हिंदू अल्पसंख्यकों के दर्जे का सवाल

                                                                                                 - शशिधर खान

	



 जिन राज्यों और केंद्रशासित क्षेत्रों में हिंदुओं की संख्या अन्य समुदायों से काफी कम हैं, वहां के अल्पसंख्यक दर्जे और उसके अंतर्गत मिलनेवाले संवैधानिक अधिकारों से वंचित हैं । वैसे राज्यों में भी गैर-हिंदू आबादी संख्या में ज्यादा होने के बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर संविधान की धारा-30 के अंतर्गत अल्पसंख्यक दर्जा वाले अधिकारों का लाभ शैक्षणिक, धार्मिक, भाषाई संस्थाओं में उठा रही  है । 

इस संबंध में भारत सरकार को निर्देश देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान शीर्ष कोर्ट जजों की दो पीठों ने अलग-अलग रूख अपनाया । सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस बनने से पहले 08-08-2022 को उदय उमेश (यूयू) ललित की अध्यक्षता वाली पीठ ने अल्पसंख्यकों की पहचान जिला स्तर पर करने की याचिकाकर्ता की मांग ठुकराते हुए कहा कि यह सिर्फ राज्य स्तर पर ही हो सकती है, जिला स्तर पर नहीं । सुप्रीम कोर्ट पीठ के दूसरे जज रवीन्द्र भट ने कानून का हवाला देते हुए कहा कि मौजूदा हालात में कोर्ट का हस्तक्षेप करना संभव नहीं है, लेकिन नगालैंड और मिजोरम जैसे राज्यों का ठोस उदाहरण प्रस्तुत करने पर कोर्ट अवश्य देखेगी । जस्टिस भट ने याचिकाकर्ताओं से कहा - ‘आप जेनरल रूप में कह रहे हैं कि हिन्दुओं को भी अल्पसंख्यक घोषित कर दिया जाए । जिला स्तर पर दर्जा देने का दावा नहीं कर सकते ।’

राजनीतिक रूप से संवेदनशील इस मामले में वकील और भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय की ओर से दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई काफी समय से चल रही है । याचिका में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग एक्ट, 1992 की संवैधानिक वैद्यता को चुनौती दी गयी है । इस एक्ट के अंतर्गत अल्पसंख्यक का दर्जा देने की अधिसूचना जारी करने की केंद्र सरकार की शक्ति को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि ‘अल्पसंख्यक पहचान’के संबंध में केंद्र को निर्देश दिया जाए । अश्विनी उपाध्याय ने लक्षद्वीप, मिजोरम, नगालैंड, जम्मू व कश्मीर, मेघालय, पंजाब, मणिपुर, अरूणाचल प्रदेश में २०११ की जनगणना के अनुसार हिंदुओं की आबादी कम होने के बावजूद उनके अल्पसंख्यक अधिकारों से वंचित होने का मामला उठाया हुआ है । 

२००२ के टीएमएपाई बनाम कर्नाटक वाले मामले में सुप्रीम कोर्ट के 11 जजों की पीठ ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि जिन राज्यों में हिंदुओं की आबादी अन्य की तुलना में कम है, उन्हें राज्य स्तर पर अल्पसंख्यकों की पहचान करके यह दर्जा दिया जाए । 

इस याचिका को सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार करके केंद्र सरकार को नोटिस भेजा । 10 मई को सुप्रीम कोर्ट के सामने केंद्र की ओर से पेश सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि किसी भी समुदाय को अल्पसंख्यक दर्जा देने की शक्ति सिर्फ केंद्र सरकार के पास है और राज्यों से विचार-विमर्श के लिए तीन महीने का समय मांगा । जबकि उसके पहले 25 मार्च को दायर हलफनामे में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि राज्यों के पास भी यह शक्ति है । 

उस वक्त जस्टिस एस॰ के॰ कॉल और जस्टिस एम॰ एम॰ सुंदरेश की पीठ सुनवाई कर रही थी । 10 मई की सरकार की दलील पर दोनों सुप्रीम कोर्ट जजों ने नाराजगी जतायी और कहा कि हिंदुओं समेत अल्पसंख्यकों की पहचान के लिए केंद्र का अलग-अलग रवैया अपनाना न्यायोचित नहीं है । पहले के हलफनामे से मुकरने पर सुप्रीम कोर्ट पीठ ने अप्रसन्नता व्यक्त की, लेकिन और समय मांगने का आग्रह मंजूर कर लिया । दोनों जजों ने सुनवाई की अगली तारीख 30 अगस्त तय कर दी और उस तारीख से तीन पहले सारे विचार-विमर्श के नतीजे की स्टेटस रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया ।

