अंतरिक्ष अनुसंधान से जुड़े कुछ अप्रिय प्रसंग - शशिधर खान भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो – ISRO - इंडियन स्पेsस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन) के अध्यक्ष एस॰ सोमनाथ के अनुसार अगले पांच वर्षों में ७० उपग्रहों को प्रक्षेपित करने की योजना लगभग अंतिम चरण में है । अगले चरण के चंद्र मिसन - यंद्रयान ४ और ५ का भी डिजाईन तैयार कर लिया गया है । इस वर्ष के अंत या 2025 की शुरूआत तक कभी-भी चंद्रमा की सतह पर उतारा जा सकता है । पहले ये योजना 2028 में पूरी होने का अनुमान इसरो ने व्यक्त किया था । जुलाई, २०२४ के अंतिम सप्ताह में संसद के बजट-सह मानसून सत्र में इस वर्ष के लिए तय अंतरिक्ष मिशनों के संबंध में पूछे गए सवाल के जवाब में इसरो की तरफ से स्पष्ट जवाब नहीं आया था । अमेरिका की अंतरिक्ष अनुसंधान संस्था NASA (नासा - नेशनल एयरोनोटिक्स स्पेस एजेंसी) और इसरो के संयुक्त मिसन के तहत पहला ऐसा मिसन है, जिसका बेसब्री से इंतजार किया जा रहा था । अत्याधुनिक तकनीक वाले राडारों से युक्त इस मिसन का यह उपग्रह बहुउद्देशीय जानकारी जुटाने के लिए अंतरिक्ष में तैनात किया जानेवाला था । इसरो पृथ्वी पर होनेवाले रक्षात्मक उपायों समेत जलवायु परिवर्तन, ग्लेसियरों में आनेवाले बदलावों, भूकंप, तूफान के समय की गतिविधियों का किसी भी मौसम में अंतरिक्ष से ऑब्जर्वेशन करना आसान हो जाता । लोकसभा में २६ जुलाई को अपने जवाब में इसरो ने बताया कि अमेरिका और भारत की अंतरिक्ष एजेंसियों का एक संयुक्त मिसन २०२४ में लान्च हो पाएगा, ऐसा नहीं लगता । अमेरिका से प्राप्त तकनीकों और नासा के साथ मिलकर इसरो ने कई उपग्रह अंतरिक्ष में उतारे हैं । सारे उपग्रह राष्ट्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा की होड़ में उतारे गए हें । इसमें इसरो का अमेरिका और रूस जासूसी उपग्रह वाले उपकरण की खरीद काफी समय से विवाद का विषय बना हुआ है । अपने तरह के इस पहले अंतरिक्ष मिसन के आकाश की सतह पर पहुंचने के बाद कुछ-न-कुछ खुलासा होगा, जिसके विषय में इसरो ने 26.07.2024 को संसद में स्पष्टीकरण दिया । चन्द्रयान मिसनों पर इसरो ने २०२३ से फोकस किया और २०२४ पूरे वर्ष यह सुर्खियों में रहा । ऐसे सियासी माहौल में ‘राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस’मनाने की घोषणा का इसरो समेत पूरे देश ने स्वागत किया । लोगों का ध्यान उस तरफ चला गया, जो केंद्र सरकार की योजना थी । २३ अगस्त, २०२४ को दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित पहले राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस से संबंधित दो-तीन बातों को ध्यान में रखकर ही हम इसरो से जुड़े अन्य तथ्यों की परत-दर-परत सप्रंसग व्याख्या कर पाएंगे । अमेरिका, रूस और चीन के बाद चन्द्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग करनेवाला चौथा देश भारत हो गया । मुख्य अतिथि राष्ट्रपति द्रौपदी मूर्मू का संबोधन और चंद्रयान-3 टीम के वैज्ञानिकों को विज्ञान टीम पुरस्कार रस्मी जैसा लगा । अंतरिक्ष मंत्री जितेन्द्र सिंह की मौजूदगी और उनके भाषण को नोटिस नहीं लिया गया । २३ अगस्त के अंतरिक्ष दिवस समारोह के दिन नए मिसनों की जानकारी इसरो चेयरमैन ने दी और उसकी लांचिंग को लेकर चल रही अटकलबाजी पर प्रकाश डाला । समारोह के पहले ही एस॰ सोमनाथ बता चुके थे कि चंद्रयान-4 और ५ का डिजाईन तैयार है । लेकिन २३ अगस्त को उन्होंने कहा कि चांद से मिट्टी और चट्टान के नमूने इकट्ठा करने के लिए चंद्रयान-4 की लांचिंग 2027 में होगी । इसरो प्रमुख ने कहा कि इस मिसन से ५ किलोग्राम मिट्टी और चट्टान लाने की योजना है । राष्ट्रपति द्रौपदी मूर्मू ने इसरो की सराहना करते हुए कहा कि चाहे वो मंगल मिसन हो या एक साथ 100 से अधिक उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण, हमने कई शानदार उपलब्धियां हासिल की हैं । राष्ट्रपति ने सही कहा, सुनकर सबको अच्छा लगा । मगर इन उपलब्धियों को हासिल करने में जुटे अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिकों की जीवनलीला त्रासदी और छटपटाहट से भरी है । उसके बावजूद अंतरिक्षकर्मियों ने अगले ही दिन २४ अगस्त को पहली बार रीयूजेबल हाइब्रिड रॉकेट रूमी-1 की सफल लांचिंग करके एक और नयी उपलब्धि की जानकारी दी । चेन्नई तट से छोड़ा गया यह रॉकेट ग्लोबल वार्मिंग ओजोन परत और जलवायु परिवर्तन से सम्बोधित जानकारी भेजेगा । अब देखिए कि कितनी तनावपूर्ण और संवेदनशील विषम परिस्थितियों में काम करने का अंतरिक्ष वैज्ञानिक विवश हैं । यह स्थिति ‘चिराग तले अंधेरा’वाली कहावत चरितार्थ करती है । एक ओर चंद्रयान मिसन अभियान चंद्रमा की तरह आलोकित गर्व करने लायक चिराग है और दूसरी तरफ ऐसे कई मिसनों को सफल बनाने में जुटे अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की जिंदगी चंद्रयान मिसनों से लायी जानेवाले काली मिट्टी और चट्टानों के मलबे में दबी है । सभी जानते हैं कि 2030 तक अंतरिक्ष अभियानों को मलबा मुक्त करने का लक्ष्य है । राष्ट्रपति ने भी अपने संबोधन भाषण में इसका जिक्र किया । यही करूण कहानी इसरो के अंदर की है, जिसकी जानकारी छिपाने की कोशिशों के बावजूद बाहर आ जाती है । गौरतलब है कि इसरो के सारे अभियानों का खाका नासा के सहयोग से तैयार किया गया है । चंद्रयान मिसन समेत तमाम जासूसी तकनीकों की पढ़ाई इस अभियान योजना को अंजाम तक पहुंचाने का नक्शा तैयार करनेवाले विक्रम साराभाई से लेकर अभी तक के ज्यादातर वैज्ञानिकों ने अमेरिका से की है । इसलिए इसरो के अंदर भी मानवीय भावना और संवेदना उपकरणों में समा गयी है । इसरो के वैज्ञानिक नाम्बी नारायणन का नाम अभी लोग भूले नहीं है । जिन्हें पाकिस्तान के लिए कथित जासूसी के आरोप में केरल पुलिस ने गिरफ्तार किया और काफी समय तक जेल में रखकर यातनाएं दी । जुलाई, २०२२ में रिलीज हुई नाम्बी नारायणन की जिंदगी पर बनी फिल्म ‘रॉकेट्री : दि नाम्बी एफेक्ट’(Rocketry : The Nambi Effect) जिन पाठकों ने देखी होगी, उन्हें एक प्रसंग याद दिलाना चाहता हॅूं । जासूसी करनेवाले क्रायोजेनिक इंजिन अमेरिका के बजाए रूस से सस्ता मिलने के कारण नाम्बी नारायणन अपने साथियों की टीम लेकर रूस पहुंचे । वहां से चोरी-छिपे अफगानिस्तान-पाकिस्तान के रास्ते यह उपकरण भारत लाना था । उस अभियान में जुटे एक वैज्ञानिक