२०२४ के नोबेल साहित्य पुरस्कार विजेता पर विशेष आलेख

शरीर और आत्मा का तारतम जोड़ती हैं हान कांग

- शशिधर खान

	





दक्षिण कोरिया की बहुचर्चित लेखिका हान कांग को पुरस्कृत कर नोबेल अकादमी ने राजनीतिक और पुरस्कार चयन में लैंगिक असमानता के आरोपों से घिरे विवादों को विराम देने का प्रयास किया है । 53-वर्षीय हान कांग को इस वर्ष का नोबेल पुरस्कार मिलना एसिया के लिए ही नहीं, संपूर्ण विश्व और मानवता के लिए भी गौरव की बात हे । नोबेल अकादमी ने वर्षों बाद एक ऐसी कलम की जादूगर को इस वर्ष सम्मान के लिए चुना, जिनके चयन से पहले और पुरस्कार की घोषणा के बाद भी कहीं से भी किसी तरह के विवाद की बात सुनने, देखने को नहीं मिली । उतना ही नहीं, हान कांग उन कतिपय भाग्यशाली रचनाकारों में शुमार हो गयीं, जिनके नाम की पहले से यूरोपीय देशों को भी भनक नहीं थी । 

प्रायः ऐसा होता आया है, जब नोबेल साहित्य पुरस्कार के लिए संभावित नाम की अटकलबाजियां चयन के पहले से ही सुर्खियों में रहती हैं । इसका कारण रचनाकार के व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों का विवादित होना है । उसमें भी ऐसे विवाद खड़ा करनेवाले साहित्यकारों को यूरोप की इस प्रतिष्ठित संस्था पुरस्कार के लिए चुनती है, जिनके लेखन से किसी-न-किसी रूप में युरोपीय देशों की राजनीतिक हित से जुड़ी संस्कृति प्रभावित होती हो । 

नोबेल शांति पुरस्कार के चयन में भी यूरोपीय देशों की सामान्यतया अपने मतलब की राजनीति काम करती है । इसीलिए साहित्य के साथ-साथ नोबेल शांति पुरस्कार भी विवादों में रहा  है । लेकिन साहित्य का नोबेल पुरस्कार ज्यादा समय तक विवादों में रहता है । क्योंकि नोबेल पुरस्कार मिल जाने के बाद तो लेखक रातोंरात पूरे विश्व में चर्चित हो जाता है और सामाजिक जीवन को रूक-रूक कर बारिश की तरह भिंगोता रहता है । इसलिए विवादों का कारण इस बात के लिए नोबेल अकादमी की आलोचना भी है कि चयनकर्ताओं का फोकस यूरोप और उत्तर अमेरिकी लेखकों पर ज्यादा रहता है । इसके साथ-साथ चयन में पुरूष रचनाकारों को प्रधानता दी जाती है । नोबेल पुरस्कार श्रृ्sखला शुरू होने के समय 1901 से लेकर अभी तक के चयन का इतिहास इन दोनों विवादों से पटा है । २०२४ तक 119 नोबेल साहित्य विजेताओं में अंगुली से गिनने पर सिर्फ 17 महिलाएं  हैं । 

हान कांग से पहले २०२२ में फ्रांस की एन्नी एर्नोक्स को मिला था । हान कांग को नोबेल साहित्य पुरस्कार मिलने से नोबेल अकादमी ने पहले के विवादों को तोड़ा है और अपनी छवि बेहतर बनाने के मद्देनजर सार्थक पहल की है । हान कांग नोबेल पुरस्कार पानेवाली पहली एसियाई महिला हैं और अपने देश की पहली लेखिका हैं । 

