नयी शिक्षा नीति की पूर्वोत्तर में जरूरत है

                                                                                             - शशिधर खान

	

		

पूर्वोत्तर क्षेत्र में नयी शिक्षा नीति लागू करने के लिए गुवाहाटी में इस हफ्ते आयोजित सम्मेलन में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने कहा कि इससे उत्तर-पूर्वी राज्यों को नयी दिशा मिलेगी और विकास के नए अवसर मिलेंगे । एनईपी (नयी शिक्षा नीति) लागू होने के बाद पूर्वोत्तर राज्यों पर केंद्रित पहले सम्मेलन में सभी 8 उत्तर-पूर्वी राज्यों के शिक्षा मंत्री मौजूद थे । असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सर्मा ने सह-आयोजक के रूप में सक्रिय भूमिका निभायी । धर्मेन्द्र प्रधान ने पूर्वोत्तर की स्थानीय भाषाओं में उच्चस्तरीय शिक्षा योजना की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए मणिपुरी भाषा का खास तौर से जिक्र किया और इस बात पर बल दिया कि पूर्वोत्तर में नयी शिक्षा नीति सरकार की उच्च प्राथमिकता है, सबसे पहले यहीं लागू की जाएगी । केंद्रीय शिक्षा मंत्री का यह कथन गौर करने लायक है और माएने रखता है, क्योंकि पूर्वोत्तर सबसे ज्यादा उपद्रवग्रस्त राज्य मणिपुर में अचानक उग्रवादी हिंसा में उफान आ गया है । 

मणिपुर की म्यांमार से सटी सीमा के पास चुराचांदपुर जिले के बहियांग गांव में 13 नवंबर को उग्रवादियों ने असम राइफल्स के काफिले पर घात लगाकर हमला कर दिया, जिसमें कमांडिंग ऑफीसर कर्नल विप्लव त्रिपाठी, उनकी पत्नी और पांच साल का बेटा समेत चार जवान मारे गए । इंफाल से प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार इस हमले की जिम्मेदारी मणिपुर के सबसे मजबूत उग्रवादी गुट पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) और मणिपुर नगा पीपुल्स फ्रंट (एमएनपीएफ) ने ली है । पीएलए मणिपुर को भारत से अलग करके एक ‘स्वतंत्र संप्रभु राजसत्ता’स्थापित करने के लिए लड़ रहा है । एमएनपीएफ को भी मणिपुर की आदिवासी बहुल नगा आबादी के विभिन्न गुटों को मिलाकर अलग ‘स्वतंत्र ग्रेटर नगालिम’चाहिए । यह नगा समुदाय उन नगा गुटों में शामिल नहीं है, जिनकी भारत सरकार से शांति वार्ता और संघर्षविराम सहमति चल रही है । इसके अलावे मणिपुर में 11 जनजातीय गुट हैं, जिनमें से प्रमुख हैं - युनाइटेड लिबरेशन फ्रंट (यूएनएलएफ) कांग्लीपैक कम्युनिस्ट पार्टी (केसीपी), मणिपुर पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट (एमपीएलएफ) और कूकी नगा समुदायों का संगठन - केवाईकेएल तथा प्रीपैक सारे गुट खुद को कम्यूनिस्ट कहते हैं और सब के सब मणिपुर को भारत से अलग करने के लिए हिंसा पर आमादा हैं । इस लड़ाई को खींचनेवाली तीसरी पीढ़ी है, जो कानून व व्यवस्था समझती ही नहीं हैं । क्योंकि इन नवयुवकों को समझाया ही नहीं गया है । वैसी शिक्षा नहीं मिल रही है । गलत शिक्षा और ट्रेनिंग देकर नौजवानों को गुमराह करने और खुद के साथ-साथ समाज, देश के भविष्य से खिलवाड़ करना सिखाया जा रहा  है । समाज की मुख्यधारा को छोड़कर बीहड़ों में जिंदगी तबाह करने को विवश किया गया है । 

