीर के क्षेत्रीय दलों के समर्थन में उतरी । धारा-370 हटाए जाने के पांच साल बाद २०२४ में हुए जम्मू व कश्मीर विधान सभा चुनाव में नेशनल कांफ्रेंस की पूर्ण बहुमत से स्पष्ट हो गया कि कश्मीर के मतदाताओं ने केंद्र के इस फैसले को नामंजूर कर दिया । उसके बावजूद बदली हुई संवैधानिक स्थिति के बाद जम्मू व कश्मीर के पहले मुख्यमंत्री बने उमर अब्दुल्ला ने अक्टूबर, २०२४ में अपने पद की शपथ लेने के समय से लेकर अब तक धारा-370 के तहत प्राप्त दर्जा वापसी की मांग नहीं कर रहे थे । उमर अब्दुल्ला ने विधान सभा के अंदर और बाहर हमेशा भारतीय संघ के अन्य राज्यों वाला दर्जा लौटाने की मांग उठायी और धारा-370 पर कुछ बोलने से परहेज किया । लेकिन अबकी 05 अगस्त को मुख्यमंत्री ने पार्टी नेताओं को साथ लेकर धारा-370 वापसी और सीपीएम नेता युसुफ तारिगामी द्वारा उठाए गए भारत तथा कश्मीर के २०१९ से पहले वाले ‘संवैधानिक रिश्ते’वाले मुद्दे का भी समर्थन किया । कांगेस समेत सभी गैर-भाजपा दल कश्मीर की क्षेत्रीय पार्टियों के समर्थन में संसद के इसी मानसून सत्र में राज्य दर्जा वापसी बिल लाने का दवाब बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते । श्रीनगर में हुए विरोध प्रदर्शनों के अगले दिन 06 अगसत को जम्मू व कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भाजपा समेत सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को पत्र लिखकर कहा कि राज्य वापसी बिल इसी सत्र में लाया जाना चाहिए । उमर ने अपने पत्र में लिखा कि ‘केंद्र सरकार ने ऐसा रवैया अपनाया हुआ है, मानो राज्य दर्जा लौटाकर कश्मीरियों पर मेहरबानी करेगी ।’मीडिया को जारी किए गए अपने खत की प्रति में उमर अब्दुल्ला ने यह भी लिखा - जम्मू व कश्मीर का राज्य दर्जा वापसी कोई रियायत नहीं, वो संवैधानिक अधिकार है जो भारतीय संघ के अन्य राज्यों को प्राप्त है ।’ सभी दलों ने इस पत्र का स्वागत किया और 07 अगस्त को दिल्ली में आयोजित सभी विपक्षी दलों की बैठक में कश्मीरी पार्टियों के नेता पहुंचे । पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कान्फ्रेंस अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने इंडिया गठजोड़ नेताओं की राहुल गांधी की डिनर बैठक में जम्मू व कश्मीर का भी यह मसला उठाया । कांग्रस एकमात्र राष्ट्रीय पार्टी है, जिसने संसद के मानसून सत्र शुरू होने के पहले ही इसे मुद्दा बनाया । लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल की हैसियत से सभी दलों की बैठक 19 जुलाई को बुलाकर जम्मू व कश्मीर राज्य दर्जा वापसी बिल लाने की मांग एकजुट होकर करने की योजना बनायी । इसके लिए संसद के अंदर और बाहर प्रदर्शन, धरना की भी तैयारी थी । लेकिन लगभग पूरा मानसून सत्र ऑपरेशन सिंदूर और बिहार में मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाने के चुनाव आयोग के फैसले पर हंगामे की भेंद चढ़ गया । 07 जुलाई को इंडिया गठजोड़ बैठक इसी पर थी । केंद्र की भाजपा सरकार और जम्मू व कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने दो साल से ऐसा रवैया अपनाया हुआ है, मानो राज्य दर्जा वापसी कोई मुद्दा ही न हो । जबकि नवंबर, २०२४ में जम्मू व कश्मीर विधान सभा के पहले सत्र के संबोधन भाषण में उपराज्यपाल ने राजय दर्जा वापसी को अपनी ‘प्रतिबद्धता’बतायी । लेकिन उसके बाद से धारा-370 और राज्य वापसी की मांग से जनता का ध्यान हटाने के लिए जम्मू व कश्मीर प्रशासन अन्य मुद्दों को तबज्जो दे रहा है । राजनीतिक दलों का आरोप है कि