कश्मीर में धारा-370 अब कोई मुद्दा नहीं

                                                                                                 - शशिधर खान

	





जम्मू व कश्मीर से धारा-370 हटाने और उसके तहत विशेष राज्य का संवैधानिक दर्जा प्राप्त इस राज्य को दो यूटी (संघशासित क्षेत्रों) में विभाजित किए जाने का मामला अब तीसरे वर्ष में प्रवेश कर गया । अगस्त महीना बीतने के साथ ही इस मुद्दे का राजनीतिक उफान भी गुजर गया है । 05.08.2019 को जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन एक्ट लागू हुआ और जम्मू व कश्मीर भारत के अन्य हिस्सों की तरह पूर्ण रूप से भारतीय संवैधानिक ढांचे का अंग बन गया ।


गुलाम नबी आजाद जम्मू व कश्मीर में कांग्रेस के मजबूत हैसियत वाले नेता थे और मुख्यमंत्री भी रह चुके थे । धारा-370 पर कांग्रेस की ओर से हमेशा आजाद ही बयान जारी करते थे । जम्मू व कश्मीर पूनर्गठन एक्ट, २०१९ संसद से पारित होने के समय 03.08.2019 को राज्य सभा में कांग्रेस और विपक्षी नेता के रूप में गुलाम नबी आजाद ने ही बिना बहस कराए जम्मू व कश्मीर का विशेष संवैधानिक दर्जा हटाने जाने का जबर्दश्त विरोध किया था । मगर कुछ दिन बाद ही कांग्रेस की नीति बदल गयी और गुलाम नबी आजाद समेत कांग्रेस नेताओं ने धारा-370 पर जम्मू व कश्मीर के स्थानीय दलों के रवैए से खुद को अलग कर लिया । कांग्रेस ने कश्मीर में अपने रानजीतिक एजेंडे को राज्य का दर्जा लौटाने और विधान सभा चुनाव कराने तक सीमित रखा । बाद में गुलाम नबी आजाद के कांग्रेस के असंतुष्ट धड़े (ग्रुप-23) में शामिल हो जाने से धारा-370 और पूरा कश्मीर मामला ही ठंडे बस्ते में चला गया ।


फारूक अब्दुल्ला पीएजीडी के भी अध्यक्ष हैं और वे भाजपा को यह अवसर नहीं देना चाहते कि कांग्रेस समेत स्थानीय पार्टियां लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सहयोग करने के बजाए अनिश्चितता का माहौल कायम रखने की राजनीति कर रही हैं ।


इसके जवाब में भाजपा की जम्मू व कश्मीर यूनिट के अध्यक्ष रवीन्दर रैना ने सवाल उठाया कि महबूबा मुफ्रती के पिता मरहूम मुफ्रती मुहम्मद सईद जब 1989 में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर से लोकसभा चुनाव जीतकर गृहमंत्री बने थे, उस समय यह ‘गैर-स्थानीय’का मुद्दा कहां था । कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद 1980 और 1985 में महाराष्ट्र के वासिम लोकसभा सीट से जीते थे, उस समय यह मुद्दा कहां था । जम्मू व कश्मीर मुख्य चुनाव अधिकारी के कार्यालय से प्राप्त समाचार के अनुसार लगभग 25 लाख नए मतदाता जुड़ेंगे, जो 18 साल के हो चुके हैं । धारा-370 हटाए जाने के बाद जम्मू व कश्मीर और लद्दाख यूटी में यह पहला चुनाव होगा । संवैधानिक प्रावधान बदले जाने के बाद पहली बार मतदाता सूची में संशोधन किया जा रहा है । उसके पहले जम्मू व कश्मीर में स्थानीय निवासी का प्रमाणपत्र लेना पड़ता था । 

 चुनाव के मद्देनजर जम्मू व कश्मीर में विधान सभा और लोकसभा सीटों की परिसीमन प्रक्रिया के दौरान परिसीमन आयोग गठन २०२० से फरवरी, २०२२ तक चले कश्मीरी नेताओं से विचार-विमर्श के क्रम में भी सभी ने धारा-370 को ही ढाल बनाया । पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्रती ने रिटायर सुप्रीम कोर्ट जज रंजना देसाई की अध्यक्षता वाले परिसीमन आयोग के सदस्यों से मिलने से ही इन्कार कर दिया । 14.03.2022 को परिसीमन आयोग की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद से सभी दल चुनाव के मूड में हैं । धारा-370 हटाए जाने के केंद्र सरकार के फैसले को चुनौती देनेवाली याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में २०२० से लंबित हैं । इस पर सुनवाई शुरू भी नहीं हुई है । नए सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस यू यू ललित ने लंबित मामले को क्लियर करने का काम प्राथमिकता के आधार पर लिया है । धारा-370 वाली याचिकाएं चर्चा में नहीं है । 

एकमात्र हार्डलाइनर महबूबा मुफ्रती धारा-370 को मुद्दा बनायी हुई हैं, लेकिन नेशनल कान्फ्रेंस उनको दरकिनार कर सभी ९० सीटों पर चुनाव लड़ने को तैयार है । 

जम्मू व कश्मीर के साथ ही यूटी का दर्जा प्राप्त लेह-लद्दाख की विधान सभा जम्मू व कश्मीर ही है । लद्दाख में धारा-370 कोई मुद्दा ही नहीं है । वहां वोट या तो भाजपा को मिलेगा या कांग्रेस को । स्थानीय दल गौण हैं । 

कांग्रेस अभी पहले अपने नेतृत्व झमेले से तो उभरे । मगर चुनावी राजनीति गुलाम नबी आजाद के इर्द-गिर्द घूमेगी, जो बहुत पहले साफ कह चुके हैं कि जम्मू व कश्मीर में धारा-370 और विशेष दर्जा वापसी फिलहाल संभव नहीं । इसके लिए कई संवैधानिक धाराएं बदलनी होगी, संशोधन करना होगा, जो संसद में कांग्रेस को दो-तिहाई बहुमत मिले बगैर असंभव है । भविष्य में ऐसी संभावना नजर नहीं आती - ऐसा कहनेवाले आजाद अब खुद दूसरी संभावना इतर धारा-370 तलाश रहे हैं ।