इस वर्ष वाकई नोबेल अकादमी ने साहित्य पुरस्कार के लिए ऐसी संवेदनशील लेखिका को चुना है, जिन्होंने मानव जीवन की पारिवारिक, सामाजिक विसंगतियों और विषम परिस्थितियों की पीड़ा को जीया है । हान कांग ने काव्यात्मक शैली में शारीरिक और मानसिक यंत्रणा से विदीर्ण तिल-तिल तड़पती आत्मा की आवाज लयबद्ध वाक्यों में ऐसे व्यक्त किया है कि पाठक डूबता-इतराता साधना में लीन हो जाता है । लेखिका की भावनाओं का मर्म समझने के बाद पढ़नेवाले को लगता है, मानो उसकी अपनी ही आत्मा की आवाज हो । दर्द से मन और शरीर पर पड़नेवाले दुष्प्रभावों की गहराई हान कांग के गद्य में झलकती है । 

नोबेल अकादमी के चेयरमैन एंडर्स ओल्सोन ने हान कांग की प्रशंसा में पुरस्कार की घोषणा के समय कहा - ‘शरीर और आत्मा, जीवित या मृत के बीच तारतम्य स्थापित करने की अद्भूत क्षमता तथा अवचेतना हान कांग ने पायी है । इनका लेखन मुख्य रूप से पीड़ित प्रताड़ित घर से बाहर तक महिलाओं की पीड़ा पर केंद्रित है । मगर उन्होंने युद्ध, तनाव और अनहोनी की आशंकाओं में घुटती तड़पती मानवता की जीती-जागती तस्वीर भी उतारी है ।’


उस समय हान कांग की दोनों ही पुरस्कृत पुस्तकों की दुनिया भर में चर्चा हो रही थी । नोबेल पुरस्कृत दोनों ही किताबों - ‘दि वेजिटेरियन’और ‘ह्यूमेन एक्ट्स’(मानव कार्यकलाप) का अंग्रेजी तथा अन्य विदेशी भाषाओं में 1998 में अनुवाद छपने के बाद से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचकों और समीक्षकों के बीच हान कांग छायी हुई थी । दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति किम दाए-जंग ने हान कांग को अपने आवास पर समारोह आयोजित करके उनका सम्मान किया था । 

नोबेल साहित्य कमिटी की सदस्य अन्ना-कटींन पाम स्वयं भी आलोचक हैं । उन्होंने अपनी टिप्पणी में कहा - ‘हान कांग ने दर्द, मौत का साया और क्षति को लेखन का विषय बनाया है - वो चाहे व्यक्तिगत हो या सामूहिक । मर्म को छूनेवाली मानवीय संवेदनाओं को हान कांग ने बिना लागपलेट के और किसी भी भावना को चोटिल किए बगैर कोमल पंक्तियों में व्यक्त किया है ।’ 

युद्ध की विभीषिका झेलते अपने देश की दुर्दशा से मर्माहत हान कांग को युद्ध से हुई जान-माल की क्षति के साथ-साथ सामाजिक और आपसी रिश्ते के नुकसान से चोट पहुंचा है । कोरियाई प्रायद्वीप की भौगोलिक स्थिति और साम्राज्यवादी महाशक्तियों के रसूख की लड़ाई में पिसते दोनों कोरिया को अपने लपेटे में लिए राजनीतिक घटनाक्रम का भी प्रतिकूल सिलसिला रहा है । 1945 में दूसरे विश्वयुद्ध की समाप्ति हुई, मगर वास्तव में युद्ध खतम नहीं हुआ । अमेरिका, इंगलैंड एक तरफ और दूसरी तरफ ताकतवर बनकर उभरे सोवियत संघ के बीच घात-प्रतिघात चलता रहा । इसे शीतयुद्ध के नाम से जाना जाता है । शीतयुद्ध का खामियाजा सही माएने में अगर किसी देश ने भुगता है तो वो है, कोरिया । जून, 1950 में सोवियत खेमे के उत्तर कोरिया का दक्षिण कोरिया पर आक्रमण के बाद अमेरिका का दक्षिण कोरिया पर जवाबी कार्रवाई का कहर आज तक कोरिया की आत्मा को जला रहा है । जुलाई, 1953 में एक-दूसरे के खिलाफ आक्रमण रूका, मगर आज तक युद्धविराम समझौता नहीं हो पाया है । 1989-90 में सोवियत संघ के बिखराव के बाद समाप्त शीतयुद्ध काल का सबसे लम्बा और बिध्वंसकारी कोरिया का 3 साल का युद्ध है । कोरिया की सीमा जापान और चीन दोनों से सटी है । दोनों ही देश अपने-अपने स्वार्थ से कोरिया प्रायद्वीप की हवा में लाशों की सड़ांध फैलाने की साजिश में जुटे रहते हैं । अभी भी उत्तर कोरिया का रूख ज्यादा आक्रामक है । 

