राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति का साझा चुना जाना अच्छा होता

                                                                                                 - शशिधर खान

	



राष्ट्रपति चुनाव में विपक्षी एकजुटता की जितनी फजीहत हुई, उससे ज्यादा ६ अगस्त को होनेवाले उपराष्ट्रपति चुनाव में होनी तय है । भाजपा नीत राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठजोड़ (एनडीए) की ओर से राष्ट्रपति चुनाव के संभावित नाम की चर्चा द्रौपदी मूर्मू को उम्मीदवार घोषित किए जाने के पहले से नहीं थी । लेकिन भाजपा केंद्रीय नेतृत्व ने विपक्ष के वरिष्ठ नेताओं से बातचीत की पहल की । राष्ट्रपति पद के लिए ऐसा उम्मीदवार तलाशने की शायद मंशा रही होगी, जिस पर विपक्ष की भी सहमति हो । लेकिन विपक्षी दलों में आपस में ही ऐसे उम्मीदवार को लेकर मतभेद था, जिन्हें भाजपा के मुकाबले में खड़ा किया जा सके । सर्वसम्मत उम्मीदवार तय करने के लिए भाजपा या एनडीए घटकों से बात करने का प्रश्न कहां उठता था । 


विपक्षी खेमे में सिर्फ इतना हुआ कि यशवंत सिंहा का किसी ने खुलकर विरोध नहीं किया, उनके नाम पर सहमति नहीं थी उसका सबूत राष्ट्रपति चुनाव के लिए हुए मतदान के दिन 13 राज्यों के सवा सौ से ज्यादा विधायकों के क्रॉस वोटिंग दावे से मिल गया । विपक्षी एकता के छिन्न-भिन्न होने और पोल खुलने की स्थिति से बचा जा सकता था, जो क्रॉस वोटिंग से देश ने जाना । अपनी कमजोरी जानते हुए भी विपक्ष ने सिर्फ खानापूरी और इसे अपनी अहम की लड़ाई समझकर राष्ट्रपति चुनाव लड़ा, जिसमें मुख्य भूमिका पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री दीदी की थी । वहीं गत उपराष्ट्रपति चुनाव में भी हो रही है । 



मारगरेट अल्वा भाजपा शासित राज्यों समेत सभी मुख्यमंत्रियों से बात कर रही हैं । सबसे पहले उन्होंने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से बात की । उसके बाद असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा और कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई से भी अल्वा के बात करने की रिपोर्ट है । ये दोनों भाजपा मुख्यमंत्री हैं । 

राष्ट्रपति चुनाव में यशवंत सिन्हा को सिर्फ 208 संसद सदस्यों के वोट मिले, जबकि द्रौपदी मूर्मू के पक्ष में 540 संसद सदस्यों ने मतदान किया । उपराष्ट्रपति चुनाव में सिर्फ संसद सदस्यों को ही वोट डालना होता है । इसलिए मारगरेट अल्वा के पक्ष में हार का ही आंकड़ा बैठता है । 

केंद्र में सत्तारूढ़ गठबंधन का नेता तो निर्विवाद रूप से भाजपा है । लेकिन विपक्ष का न तो गठजोड़ है, न कोई नेता । नेतृत्व को लेकर असम का टकराव भी विपक्ष के कमजोर पड़ने का कारण है । सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच आपसी सहमति से सर्वसम्मत उम्मीदवार तय करना विपक्षी एकजुटता से संभव हो सकता था । 


भाजपा केंद्रीय नेतृत्व विपक्ष को बिल्कुल बेजान करने पर तुला है । विशेषकर उपराष्ट्रपति चुनाव में तो यह उजागर हो गया । जगदीप धनखड़ के बहाने ममता बनर्जी से रंजिश निकालने के बजाए भाजपा द्रौपदी मूर्मू की ही तरह किसी साफ-सुथरी छवि वाले व्यक्ति को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाकर एक अच्छी शुरूआत कर सकती थी । क्योंकि भाजपा गठजोड़ इतनी मजबूत स्थिति में है कि किसी को भी राष्ट्रपति की तरह उपराष्ट्रपति पद पर जिता सकती है । 

जो कुछ हो रहा है वो भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के लिए शुभ नहीं है । राष्ट्रपति चुनाव के दौरान ही 16 जुलाई को कांग्रेस शासित राजस्थान विधान सभा के एक समारोह में भारत के प्रधान न्यायाधीधा एन॰ वी॰ रमना को आखिरकार कहना पड़ा कि ‘विपक्ष का लगातार सिकुड़ते जाना लोकतंत्र की सेहत के लिए अच्छा नहीं    है ।’उन्होंने कहा कि पहले विपक्ष और सत्ता पक्ष में एक-दूसरे के लिए आदर का भाव था, जिसका अब ह्रास हो रहा है । सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस ने कहा कि ‘पूरी चर्चा और बहस के बिना ही कानून पास किए जा रहे हैं, विपक्ष को मजबूत करना संसदीय लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक है ।’