की छोटी बच्ची की मौत की खबर केरल से रूस पहुंची । नाम्बी नारायणन की भूमिका फिल्म में निभाने वाले आर॰ माधवन अपने साथी से यह सूचना छिपाते हैं, क्योंकि उनका लक्ष्य सिर्फ मिसन पूरा करने पर केंद्रित था, चाहे किसी सहयोगी का परिवार बर्बाद क्यों न हो जाए । अभियान पूरा करके लौटने के बाद नाम्बी नारायणन को 1994 में पुलिस ने देश के खिलाफ जासूसी के आरोप में पकड़ लिया । नवंबर, 1994 में केरल पुलिस ने नाम्बी नारायणन को गिरफ्तार किया । उन्हें दी गयी कथित यातना की जानकारी जब सुप्रीम कोर्ट पहुंची तो सितंबर, २०१८ में शीर्ष कोर्ट ने जांच आयोग गठित किया । सीबीआई भी केरल पुलिस का साथ देती रही । सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद २०२१ में सीबीआई ने विशेष जांच दल के प्रमुख और खुफिया शाखा से जुड़े केरल पुलिस के आईपीएस समेत चार अधिकारियों के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया । लेकिन आज तक यह पता नहीं चला कि इन अधिकारियों के खिलाफ आगे की क्या कानूनी कार्रवाई हुई । केरल पुलिस के समर्थन से नाम्बी नारायणन पर जानलेवा हमला करनेवाले लोगों के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हुई । नाम्बी नारायणन ने स्वयं उस फिल्म को तथ्यों पर आधारित बताया । पत्रकार के रूप में उनसे बातचीत करनेवाले बॉलीवुड स्टार शाहरूख खान को उन्होंने बताया - ‘इस बात का मलाल है कि मुझे यातनाएं देनेवाले और मुझ पर हमला करनेवाले कानून की गिरफ्त से बाहर हैं’। नाम्बी नारायणन को २०१९ में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पद्मभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया । नाम्बी के पास मुआवजा राशियों की वर्षा हुई । सबसे पहले २०१८ में सुप्रीम कोर्ट ने 50 लाख रूपया मुआवजा दिया । २०२१ में केरल सरकार ने 1.3 करोड़ रूपया का भुगतान करके राज्य सरकार के खिलाफ दायर इस पीड़ित से मुकदमा समाप्त कर लिया । लेकिन जो मानसिक यंत्रणा नाम्बी नारायणन ने उतने वर्ष झेले उसकी भरपाई मुआवजे से नहीं हो सकती, यह नारायणन का दर्द है । राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी मुआवजा दिलवाया । २०११ में सूचना अधिकार के अंतर्गत प्राप्त जानकारी के अनुसार इसरो ने अपने 684 स्टाफ की मौत का कारण बताने से इन्कार कर दिया । लेकिन यह स्वीकारा कि गत १५ वर्षो में 1733 लोगों की मौत विभिन्न बीमारियों से हुई । आत्महत्या, लाइलाज जानलेवा बीमारियों से हुई इन मौतों की न जांच होती है और न इसका कारण इसरो मृतकों के परिवारजनों को बताता है । दोनों ही मामला रहस्यपूर्ण है । इसरो चंद्रयान मिसनों के जनक महान वैज्ञानिक विक्रम साराभाई की सांसें सिर्फ 52 साल की उम्र में बंद हो गयीं । होटल के एक कमरे में उनकी लाश पायी गयी । आज तक कोई नहीं जानता कि उनकी मौत कैसे हुई । ऐसे असामान्य और निर्मम दीवारों के अंदर काम करनेवाले अंतरिक्षकर्मियों के साथ देश नहीं है, जिनकी आंखों व मस्तिष्क पर मौत का धुंध छाया रहता है । इनकी जिंदगी की कीमत पर राजनीतिक वाहवाही लूटना और गर्व का प्रचार करना वैज्ञानिकों की जलती आत्मा पर नमक छिड़कने जैसा है । इन्सानियत शर्मसार हो रही है । अप्रील, २०२२ में भारत ने नयी अंतरिक्ष नीति चीन, ऑस्ट्रेलिया और रूस से प्रतिस्पर्धा में बनायी, जो अभी अंतरिक्ष मिसन में अब्बल है । उनकी तुलना में भारत का प्रोजेक्ट छोटा है, क्योंकि अंतरिक्ष बजट ही मात्र 2 प्रतिशत है । 