लोकसभा और विधान सभा चुनाव में जम्मू व कश्मीर में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा, तो राज्य दर्जा वापसी का वायदा टालने का असली कारण है । अब सुप्रीम कोर्ट में केंद्र को सफाई देनी पड़ेगी । जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन एक्ट की संवैधानिक वैधता को चुनौती देनेवाली याचिकाओं पर 11 दिसंबर, २०२३ को तत्कालीन चीफ जस्टिस डी॰ वाई॰ चन्द्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच जजों की सुप्रीम कोर्ट पीठ ने फैसला सुनाया । सुप्रीम कोर्ट ने धारा-370 हटाने के फैसले को यह कहकर उचित ठहराया कि राष्ट्रपति एकतरफा इस धारा को रद्द करने की अधिसूचना जारी कर सकते हैं, लेकिन जम्मू व कश्मीर का राज्य दर्जा भी घटाकर यूटी बनाने और विधान सभा चुनाव टालने के लिए केंद्र की खिंचाई की । सुप्रीम कोर्ट पीठ ने इस सवाल का केंद्र के पास कोई जवाब नहीं था कि संविधान की धारा-3 का इस्तेमाल पहली बार सिर्फ जम्मू व कश्मीर को पूर्ण राज्य से यूटी बनाने के लिए क्यों किया गया ? सुप्रीम कोर्ट ने इस विंदु को ज्यादा तूल नहीं देकर राज्य दर्जा ‘जल्द से जल्द’लौटाने के केंद्र के आश्वासन पर मामला वहीं छोड़ दिया । लेकिन जम्मू व कश्मीर विधान सभा चुनाव को केंद्र के भरोसे नहीं छोड़ा और चुनाव आयोग को 30-09-2024 तक चुनाव संपन्न कराने का सीधे आदेश दे दिया । जम्मू व कश्मीर के राजनीतिक दलों द्वारा सुप्रीम कोर्ट को बताया गया था कि केंद्र २०१८ से ही विधान सभा चुनाव टाल रहा है । चुनाव होने के बाद से राज्य दर्जा लौटाने का वायदा निभाने में ‘जल्द से जल्द’की जगह ‘देर से देर’वाला टालो नीति केंद्र सरकार अपनायी हुई है । जम्मू व कश्मीर के मुख्यमंत्री ने सभी राष्ट्रीय दलों को लिखे अपने पत्र में केंद्र के इस कदम को ‘खतरनाक’और जनभावना को उकसाने वाला बताया है । इस सब से बेखबर जम्मू व कश्मीर के उपराज्यपाल आतंकी हमलों की आड़ में राजनीतिक गतिविधियों पर पाबंदी और क्षेत्रीय भावनाओं को अपने एजेंडे के हिसाब से उभाड़कर कड़े कमान प्रशासन चला रहे है। उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के ही रास्ते पर चलते हुए उमर अब्दुल्ला ने 05 अगस्त को जम्मू व कश्मीर के अंतिम डोगरा शासक महाराजा हरि सिंह की मूर्ति पर काला बिल्ला लगाकर माल्यार्पण किया और भाजपा से ऐतिहासिक डोगरा राज्य की गरिता लौटाने की मांग की । इसका कारण जानने के लिए देखिए कि गत 13 जुलाई को श्रीनगर में क्या हुआ । 13 जुलाई की तारीख कश्मीरियों के लिए ऐतिहासिक दिन है, क्योंकि उस दिन कश्मीर के लोग अपने २२ शहीदों की मजार पर फातिहा पढ़ते हैं । वर्ष 1931 में डोगरा शासन के खिलाफ विद्रोह भड़कने के दौरान 13 जुलाई को २२ लोग मारे गए थे, जिनकी मजार पर उस तारीख केा फातिहा पढ़ने का रिवाज जम्मू व कश्मीर प्रशासन ने बंद कर दिया । गत 13 जुलाई को पुलिस मुख्यमंत्री समेत विधायकों को दरगाह तक जाने से रोक रही थी और उपराज्यपाल पहलगाम हमले के प्रभावित परिवारों को नियुक्ति पत्र बांट रहे थे । मनोज सिन्हा ने शेख अब्दुल्ला के जन्मदिन 05 दिसंबर की सार्वजनिक छुट्टी रद्द करके उसे महाराजा हरिसिंह के जन्मदिन में बदल दिया । जम्मू व कश्मीर मानवाधिकार फोरम के अध्यक्ष पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज मदन बी॰ लोकुर ने 05 अगस्त को ही जारी अपनी रिपोर्ट में पहलगाम हमले के बाद से पुलिस के ज्यादती और भ्रामक सूचनाएं प्रचारित करने का दोषी ठहराया है ।
जम्मू व कश्मीर में धारा-370 वापसी का मुद्दा बरकरार
J And K