1990 के दशक के बाद पहली बार इतना बड़ा उग्रवादी हमला हुआ है । हमले के हफ्तेभर बाद २० नवंबर को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने नयी शिक्षा नीति लागू करने के लिए सम्मेलन आयोजित किया । इसके लिए पूर्वोत्तर के सबसे बड़े राज्य असम की राजधानी गुवाहाटी को चुना गया । असम ऐसा राज्य है, जिससे काटकर मेघालय, अरूणाचल प्रदेश, मणिपुर राज्य बना है । उतना ही नहीं असम उग्रवाद का जन्मस्थल भी है । उसी राज्य में सबसे पहले भारत से अलग ‘स्वतंत्र संप्रभु असम’की अलगाववादी हिंसा पनपी । नगा उग्रवाद के अलावे आजाद भारत के अंदर ‘आजादी’की लड़ाई की कई शाखाएं पनपी, जिसका प्रचार-प्रसार समूचे पूर्वोत्तर में हुआ । असम के दिमा हासाओ और कार्बी आंगलोंग जिले में इस उग्रवादी गुट का गठन २०१९ में ही हुआ है । एक अच्छा संयोग ये भी है कि असम के अंदर ‘आजादी’और संप्रभुता की मांग करनेवाले कई गुटों ने हिंसा छोड़कर इस बीच भारत सरकार के साथ शांति समझौता किया है । नयी शिक्षा नीति से उग्रवाद की जगह राष्ट्रवाद की ओर नौजवान प्रेरित होंगे और अनिश्चित भविष्य की जगह एक नया विकास का रास्ता अपनाने में उन्हें सहूलियत होगी । असम के सबसे मजबूत और संगठित युनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) का उफान उतार पर है । स्वाधीन असम पर अड़े उल्फा के परेश बरूआ गुट की उल्टी गिनती चल रही है । ऐसे ही माहौल में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने इंफाल जाकर भारतीय आजादी के अमृत महोत्सव में कई ‘आजाद मणिपुर’के लिए लड़ाई लड़े रहे उग्रवादी गुटों को रास्ते पर लाने का प्रयास किया । भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महती भूमिका निभाने वाले मणिपुरी सेनानियों के लिए १५ करोड़ की लागत से बननेवाले संग्रहालय का उद्घाटन करते हुए अमित शाह ने कहा - ‘इससे उग्रवाद की जगह राष्ट्रवाद का संदेश जाएगा ।’ 

चुराचांदपुर हमले में उग्रवादियों ने आईईडी (इंप्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाईस) से बम धमाका किया । सिर्फ मणिपुर ही नहीं, समूचे पूर्वोत्तर में युवाओं को यही सीख दी जाती है । उनका बचपन तनाव और हिंसा के वातावरण में गुजरता है । किशोर उम्र से ही उन्हें बम बनाने, घात लगाकर छापामार हमले और भारत को अपना देश न मानते हुए जीवनयापन के गलत तरीकों की शिक्षा मिलती है । सेना और अर्द्धसैनिक बलों के पास इसके पुख्ता सबूत हैं कि उग्रवादियों के पास आय के स्रोत हैं - जबरन टैक्स वसूली और अफीम, हेरोईन जैसी महंगी नशीली दवाओं की तस्करी । जनजातीय बहुल आबादी वाले उत्तर-पूर्व को प्रारंभिक शिक्षा देनेवाली इसाई मिशनरियां उनकी जीवनशैली बदलने के साथ-साथ भारत से अलग अस्तित्व की लड़ाई लड़ना भी सिखाती हैं ।


	भारत सरकार के साथ जो एनएससीएन (मुइवा) का संघर्षविराम समझौता 1997 से चल रहा है । उसमें मुइवा खुद को नगाओं के स्वयंभू प्रतिनिधि का दावा करते हैं । जिन राज्यों की नगा आबादी को मिलाकर ‘ग्रेटर नगालिम’की वार्ता जारी है । उनमें से एक भी राज्य एक इंच जमीन छोड़ने को तैयार नहीं है । 

	नयी शिक्षा नीति से सोच तो बदलेगी । यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि आजादी के 75 वें वर्ष में पूर्वोत्तर क्षेत्र का सभी राजधानियों का ‘मेनलैंड इंडिया’से रेल संपर्क नहीं है । विकास के दौड़ में इतना पीछे रहने के लिए कौन जिम्मेदार है, इसका कारण नयी शिक्षा नीति से लाभान्वित होनेवाले नौजवान सोचेंगे ।