2030 का लक्ष्य चीन से होड़ लेने के लिए रखा गया है, जो उस समय तक 13,000 उपग्रह छोड़ने की योजना बना चुका है । सुरक्षा के जितने पुख्ता इंतजाम किए जा रहे हैं, उतनी ही असुरक्षा की भावना प्रबल होती जा रही है । एक दूसरे को पछाड़ने और रक्षा दुर्ग भेदने की तैयारी में जुटे रहने के बावजूद सभी देश हाथ मिलाने के समय सशंकित रहते हें । ऐसे में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री शांति मिसन के लिए समर्पित पं॰ जवाहर लाल नेहरू की यह पंक्ति सटीक बैठती है - ‘‘इन्सान कितना बेवकूफ व जाहिल है कि हजारों वर्षों के तजुरबे से नहीं सीखता और बार-बार वही हिमाकत करता जाता है ।" दीपावली विशेषांक (खंड-2) के लिए लघु कथा शीर्षक – आत्मसम्मान मैं अकेला रहता हूँ, इसलिए घर में बच्चे के खाने लायक कुछ था नहीं । आखिरकार मैंने दो पीस स्लाइस्ट ब्रेड उठाया और दूध से मलाई निकालकर लगाया । दरवाजे के बाहर हाथ में मलाई लगा ब्रेड देख बच्चा लपककर मेरे पास आ जाता है और जल्दी-जल्दी खाने लगता है । तभी दुर्गा काम खतम करके तेजी से बाहर निकलती है, क्योंकि उसे और भी घरों में काम करना है । महीने की पहली तारीख थी, पैसे मिले थे । प्रसन्न चेहरा लिए निकली दुर्गा अपने बच्चे को खाते और मुझे वहां खड़ा देख बिफर उठी । अगर बच्चे ने ब्रेड मलाई पूरा नहीं खाया होता तो वो उसके हाथ से छीनकर फेंक देती । दुर्गा ने मुझे घूरते हुए धिक्कार का भाव अपने बच्चे पर उतारा - ‘ये आदमी का बच्चा थोड़े ही है, छुछुन्दर का बच्चा है ।’मेरे लिए इतना सुनना काफी था, वास्तव में दुर्गा अपने बच्चे के बहाने मुझे कोस रही थी । मैंने गेट बंद कर लिया, मगर अंदर से मुझे बहुत ग्लानि महसूस हुई । दुर्गा अपने बच्चे को लगभग घसीटते हुए नीचे ले गयी । उसकी एक और पंक्ति मेरे कानों में पड़ी - ‘कुत्ता, लगता है, पांव रोटी कभी देखा नहीं ।’समझते देर नहीं लगी कि एक गरीब कामवाली के आत्मसम्मान को चोट पहुंची है । दुर्गा के चेहरे का भाव और बच्चे के बहाने मुझे धिक्कारने का अंदाज देखकर मेरी आत्मा ने कोसा । हमने एक मेहनतकश के आत्मसम्मान को आहत किया, जो गरीब जरूर है मगर भीख नहीं मांगती । काम करके आत्मनिर्भर जिंदगी जी रही है और बच्चे को भी वही जिंदगी देना चाहती है । दया और टुकड़ा के प्रति नफरत जतला दिया । दीपावली विशेषांक के लिए विशेष (खंड-2) लघु कथा शीर्षक – सारंगी बलुआही घाट के किनारे स्थित मंदिर कई माएने में गांव के अन्य मंदिरों से विशिष्ट और अद्भुत है । घाट से सटा हुआ श्मशान है । गांववालों का कहना है कि उस मंदिर से सारंगी की आवाज आती रहती है । गांव से बाहर सुनसान या श्मशान के आसपास वाले मंदिर से कोई आवाज आती है तो उसे लोग भुतहा कहते हैं । डर के मारे शाम से उस रास्ते से आवाजाही बंद हो जाती है । दिन को भी लोग प्रायः उधर जाने से परहेज करते हैं । लेकिन बलुआही घाट मंदिर की कहानी बिल्कुल उससे उलट है । मंदिर के पीछेवाला रास्ता जंगल जैसा है । उधर से रात भर आना-जाना लगा रहता है । सांरगी की आवाज कानों में पड़ते ही राहगीर बटोही निर्भय हो जाता है । अगर पहले से किसी भूत-प्रेत की आशंका से मन में डर की भावना रहती है तो सारंगी की धुन भय खतम कर देती है । थके-मांदे लोग रात में मंदिर में बिल्कुल निश्चिन्त होकर सो भी जाते हैं । उस मंदिर में रखी सारंगी की कथा कुछ इस प्रकार है । सारंगी पर कबीर पद गा-गाकर भीख मांगनेवाले गेरूआ अंगवस्त्रधारियों को गांव में लोग गुदरिया बबाजी कहते हैं । ऐसे ही एक गुदरिया ने घाट से गुजरते समय एक ग्रामीण को नदी के बीचोबीच तेज लहर में देखा । उसकी नाव भंवर के मुहाने पर थी और नियंत्रित नहीं हो पा रही थी । गुदरिया ने किनारे नाव बांधने के लिए खूंटे से बंधी रस्सी खोली । फिर अपनी सबसे प्रिय चीज और जीविका सारंगी के दोनों हिस्से से रस्सी बांधकर इस हिसाब से फेंका ताकि नाव में ही गिरे । भंवर में नाचती डगमगाती नाव में पानी भर चुका था । लेकिन मौत से जूझ रहे उस ग्रामीण ने तुरंत लपक लिया । रस्सी का दूसरा छोर पकड़कर गुदरिया ने धीरे-धीरे नाव को किनारे की तरफ खींचना शुरू किया । लहर की ताकत के आगे रस्सी हाथ से छूट गयी तो गुदरिया अपनी जान की परवाह न कर नदी में कूद पड़ा । डूबते को गुदरिया ने भंवर को चीरते हुए एक हाथ से ही किनारे की ओर उछाल दिया । तबतक शाम को काम से लौटकर नदी पार करनेवाले लोग नाव के इंतजार में किनारे जुट गए थे । डूबता आदमी तो बच गया । मगर एक हाथ से बैलेंस नहीं रहने के कारण गुदरिया को भंवर ने अपनी चपेट में लेकर अतल गहराई में ढकेल दिया । गुदरिया को बचाने नदी में कूदे दो-तीन युवकों को गुदरिया और नाव का कोई अता-पता नहीं चला । आतम में परमातम दरसै परमातम में झांईं झांईं में परछाईं दरसै लखे कबीरा साईं दीपावली विशेषांक (खंड-2) के लिए सात मुक्तक भोर की लाली से निकलती है आशा गोधूलि बेला नित देती है दिलासा कितनी भी माथापच्ची करें भाषाशास्त्री शब्दकोशों से नहीं, बोलियों से चलती है भाषा कहने को हाल कह दिया सब ठीक चल रहा है मिलने-जुलने का वक्त लगातार टल रहा है एलीट सरोकार का दस्तूर बदल रहा है मंडली में झूमने को मन मचल रहा है । आपके यहां आने का पक्का है वायदा लेना है हर घर-गिरस्ती का अंदरूनी जायजा वाशिंदे हैं गूंगे, मुल्क भी है बहरा और मैं घरेलू मामलों का वजीर जो ठहरा समझ नहीं आता क्या बोलें उमस रातों को हद हो गयी सुनने की इन नीरस बातों को ठीक करना है मौसम की बिगड़ी तबियत मुश्किल है वश में रखना बहके जजबातों को इस अंगनाई के नीचे नदी बहती थी छत पे घोंसले बनाकर गोरैया रहती थी दर्द बांटनेवाले से ज्यादा दर्द देनेवाले मिले बस एक मां थी जो चुपचाप सब सहती थी घटाएं निकल जाती हैं अमराई को खाक कर चांदनी मुंह फेरती है झरोखों से झांककर प्रकृति खुद चक्कर है रखना मत चाक पर हमने तो रख दिया भावनाओं को ताक पर क्यों करें खराब यहां की आबो हवा अच्छी है दिल की सेहत के लिए सिर्फ यही दवा अच्छी है बंजर होते पिछवाड़े में घास लता उग आए पौधा पालना अच्छा है कुत्ता-बिल्ली के बजाए ----॰-----
अंतरिक्ष अनुसंधान से जुड़े कुछ अप्रिय प्रसंग
Lokmat Dipawali