2025 के नोबेल पुरस्कार विजेता लासलो क्रासनाहोरकई पर विशेष
त्रासदी में ताजगी की तस्वीर है लासलो की लेखनी
- शशिधर खान
‘बहुत ही कठिन समय है अभी धरती और मानवता के लिए’- ये शब्द हैं वर्ष 2025 के नोबेल साहित्य पुरस्कार विजेता लासलो क्रासनाहोरकई के, जो उन्होंने पुरस्कार पाने की जानकारी मिलने के बाद प्रसन्न होकर व्यक्त किए । सुनने, पढ़ने में यह पंक्ति निराशा और हताशा का एहसास दिलाने वाली लगती है, मगर इसमें जीवन दर्शन का रहस्य झलकता है ।
यह एक ऐसे सेलिब्रिटी रचनाकार के उद्गार हैं, जो यूरोप ही नहीं, दुनिया के सारे वादों से परे मानवतावादी और सिर्फ मानवतावादी हैं ।
अभी अंतरराष्ट्रीय जगत के सबसे प्रतिष्ठित और बहुचर्चित समकालीन लेखक लासलो क्रासनाहोरकई उन गिने-चुने शब्दशिल्पियों में से हैं, जिन्होंने अवसाद में खुशी, प्रतिकूल में अनुकूल तथा त्रासदी में जिंदगी का दर्शन बोध जगाने वाली सहजता का चित्रण किया है । उनके कहने का तात्पर्य है कि जो मानव खून खराबा, टकराव सोचता है, उसी मानव के मन में भाईचारा और जुड़ाव की भी भावना पनपती है । यह आत्मा की आवाज है, जो मानवता का धर्म है और जिस पर धरती का अस्तित्व टिका है । इस रास्ते को अपनाना आसान नहीं है, इसलिए विश्व और समाज कठिन दौर से गुजर रहा है । अवसाद के अंबार से ही आशा की किरण फूटती है और तभी जीवन सामान्य हो पाता है ।
लासलो क्रासनाहोरकई (Lंे़सव Kतंे़दंीवतांप) नोबेल साहित्य पुरस्कार पानेवाले 116वें और हंगरी के दूसरे साहित्यकार हैं । वे अर्नेस्ट हेमिंग्वे, अल्बर्ट कामू और टोनी मॉरिसन जैसे महारथियों की श्रेणी में शामिल हो गए हैं ।
स्वीडन की नोबेल अकादमी की ओर से पुरस्कार की घोषणा के बाद आयोजित संवाददाता सम्मेलन में लास्लो क्रासनाहोरकई को ऐसा विशिष्ट कलाकार बताया गया, जो ‘आतंक और भितरघात के इस युग में मानव-आत्मा के भीतर इन्सानियत जगानेवाली कलम में पारंगत हैं ।’
1901 से चली आ रही नोबेल श्रृंखला की परंपरा के अनुसार हर साल अक्टूबर के पहले सप्ताह में पुरस्कार की घोषणा होती है और इसके संस्थापक आल्फ्रेड नोबेल की पुण्यतिथि के दिन 10 दिसंबर को पुरस्कार प्रदान किया जाता है ।
पुरस्कार की घोषणा के समय से ही नोबेल विजेताओं की प्रतिक्रियाएं मीडिया में आनी शुरू हो जाती हैं और यह सिलसिला 10 दिसंबर को पुरस्कार प्रदान के बाद से ढीला पड़ जाता है । साहित्य और शांति के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान करनेवाले नोबेल विजेताओं की टिप्पणियां अन्य की तुलना में ज्यादा सुर्खियों में आती हैं । क्योंकि साहित्य और शांति का नोबेल पुरस्कार प्रायः विवादों में रहता है ।