हान कांग ने दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल से छपनेवाले अखबार ‘न्यूज़ क्रोनिकल’में हाल में छपे लेख में इस घटनाक्रम के आलोक में अपनी व्यथा लिखी है, जो उनके देश की व्यथा है । लिखते-लिखते कहीं-कहीं हान कांग के शब्दों से उनके आध्यात्मिक होने का पुट मिलता है, लेकिन अगले पैरे में तुरंत संभल जाती हैं । इससे लगता है कि हान कांग नहीं चाहती कि उन्हें आध्यामिक समझा जाए और आत्मा के शाश्वत अमर होने जैसी कोई बात उनकी सोच से मिले । 

हान कांग को अपने देश की संस्कृति, सभ्यता पर नाज है । संयोग से उन्हें ऐेसे समय में नोबेल पुरस्कार मिला है, जब कोरियाई संस्कृति की ओर पूरे विश्व का ध्यान आकर्षित हुआ है । 

हान कांग मूलतः कवि हैं, इसका परिचय 1993 में दिया । 1995 में उनका पहला कथा संकलन और पहला उपन्यास ‘ब्लैक डियर’छपा । उसमें एक जगह हान कांग ने पद्यात्मक लहजे में अपना गद्दांश यों व्यक्त किया है – 

आत्मा नहीं छोड़ती मृतक का साथ

भटकती भी नहीं, चिपकी रहती है निर्जीव देह से

क्षत-विक्षत मांस के लोथड़े में सनी

ग्रास बनती है गिद्धों, चीलों की

लपलपाती चोंच में कराहती मानवता

मरने-मारने पर तुले जिंदा इन्सान के खून की प्यासी



हान कांग की सर्वाधिक प्रसिद्ध और लोकप्रिय जिस किताब ‘ह्युमेन एक्ट्स’को नोबेल अकादमी ने पुरस्कार के लिए पहले चुना, वो मानव की ऐसी ही मानसिकता वाले कार्यकताओं पर केंद्रित है । हांग के अनुसार युद्ध की यही अंतिम परिणति है, जिसका इतिहास साक्षी है और युद्ध का अंत नहीं हो रहा । नया अध्याय जुड़ता जा रहा है । इसकी पृष्ठभूमि कोरियाई युद्ध है । 


जन्म और मृत्यु को एक साथ अपने घर में देखने का हान कांग के मन पर गहरा असर  पड़ा । हान कांग ने अपनी बड़ी बहन को जन्म लेते ही करते देखा । इस सच नकारने या स्वीकारने का ऊहापोह हान कांग के हृदय को लगातार आघात पहुंचाता रहा । उस ऊहापोह पर केंद्रित हान कांग के काव्यात्मक उपन्यास ‘दि ह्वाईट बुक’पर उन्हें २०१८ में दोबारा अंतरराष्ट्रीय बूकर पुरस्कार प्रदान किया गया । 

हान कांग के पारिवारिक सूत्रों के अनुसार अपनी बहन को मां की कोख से निकलते ही मृत्यु पर तीन दिनों तक घर में खाना नहीं बना । हान कांग ने बाहर का भी कुछ नहीं खाया । 

