दीपावली विशेषांक (खंड-2) के लिए

लघु कथा

शीर्षक – आत्मसम्मान




मैं अकेला रहता हूँ, इसलिए घर में बच्चे के खाने लायक कुछ था नहीं । आखिरकार मैंने दो पीस स्लाइस्ट ब्रेड उठाया और दूध से मलाई निकालकर लगाया । दरवाजे के बाहर हाथ में मलाई लगा ब्रेड देख बच्चा लपककर मेरे पास आ जाता है और जल्दी-जल्दी खाने लगता है । तभी दुर्गा काम खतम करके तेजी से बाहर निकलती है, क्योंकि उसे और भी घरों में काम करना है । 

महीने की पहली तारीख थी, पैसे मिले थे । प्रसन्न चेहरा लिए निकली दुर्गा अपने बच्चे को खाते और मुझे वहां खड़ा देख बिफर उठी । अगर बच्चे ने ब्रेड मलाई पूरा नहीं खाया होता तो वो उसके हाथ से छीनकर फेंक देती । दुर्गा ने मुझे घूरते हुए धिक्कार का भाव अपने बच्चे पर उतारा - ‘ये आदमी का बच्चा थोड़े ही है, छुछुन्दर का बच्चा है ।’मेरे लिए इतना सुनना काफी था, वास्तव में दुर्गा अपने बच्चे के बहाने मुझे कोस रही थी । मैंने गेट बंद कर लिया, मगर अंदर से मुझे बहुत ग्लानि महसूस हुई । दुर्गा अपने बच्चे को लगभग घसीटते हुए नीचे ले गयी । उसकी एक और पंक्ति मेरे कानों में पड़ी - ‘कुत्ता, लगता है, पांव रोट कभी देखा नहीं ।’समझते देर नहीं लगी कि एक गरीब कामवाली के आत्मसम्मान को चोट पहुंची है । दुर्गा के चेहरे का भाव और बच्चे के बहाने मुझे धिक्कारने का अंदाज देखकर मेरी आत्मा ने कोसा । हमने एक मेहनतकश के आत्मसम्मान को आहत किया, जो गरीब जरूर है मगर भीख नहीं मांगती । काम करके आत्मनिर्भर जिंदगी जी रही है और बच्चे को भी वही जिंदगी देना चाहती है । दया और टुकड़ा के प्रति नफरत जतला दिया । 















दीपावली विशेषांक के लिए विशेष (खंड-2)

लघु कथा

शीर्षक – सारंगी



बलुआही घाट के किनारे स्थित मंदिर कई माएने में गांव के अन्य मंदिरों से विशिष्ट और अद्भुत है । घाट से सटा हुआ श्मशान है । गांववालों का कहना है कि उस मंदिर से सारंगी की आवाज आती रहती है । गांव से बाहर सुनसान या श्मशान के आसपास वाले मंदिर से कोई आवाज आती है तो उसे लोग भुतहा कहते हैं । डर के मारे शाम से उस रास्ते से आवाजाही बंद हो जाती है । दिन को भी लोग प्रायः उधर जाने से परहेज करते हैं । 

लेकिन बलुआही घाट मंदिर की कहानी बिल्कुल उससे उलट है । मंदिर के पीछेवाला रास्ता जंगल जैसा  है । उधर से रात भर आना-जाना लगा रहता है । सांरगी की आवाज कानों में पड़ते ही राहगीर बटोही निर्भय हो जाता है । अगर पहले से किसी भूत-प्रेत की आशंका से मन में डर की भावना रहती है तो सारंगी की धुन भय खतम कर देती है । थके-मांदे लोग रात में मंदिर में बिल्कुल निश्चिन्त होकर सो भी जाते हैं । उस मंदिर में रखी सारंगी की कथा कुछ इस प्रकार है । सारंगी पर कबीर पद गा-गाकर भीख मांगनेवाले गेरूआ अंगवस्त्रधारियों को गांव में लोग गुदरिया बबाजी कहते  हैं । ऐसे ही एक गुदरिया ने घाट से गुजरते समय एक ग्रामीण को नदी के बीचोबीच तेज लहर में देखा । उसकी नाव भंवर के मुहाने पर थी और नियंत्रित नहीं हो पा रही थी । 

गुदरिया ने किनारे नाव बांधने के लिए खूंटे से बंधी रस्सी खोली । फिर अपनी सबसे प्रिय चीज और जीविका सारंगी के दोनों हिस्से से रस्सी बांधकर इस हिसाब से फेंका ताकि नाव में ही  गिरे । भंवर में नाचती डगमगाती नाव में पानी भर चुका था । लेकिन मौत से जूझ रहे उस ग्रामीण ने तुरंत लपक लिया । रस्सी का दूसरा छोर पकड़कर गुदरिया ने धीरे-धीरे नाव को किनारे की तरफ खींचना शुरू किया । लहर की ताकत के आगे रस्सी हाथ से छूट गयी तो गुदरिया अपनी जान की परवाह न कर नदी में कूद पड़ा । डूबते को गुदरिया ने भंवर को चीरते हुए एक हाथ से ही किनारे की ओर उछाल दिया । तबतक शाम को काम से लौटकर नदी पार करनेवाले लोग नाव के इंतजार में किनारे जुट गए थे । डूबता आदमी तो बच गया । मगर एक हाथ से बैलेंस नहीं रहने के कारण गुदरिया को भंवर ने अपनी चपेट में लेकर अतल गहराई में ढकेल दिया । गुदरिया को बचाने नदी में कूदे दो-तीन युवकों को गुदरिया और नाव का कोई अता-पता नहीं चला । 


आतम में परमातम दरसै परमातम में झांईं

झांईं में परछाईं दरसै लखे कबीरा साईं



दीपावली विशेषांक (खंड-2) के लिए

सात मुक्तक



भोर की लाली से निकलती है आशा

गोधूलि बेल नित देती है दिलासा

कितनी भी माथापच्ची करें भाषाशास्त्री

शब्दकोशों से नहीं, बोलियों से चलती है भाषा



कहने को हाल कह दिया सब ठीक चल रहा है

मिलने-जुलने का वक्त लगातार टल रहा है

एलीट सरोकार का दस्तूर बदल रहा है

मंडली में झूमने को मन मचल रहा है ।



आपके यहां आने का पक्का है वायदा

लेना है हर घर-गिरस्ती का अंदरूनी जायजा

वाशिंदे हैं गूंगे, मुल्क भी है बहरा

और मैं घरेलू मामलों का वजीर जो ठहरा



समझ नहीं आता क्या बोलें उमस रातों को

हद हो गयी सुनने की इन नीरस बातों को

ठीक करना है मौसम की बिगड़ी तबियत

मुश्किल है वश में रखना बहके जजबातों को



इस अंगनाई के नीचे नदी बहती थी

छत पे घोंसले बनाकर गोरैया रहती थी

दर्द बांटनेवाले से ज्यादा दर्द देनेवाले मिले

बस एक मां थी जो चुपचाप सब सहती थी



घटाएं निकल जाती हैं अमराई को खाक कर

चांदनी मुंह फेरती है झरोखों से झांककर

प्रकृति खुद चक्कर है रखना मत चाक पर

हमने तो रख दिया भावनाओं को ताक पर



क्यों करें खराब यहां की आबो हवा अच्छी है

दिल की सेहत के लिए सिर्फ यही दवा अच्छी है





बंजर होते पिछवाड़े में

घास लता उग आए

पौधा पालना अच्छा है

कुत्ता-बिल्ली के बजाए