लासलो ज्यादा समय चुप्पी साधे रहनेवाले और कम नपे-तुले शब्दों में बोलनेवाले साहित्यकारों में से हैं । पुरस्कार घोषणा के समय उन्होंने एकाध पंक्तियों में अपनी प्रतिक्रिया मिलने आए मीडिकर्मियों के बीच या वाट्सएप पर दी । लासलो को हंगरी स्थित अपने आवास पर ही नोबेल पुरस्कार पाने की सूचना मिली ।
पुरस्कार समारोह से तीन दिन पहले स्टॉकहोम में आयोजित विशेष आयोजन में लासलो क्रासनाहोरकई ने लंबा लेक्चर दिया । दर्शन, दिग्दर्शन और अध्यात्म से ओतप्रोत लासलो के कथन से विश्व को उनके विशिष्ट अलौकिक व्यक्तित्व का परिचय मिला । उसके बाद से लासलो की रहस्यमयी सोच का पुनरावलोकन हो रहा है ।
क्रासनाहोरकई का व्याख्यान पढ़ने से पहले सुधी पाठक उनका एक नीति वाक्य - ‘मेरा जीवन ही एक स्थायी त्रुटि सुधार है’, को ध्यान में रखें, जिसे वे अपनी सफलता की सीढ़ी मानते हैं । हमेशा स्वयं को सुधारने की धारणा मन में बनाकर सृजन करने की इसी अतुलनीय कला ने लासलो को भय और आतंक में जकड़े मानव अवसाद के कैनवस पर पीड़ा उकेरनेवाला कुशल मास्टर बना दिया । लासलो की सर्वाधिक प्रशंसित और चर्चित कृति ‘मीलेनकोली ऑफ रेसिस्टेंस’पर फिल्म बनानेवाले बेला तार ने क्रासनाहोरकई को नोबेल पुरस्कार मिलने के एलान के बाद 09 अक्टूबर को उन्हें ‘अवसाद का मास्टर’बताया ।
2015 में मैन बूकर पुरस्कार से सम्मानित होने के समय भी लासलो ने यही बात कही थी - ‘मेरा जीवन स्थायी त्रुटि सुधार है’, जिसे उन्होंने 2025 में नोबेल मिलने के बाद दुहराया ।
अंग्रेजी के पाठकों को ऐसे चितेरे लेखक का पहला परिचय ‘मीलेनकोली’से ही मिला, जब जार्ज जिरटेस ने 1998 में अनुवाद किया । यह किताब हंगरी में 1989 में छपी ।
07 सितम्बर को नोबेल पुरस्कार समारोह वक्तव्य में लासलो ने अंतरराष्ट्रीय साहित्य जगत को अपने दार्शनिक मन-मस्तिष्क का परिचय दिया । उन्होंने अपने व्याख्यान की शुरूआत ही यह कहकर किया कि आशा और उम्मीद पर समाज, विश्व का अस्तित्व टिका है, मगर ‘मेरी जिदंगी की उम्मीद स्टोर खतम होने की हालत में है, इसलिए मैं फरिश्तों की बात करता हॅूं । जीवन का सारी उपलब्धियां, साधना मैंने इस आशा को समर्पित कर दिया कि अब यह विभीषिका अंतिम है, इसके बाद मानव समाज को त्रासदी से छुटकारा मिल जाएगा और सड़ान्ध युक्त हवा में सांस लेने के सपने दिखेंगे । लेकिन उम्मीद का दिलासा भंडार समाप्त होना निश्चित लगता है । ऐसे में फरिश्तों की बात करूंगा ।’
इस भूमिका के आलोक में लासलो क्रासनाहोरकई का नोबेल साहित्य पुरस्कार व्याख्यान के प्रमुख अंश प्रस्तुत हैं - उन्हीं के शब्दों में - ‘मैं जब नीचे चलता हॅूं तो फरिश्तों के बारे में सोच रहा हॅूं । फिर ऊपर चलने पर भी फरिश्ते ही मन में रहते हैं । अनवरत ऊपर नीचे करते हुए कहीं अज्ञात जगत में चला जा रहा हॅूं । आपको लगता है कि मैं यहां खड़ा आपके सामने माइक्रोफोन पर बोल रहा हॅूं, मगर वो मैं नहीं हूं । दरअसल मैं चारों तरफ इस कोने से उस कोने चक्कर लगा रहा हूं और फिर वहीं लौटता हॅूं, जहां से शुरू किया । चक्कर लगाने का सिलसिला पता नहीं कैसे फिर शुरू हो जाता है । अरे हां, फरिश्तों के विषय में सोच रहा हॅूं, जी हां फरिश्ते । और तत्काल मुझे महसूस होता है कि नए प्रकार के फरिश्ते हैं ये । ऐसे फरिश्ते हैं, जिनके पंख नहीं हैं । इसलिए सोचता हॅूं, ये आसमान से उड़ के आते कैसे हैं और वहां किस घोंसले में चले जाते हैं । लाख बलिहारी है, उस नैसर्गिक दिव्य शक्ति की, जिसने फरिश्तों के ऐसे पंख बनाए जो उनकी पीठ से चिपके रहते हैं । अनंत आकाश, स्वर्ग में उन्मुक्त विचरण करनेवाले फरिश्तों के ये दोनों पंख उनकी पीठ में सिलनेवाले अदृश्य दर्जी की तारीफ है, उस वर्कशॉप की बलिहारी है, जिसमें इतने अज्ञात ज्ञान समाए हैं । सोचने की बात है कि ड्रेसिंग के समय ये पंख अगर बाहर होंगे तो कहां रखे गए होंगे । आप हवा में प्रेम से फरिश्तों के पंखों को हाथ से टटोलें तो हवा भी उन पंखों से ढंकी मिलेगी । अगर ये पंख फरिश्तों से चिपके नहीं हैं, तो कैसे यह नैसर्गिक घंटा उनके अंगों को पंखों के साथ ढंक रखा है ।’
अपने दिलो-दिमाग में चल रहे इस मानसिक ऊहापोह का बखान करते हुए लासलो ने श्रोताओं की दिग्भ्रमित अवस्था को समझते हुए स्पष्ट किया कि ‘मैं एक नये किस्म के फरिश्तों की बात कर रहा हॅूं, जो पुरानी परी कथाओं से भिन्न है । ये वो फरिश्ते हैं, जिनसे मैं अपने कमरे में घिरा रहता हॅूं और अभी जब मैं नोबेल साहित्य पुरस्कार विजेता के रूप में बोल रहा हॅूं, तब भी फरिश्तों से घिरा हूं । सिर्फ आशा उम्मीद की बात करना चाहता था, मगर करूंगा नहीं, क्योंकि उसकी जगह विशाल नहीं है ।’
लासलो ने अपनी पुस्तकों की तरह घटनाक्रम के पात्रों पर विवादास्पद या चुभनेवाली टिप्पणियों से परहेज रखते हुए दुनिया भर के लगभग सभी युद्धोन्मादी स्थितियों का जीवंत चित्रण किया है ।
लासलो ने कहा - ‘आखिर इस पाशविक नृशंस मानसिकता से मानव समाज कब मुक्ति पाएगा, जो अपने अंदर और बाहर युद्ध सिर्फ युद्ध के सिवाए कुछ देखता नहीं । देश में युद्ध, समाज में युद्ध, परिवार में युद्ध, प्रकृति में युद्ध, समुद्र, हवा में युद्ध । जो दबा है, वो विद्रोह में सफल हो जाने के बाद वही दबाने कुचलने की नीति अपना रहा है । शांति, सद्भाव के प्रयासों की सिर्फ खानापूरी करनेवाले अपने चारों तरफ स्वनिर्मित युद्ध के मंडराते बादलों से बरसते लहू में नहाने से नहीं ऊबते । मानव में अपनी मानवता की गरिमा का ख्याल रखने की प्रवृति कब जगेगी ? यही सवाल मैं अपने इर्द-गिर्द चक्कर काटते फरिश्तों से पूछता हूं । ये फरिश्ते तमाशबीन क्यों बने हुए हैं, क्या सृष्टि के सर्वनाश तक तमाशवीन ही बने रहेंगे, जिनके पंख भी जमे खून के थक्के और बारूदी धुएं से स्याह पड़ गए होंगे ?