इस संबंध में एक प्रसंग मुझे याद आता है । कुछ वर्ष पहले दक्षिण कोरिया के राजनयिक वान की-मून संयुक्त राष्ट्र महासचिव थे । संयुक्त राष्ट्र संघ प्रमुख बनने के बाद वान की-मून सबसे पहले भारत आए । संवाददाताओं से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा - मैं भारत में पढ़ा हूँ, रहा हूँ । मेरी आत्मा भारत में बसती है । दक्षिण कोरिया और भारत की संस्कृति, रीति-रिवाज तथा सामाजिक रहन-सहन एक-दूसरे से काफी मेल खाते हैं । 

‘sस्टाकहोम टाइम्स’के अनुसार वान की-मून हान कांग के प्रशंसकों में से थे और संयुक्त राष्ट्र महासचिव बनने के बाद उन्होंने हान कांग के घर जाकर उनका आतिथ्य ग्रहण किया था ।  

एक लेखक पर लिखने के समय क्या गुजरता है, वो हान कांग के शब्दों में - ‘उपन्यास लिखना मेरे लिए खुद से सवाल उठाना है । मैं लिखने के दौरान अपने सवालों को पूरा करने में जुटी रहती हॅूं । मेरी कोशिश रहती है सवालों में ठहरने की, जो कभी पीड़ादायक तो कभी मांगनेवाले होते  हैं ।’2016 में ‘दि वेजिटेरियन’पर बूकर पुरस्कार मिलने के बाद पूछे गए सवालों के जवाब में हान कांग ने यह बात कही । नोबेल पुरस्कार दूसरी पुस्तक ‘ह्युमेन एक्ट्स’में हान कांग ने अपने देश की सैनिक तानाशाही द्वारा लोकतंत्र की मांग को लेकर छात्रों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन को निर्ममतापूर्वक कुचले जाने का आंखोदेखा विवरण प्रस्तुत किया है । 1970 में ग्वांग्जू में जन्मी हान कांग उस समय 10 साल की थी । 

किशोरी हान कांग ने 1980 में भड़के उस आंदोलन के दौरान अपने शहर ग्वांग्जू में छात्रों की लाशों पर से सैनिकों की गाड़ियां गुजरती देखी । 

हान कांग को लेखन और युद्ध दोनों ही विरासत में मिला है । उनके पिता और दोनों भाई लेखक हैं । हान कांग विएतनाम युद्ध में सैनिक अधिकारी रह चुके हैं । बचपन से ही युद्ध साजिश और अपने देश में भी तानाशाही की दमन नीति देखते-देखते हान कांग का पूरा लेखकीय जीवन ही आहत पर केंद्रित हो गया । 

अंग्रेजी में अगले वर्ष छपनेवाली नयी पुस्तक ‘वी डू नोट पार्ट’में हान कांग ने कोरिया के 20वीं सदी के रक्तरंजित राजनीतिक उथल-पुथल से भरे इतिहास को 1950 से शुरू करके 1980 तक के घटनाक्रम से जोड़ा है । 

इस वर्ष के नोबेल शांति साहित्य पुरस्कार की मिलती-जुलती स्थितियां भी युद्ध इतिहास याद दिलाती हैं । जापान के हिरोशिमा और नाकासाकी पर दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिका के नेतृत्व में युरोपीय देशों द्वारा गिराया गया परमाणु बम दुनिया के सबसे नृशंस और अमानवीय क्त्यों का नया इतिहास बनाता है । उस हत्याकांड में जीवित बचे लोगों के परिवारजनों का जापानी संगठन ‘निहो हिंदाक्यो’को २०२४ का नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया है । 1950-53 के दौरान अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र की आड़ लेकर उत्तर कोरिया पर बम वर्षा की । कोरियाई युद्ध के विनाश को अपना लेख समर्पित करनेवाली हान कांग को नोबेल साहित्य पुरस्कार दिया गया । इस सकारात्मक सोच को अंतरराष्ट्रीय शांति और सद्भाव की दिशा में अनुकूल रवैया माना जा सकता है ।