लेकिन अगस्त महीना के आरंभ में ही सुप्रीम कोर्ट को हिंदुओं को अल्पसंख्यक दर्जा और उससे जुड़े अधिकार दिलाने के लिए एक अन्य याचिका पर सुनवाई करनी पड़ी । इस मामले में अश्विनी उपाध्याय याचिकाकर्ता देवकी नंदन ठाकुर के वकील के रूप में सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए । देवकी नंदन ठाकुर भक्ति कथावाचक हैं, जिन्होंने कम हिंदू आबादी वाले राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों में अल्पसंख्यकों की जिलास्तर पर पहचान कराने की मांग रखी थी । उसी पर सुनवाई के दौरान जस्टिस यू यू ललित और जस्टिस रवीन्द्र भट की पीठ ने 08-08-2022 को कहा कि जिला स्तर पर अल्पसंख्यक दर्जा का दावा नहीं कर सकते, यह २००२ के 11 जजों के फैसले के खिलाफ है । अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य स्तर पर अल्पसंख्यकों की पहचान की जानी चाहिए । 

देवकी नंदन ठाकुर ने यह याचिका जून, २०२२ में दायर की, जिस पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने आठ अगस्त को यह टिप्पणी की । अश्विनी उपाध्याय की पहले वाली याचिका 30 अगस्त को अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है । शीर्ष कोर्ट पीठ ने ठाकुर की नयी याचिका को उपाध्याय की याचिका के साथ और अन्य इससे संबंधित मामले को सितंबर, २०२२ में उचित कोर्ट के सामने रखने कहा । 27 अगस्त को जस्टिस यूयू ललित भारत के प्रधान न्यायाधीश का कार्यभार ग्रहण करेंगे । इसलिए हो सकता है, 30 अगस्त और फिर सितंबर की सुनवाई दूसरी पीठ के जिम्मे दिया जाए । आगे का मामला इस पर निर्भर होगा कि केंद्र सरकार 30 अगस्त को विस्तृत विचार-विमर्श के नतीजे का क्या स्टेटस रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को देती है । लेकिन आठ अगस्त को जस्टिस रवीन्द्र भट ने नयी याचिका पर दलीलों का जवाब केंद्र सरकार का और अपना भी काम आसान कर दिया । पीठ जज ने कहा - ‘आप जो कह रहे हैं वो सैद्धानिक रूप से सही है । कश्मीर, मिजोरम, नगालैंड और केरल में भी हिंदू अल्पसंख्यक हो सकते हैं, मामला पहले सुप्रीम कोर्ट पहुंचा हुआ है, यह राज्य-वार है । अगर यह कानून है, तो फिर हमें हस्तक्षेप करने की क्या जरूरत है ।’

अश्विनी उपाध्याय ने टीएमएपाई वाले सुप्रीम कोर्ट फैसले का हवाला देते हुए कहा कि उसके अनुरूप धारा-30 के अंतर्गत अल्पसंख्यकों को धार्मिक, शैक्षणिक और भाषाई आधार पर संस्थाएं स्थापित करने तथा उसके संचालन का अधिकार प्राप्त है । इसके लिए अल्पसंख्यकों की पहचान राज्य स्तर पर की जानी चाहिए, मगर वैसा नहीं किया गया । 

इसी के जवाब में जस्टिस रवीन्द्र भट ने सवाल उठाया कि ‘कैसे आप हर जगह हर किसी को घोषित करेंगे, यह कोर्ट का काम नहीं है । लेकिन मिजोरम या नगालैंड का केस-टु-केस आधार पर ठोस उदाहरण हमें दें तो उसे जरूर देखेंगे ।’ 

वकील अश्विनी उपाध्याय ने हिंदुओं को अल्पसंख्यक दर्जा दिलाने की याचिका वास्तव में 2017 में ही सुप्रीम कोर्ट में लगायी थी, जब कोर्ट ने उन्हें राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के पास जाने कहा । राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने यह कहकर हाथ खड़े कर दिये कि इस पर विचार करना आयोग के अधिकार क्षेत्र में नहीं है और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग एक्ट, 1992 के अतंर्गत सिर्फ केंद्र ही किसी समुदाय को किसी राज्य में अल्पसंख्यक घोषित कर सकता है । उसके बाद जब उपाध्याय ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग एक्ट के अंतर्गत केंद्र के अधिकार को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी । उसके जवाब में केंद्र ने शीर्ष कोर्ट के सामने दो सुनवाई में दो तरह की कैफियत दी ।

अश्विनी उपाध्याय ने मुख्य रूप से मुस्लिम बहुल आबादी वाले कश्मीर के अल्पसंख्यक हिंदुओं के इस दर्जे से वंचित होने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगायी थी । जब सुनवाई शुरू हुई, उस समय तक जम्मू व कश्मीर का धारा-370 के अंतर्गत प्राप्त विशेष राज्य का दर्जा समाप्त हो चुका था । दो केंद्र शासित क्षेत्रों में बंटने के बाद से कश्मीर के अल्पसंख्यक हिंदुओं खासकर कश्मीरी पंडितों पर हमले बढ़ गये हैं और उनके पलायन की चर्चा उफान पर है । वैसे केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने 20-07-2022 को संसद के मानसून सत्र में इस संबंध में उठाए गए सवाल के जवाब में दावा किया कि उग्रवादी हमले में २१ गैर-मुस्लिम कश्मीरी अल्पसंख्यक मारे गए हैं, लेकिन एक भी कश्मीरी पंडित कश्मीर छोड़कर नहीं गए हैं ।