साहित्य, संस्कृति समाज के साथ चलती है । इसलिए ऐसे अमानुषिक वातावरण से साहित्य अछूता नहीं रह सकता । साहित्य सृजन पर इसका प्रभाव पड़ना ही है, इसलिए साहित्यकारों के मन को तनाव और अवसाद द्वारा मथा जाना स्वाभाविक है ।
लासलो ने अपने लेखन का सार यह बताया - ‘एक खराब शब्द संपूर्ण शाश्वत चराचर को घायल करने के लिए पर्याप्त है ।’इसी संत वाक्य से नोबेल साहित्य सम्मान प्राप्त संवेदनशील लेखक लासलो ने अपना संबोधन शुरू किया और व्याख्यान समाप्ति के समय भी दुहराते हुए कहा - ‘किसी को ठेस न पहुंचे फरिश्तों’
क्रासनाहोरकई पूर्वी-मध्य युरोप के ऐसे देश हंगरी में पले-बढ़े, जहां की धरती ने सदियों तक मानव निर्मित आपदाओं के कारण विभीषिकाएं झेली हैं ।
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जब युरोप दो खेमे में बंट गया और दो साम्राज्यवादी जमात बन गयी, उस समय से हंगरी में दमन का नया दौर शुरू हुआ । पूर्वी यूरोप का स्वयंभू भाग्यविधाता सोवियत संघ ने खुद को घोषित कर दिया और पड़ोस के छोटे, कमजोर देश संघ के तथाकथित रिपब्लिक जबरन बनाए गए । आज के रूस का पुराना नाम था – UैैR (यू एस एस आर - यूनियन ऑफ सोवियत सोसलिस्ट रिपब्लिक) जो 1989 में धराशायी हो गया । पूर्वी जर्मनी, हंगरी, पोलैंड, रोमानिया, चेकोस्लोवाकिया समेत दर्जनों देशों को कम्युनिस्ट तानाशाही दमन से मुक्ति मिली । लोगों ने लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति की खुली हवा में सांस ली और सोवियत संघ बिखरकर सिर्फ रूस रह गया ।
1989 में इस शीत युद्ध का भी सोवियत संघ के नेतृत्व वाले कम्युनिस्ट ‘जनवादी’साम्राज्य के साथ ही पतन हो गया ।
पाठकों को यह बैग्राउंड याद दिलाना जरूरी था, ताकि 71 वर्षीय लासलो क्रासनाहोरकई ने नोबेल सम्मान मिलने के बाद अपने लेखन के बारे में जो कुछ कहा वो रूचिकर लगे और समझने में सहूलियत हो । जाहिर है कि लासलो का बचपन और किशोरावस्था सोवियत युगीन हंगरी में गुजरा । उन्होंने अपने आरंभिक उपन्यास बेहद कठिन और आसामान्य हालातों में लिखे । अपने प्रयोगात्मक गद्य, प्रवाहपूर्ण शैली से लासलो ने फंतासी की परिकल्पना और दार्शनिक खोज की अद्यतन अपूर्व दक्षता का परिचय हर पैरे में किया । लासलो का गद्य काव्यात्मक और संगीतमय लगता है, जिसकी बदौलत वे पाठकों को एक अनसुलझे जगत में ले जाते हैं । लासलो संगीतकार और चित्रकार हैं, इसलिए उनके लेखन में दोनों के बिम्ब झलकते हैं ।
लासलो के लेखन में इतनी सारी विचारधाराओं, चिंतनों का मिश्रण मिलता है कि उनके व्यक्तित्व का आकलन भी विशिष्ट है । पश्चिम और पूर्वी युरोप के कालजयी लेखकों तथा मनीषी विद्वानों से भी वे प्रभावित हैं । कुछ विश्लेषकों ने लासलो को विभिन्न ध्रुवों के बीच कड़ी बताया है । नोबेल पुरस्कार की राजनीति पर लासलो ने कभी कोई टिप्पणी नहीं की और वैसे लेखकों से भी प्रेरणा ली, जिनका नाम दुनिया में विवादों के कारण स्थापित हुआ । लासलो एक तरफ सैमुएल बेकेट, बिलियम फॉकनेर, हरमैन मेलविले, दांते (Dंदजम) और युनानी अमर संत कवि होमर के प्रशंसक हैं और दूसरी तरफ टॉल्सटॉय, दोस्तोएव्स्की तथा फ्रेंज काफ्का के भी फैन हैं । खासकर काफ्का के तो इतने दीवाने हैं कि लासलो के ही शब्दों में - ‘काफ्का मेरी जेब में रहते हैं ।’
पाठकों को ध्यान दिला दें कि काफ्का अंतरराष्ट्रीय साहित्य संसार की सुर्खियों में कम्युनिस्ट खेमे के धराशायी होने के बाद चेकोस्लोवाकिया में मुक्ति हवा के साथ आया । 1989 की रिपोर्ट के अनुसार चेकोस्लोवाकिया में नयी लहर आते ही फ्रैंज काफ्का की प्रसिद्ध कृति ‘दि कैसल’(The Cंेजसम) पर 50 वर्षों से लगा प्रतिबंध हटा और एक हफ्ते के अंदर इस किताब की एक मिलियन प्रतियां दुनिया भर में बिक गयी । काफ्का के साथ ही दूसरे चेक लेखक मिलान कुंडेरा पर भी प्रतिबंध हटा, जिनकी किताब ‘लाईफ इज एल्सह्वेयर’और ‘लाफेबल लब्स’का भी अंतरराष्ट्रीय साहित्य मंच पर स्वागत हुआ ।
लासलो ने कुछ वर्ष पहले न्ययॉर्क टाइम्स से बातचीत के क्रम में कहा - ‘मेरा शुरू से ही प्रयास मौलिक लेखन का रहा ताकि पाठकों को नया लगे और उबाऊ या बोझिल न महसूस करें । कोई सजग पाठक पूववर्ती लेखकों की नकल न कहें । काफ्का, दोस्तोएव्स्की, फॉकनर पढ़ा जरूर, काफ्का को पढ़ना तो मेरा व्यसन है । लेकिन इस बात का ख्याल रखा कि मेरे लेखन को कोई ऐसे महान लेखकों का नया संस्करण न कहें ।'
लासलो के प्रशंसित उपन्यासों में से एक है ‘वार एंड वार’जिसके बारे में उनके मित्र और समकालीन लेखक सुसान सोन्ताग ने पूछ दिया कि क्या इसे टॉल्सटॉय की ‘वार एंड पीस’का प्रभाव न माना जाए ? पाठकों को यहां भी ध्यान दिला दें कि ‘वार एंड पीस’टॉल्सटॉय की कालजयी कृति है, जिन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध रोकने का भरपूर प्रयास किया । लासलो ने अपने मित्र के प्रश्न का गंभीर जवाब दिया - ‘जिस समय टॉल्सटॉय ने वो पुस्तक लिखी थी, उस समय युद्ध उन्मादी शासक आज की तुलना में कम थे और आज की तरह हिंसा के जवाब में हिंसा की सनक विश्वव्यापी नहीं थी । तानाशाही शासक भी शांति और सद्भाव कायम करने के प्रयासों में जुटे लेखकों, चिंतकों, समाज सुधारकों की बिल्कुल उपेक्षा नहीं करते थे । ‘लेकिन आज तो युद्ध और सिर्फ युद्ध (बार एंड बार) ही हो रहा है ।’नोबेल पुरस्कार मिलने के समय छपी लासलो की पुस्तक ‘हस्ट 07769' का कथानक जर्मनी पर आधारित है, जिसमें पूर्व जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल को एक सफाईकर्मी पत्र लिखता है और विश्व में बढ़ती विनाशकारी प्रवृत्ति को रोकने की कोशिश का उनसे आग्रह करता है ।
10 दिसंबर को नोबेल पुरस्कार समारोह के बाद पश्चिमी देशों में ऐसी वारदातें सामने आयीं, जिससे जर्मनी प्रासंगिक हो गया । यह मामला यहूदियों के खिलाफ हमले के कारण विवादास्पद हुआ, जिसके केंद्र में फिर से जर्मनी है । लासलो से जुड़ा होने का कारण उनका यहूदी परिवार में पैदा होना है । वकील पिता ने अपनी यहूदी विरासत को लासलो से छिपाकर रखा । 1954 में बुडापेस्ट के जिस मिचूला कस्बे में लासलो जन्मे, वो रोमानिया से सटा है । हंगरी और रोमानिया दोनों ही क्रूर तानाशाही का दंश झेल रहे थे । लासलो के लिए अनिवार्य सैनिक ट्रेनिंग लेने की मजबूरी थी । किशोर उम्र से ही भावुक लासलो को अकुशल सैनिक बताकर सजा दी गयी और वे छोड़कर भाग निकले । उसके बाद जीवनयापन के लिए लासलो भटकते रहे, उसी दौरान जाज बैंड में शामिल होकर पियानो बजाना सीखा और साथ में साहित्य का अध्ययन भी जारी रखा । बाद में यही संगीत और साहित्य ने उनके लेखकीय जीवन को बहुआयामी तथा विविधताओं से सुशोभित कर दिया । पूरी जिंदगी बाहर की बेचैनियों के कारण अपने अंदर के झंझावातों से शांतिपूर्वक उलझते हुए भी लासलो ने अपने लेखन और बातचीत में संयत तथा सधी हुई भाषा का इस्तेमाल किया है ।
यहूदी प्रसंग के जिक्र में जर्मन तानाशाह हिटलर का यहूदी सफाया अभियान इतिहास याद कर लेना जरूरी है । दूसरे विश्वयुद्ध के समय मुख्य रूप से जर्मनी की अगुवाई में इटली और जपान निशाने पर था ।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद विजेता देशों द्वारा विभाजित जर्मनी का पूर्वी हिस्सा सोवियत संघ के खेमे में चला गया । 1989 में बिखराव के समय कम्युनिस्ट पूर्वी जर्मनी की खस्ता हालत बड़े भाई पश्चिम जर्मनी को नहीं देखी गयी । उस समय पश्चिम जर्मन चांसलर होल्मुट कोल के प्रयासों से जर्मनी के एकीकरण पर लासलो ने उन्हें धन्यवाद दिया । आज जर्मनी से ही पश्चिम में यहूदियों के खिलाफ शुरू हुई हिंसा से वे खिन्न हैं ।
लासलो ने किसी देश या समुदाय का नाम नहीं लिया । लेकिन प्रकाशंतर से बातचीत में कहते हैं, हिंसा और युद्ध के इतिहास में नए अध्याय जोड़नेवाले सारे कारक पुराने हैं । रूस के राष्ट्रपति ब्लादीमिर पुतिन यहूदी हमले के खिलाफ पश्चिमी देशों को चेतावनी देते हैं और यूक्रेन से युद्ध खतम करना नहीं चाहते । शीतयुद्ध के जहन में उबलती गर्मी तो बरकरार है, जिसका खामियाजा बेकसूर, लाचार मानवता भुगत रही है ।
लासलो ने ‘सैतानतांगो’जैसे ही लोकप्रिय कृति ‘बैरन बेन्कहाइम्स होमकमिंग’में त्रासदी की तस्वीर पेश की है । मास्टरपीस उपन्यास ‘सैतानतांगो’में हंगरी के ही एक सामूहिक फार्म को अपना अस्तित्व बचाने के लिए जो खूनी संघर्ष करना पड़ा, उसी को लेखक ने माध्यम बनाया है । ये 1985 में कम्यूनिज्म के पतन की सुगबुगाहट के समय की कहानी है ।
लासलो को ‘अवसाद का मास्टर’कहनेवाले फिल्म निर्माता बेला तार की ‘सैतानतांगो’के नाम से भी बनी सात घंटे लंबी फिल्म सर्वश्रेष्ठ आर्टहाउस फिल्म मानी जाती है । बेला तार ने खुद स्वीकारा है कि 1994 में इस फिल्म के प्रदर्शित होने के बाद उन्हें अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली । यह उपन्यास हंगरी के एक छोटे से गांव के बेसहारा वाशिंदों की मुश्किलों से भरी जिंदगी पर केंद्रित है । इसमें अराजकता, धोखा और मानव स्वभाव की कमजोरियों को प्रभावी दार्शनिक अंदाज में चित्रित किया गया है ।
क्रासनाहोरकई का लेखकीय और पारिवारिक जीवन कई समकालीन तथा पूर्वज लेखकों से कुछ माएने में भिन्न है । अधिकांश लेखक अपनी प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचने के बावजूद अपनी महत्वाकांक्षाओं और उपलब्धियों को समेट नहीं पाते । इसलिए हर प्राप्ति उनके लिए एक नया असंतोष बन जाती है । झुंझलाहट और तनाव इस तरह वैसे लेखकों पर हावी हो जाता है कि वे अपना पारिवारिक जीवन कलहपूर्ण तथा लेखन को भी कुछ हद तक प्रदूषित कर डालते हैं । कई शादियां, कई प्रेम और आत्महत्या की नौबत इसकी परिणति साबित होती है ।
क्रासनाहोरकई की भी दो पत्नियां हैं और दोनों से उनके अच्छे संबंध हैं । उनकी तीन बेटियां हैं । लेकिन लेखकीय स्वभाव के कारण यायावरी और घुमक्कड़ी में रमे लासलो निजी कारणों से हंगरी शहर से बाहर पहाड़ी में अकेले रहना पसंद करते हैं, जैसा कि उनके जानकारों का कहना है ।
निराशा, अवसाद के क्षणों में मनुष्य के अंदर और बाहर की हवा को कागज पर उतारनेवाले लासलो खुद की तरह रचनाकारों की आशा को संबल बनाकर विश्व के मौजूदा हालात से उबारने को प्रेरित करते हैं ।
संयोग कुछ ऐसा रहा कि नोबेल साहित्य पुरस्कार की घोषणा के एक महीने बाद 2025 के मैन बूकर पुरस्कार पानेवाले भी हंगरी मूल के ही लेखक डेविड स्जेले निकले और उन्हें भी जीवन की विभीषिका का चित्रण करने में महारथ हासिल है । डेविड स्जेले लंदन में रहते हैं । पाठक याद कर लें कि लासलो क्रासनाहोरकई को 2015 में बूकर पुरस्कार मिल चुका है ।
10 दिसंबर के बाद क्रासनाहोरकई के हंगरी स्थित आवास पर जाकर डेविड स्जेले ने स्वदेशी गुरूभाई से साधुवाद प्राप्त किया । उस समय लासलो के पास ‘स्कॉटहोम टाइम्स’के प्रतिनिधि बैठे थे, जो उनके साथ हंगरी गए । इस अखबार में छपे विवरण के अनुसार क्रासनाहोरकई फिर से फरिश्तों की दुनिया में पहुंचे हुए थे । फरिश्तों से नोबेल एकेडमी के संस्थापक आल्फ्रेड नोबेल की मानसिक अवस्था का लेखाजोखा ले रहे थे और आत्माओं को जोड़ने की बात कर रहे थे ।
डायनामाईट और डीटोनेटर जैसे डिवाइसों का आविष्कार करनेवाले महान वैज्ञानिक आल्फ्रेड नोबेल ने अवश्य ही विकास, प्रगति को ध्यान में रखकर यह खोज की होगी । लेकिन जब उन्होंने अपनी आंखों के सामने इन हथियारों का इस्तेमाल मानव द्वारा आपस में ही एक-दूसरे का अस्तित्व मिटाने और धरती को खून से लथपथ करने के लिए होते देखा तो उन्होंने अंदर से बेहद कचोट महसूस किया । मन के संताप को राहत देने के लिए आल्फ्रेड नोबेल ने अपनी जमा पूंजी लगाकर एकेडमी स्थापित किया, जो नोबेल एकेडमी के नाम से जाना जाता है । उन्होंने एकेडमी का संकल्प रखा कि देश, समाज के हर क्षेत्र में मानवता के कल्याण में विशिष्ट योगदान देनेवाले व्यक्तियों को हर साल पुरस्कृत किया जाय ।
लासलो के अनुसार आल्फ्रेड नोबेल की आत्मा को सुकून मिला मगर फरिश्तों का कहना है कि भटक रही है । आल्फ्रेड की संतति उनकी भावना का गला घोंटने पर तुली हैं ।
1901 में साहित्य के पहले नोबेल पुरस्कार विजेता फ्रांस के सल्ली प्रोधोम ने अपनी रचनाओं में संस्थापक के मनोभावों का खाका खींचा है । सल्ली प्रोधोम की अवसाद कविताओं के तथ्य लासलो से मेल खाते हैं ।
लासलो ने फरिश्तों से कहा - ‘अब आसमान में उड़ने का नहीं, धरती पर उतरने का वक्त आ गया है । सैकड़ों, हजारों साल बाद ही सही, परंपरा के अनुसार सृष्टि का क्रम तो बदले ।’
ऐसी चर्चा के बीच एक महान शायर की शाश्वत पंक्ति मुझे याद आ रही है, जो भारतीय जनमानस में हर क्षण तैरती रहती है -
हजारों साल नर्गिस अपनी बेनुरी पे रोती है
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा ।
4।, ब्लॉक जस्मिन, आरागेट के निकट]
Wमइेपजम – ूू.ेकाींद.पद Archive quality note: This text is readable and verified for publication, but minor Unicode or source-quality imperfections may remain.
विषय
Intenational Relations Nobel Prize
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