तूल पकड़ता जा रहा है कुलपति नियुक्ति विवाद

                                                                                                 - शशिधर खान

	



तटीय राज्य केरल में कुलपतियों की नियुक्ति को लेकर राज्यपाल आरिफ मुहम्मद खान और मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन के बीच मतभेद पूरे उफान पर है । ठनने की नौबत उस समय आ गयी, जब राज्यपाल के केरल के 11 विश्वविद्यालयों के कुलपतियों से इस्तीफा देने कहा और उनके इन्कार करने पर कुलाधिपाति (चांसलर) की हैसियत से सभी कुलपतियों को ‘कारण बताओ’नोटिस जारी किया । राज्यपाल ने इसी हफ्ते पहले ९ कुलपतियों (वीसी) को नोटिस भेजकर उनसे 3 नवंबर तक जवाब मांगा है । उसके बाद 2 और कुलपतियों को राजभवन से नोटिस भेजा गया है, जिन्हें ४ नवंबर तक जवाब देना है । 



राज्यपाल को सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से बल मिला और उसके तुरंत बाद उन्होंने यह कार्रवाई की । एपीजे अब्दुल कलाम टेक्नोलोजिकल यूनिवर्सिटी तिरूवनंतपुरम के वीसी पद पर राजश्री एम एस की नियुक्ति को सुप्रीम कोर्ट ने २१ अक्टूबर को यह कहकर ‘अवैध’घोषित कर दिया कि इसमें यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) के मानदंडों का पालन नहीं किया गया । सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार राजश्री की नियुक्ति की सिफारिश करनेवाली खोज कमिटी नियमपूर्वक कायदे से गठित नहीं की गयी । उसके दो दिन बाद ही राज्यपाल ने ९ कुलपतियों से इस्तीफा के लिए भेजे गए पत्र में कहा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला अन्य विश्वविद्यालयों पर भी लागू होता है । खान के पत्र के अनुसार इस ९ में से अधिकांश मामलों में मुख्य सचिव (गैर-शिक्षाशास्त्री) खोज कमिटी के सदस्य हैं, जो नियम के खिलाफ है । यूजीसी मानदंड के अनुसार खोज/चयन समिति में तीन सदस्य होते हैं । एक राज्यपाल द्वारा मनोनीत किए जाते हैं, दूसरे यूजीसी के प्रतिनिधि होते हैं और तीसरे सदस्य उसी विश्वविद्यालय के सीनेट के सदस्य होते हैं । 

मुख्यमंत्री और राज्यपाल के बीच विश्वविद्यालय नियुक्ति विवाद २०२२ में पूरे साल चला है और वर्ष समाप्त होते-होते नए सिरे से उसमें उफान आ गया । मतभेद दरअसल मुख्यमंत्री के निजी सचिव के॰ के॰ रागेश की पत्नी प्रिया वार्गीज की कन्नूर यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर बनाने को लेकर बढ़ा । राज्यपाल ने उस नियुक्ति पर अगस्त में रोक लगा दी । राज्यपाल ने कहा कि प्रिया वार्गीज की नियुक्ति ‘भाई-भतीजावाद और पक्षपातपूर्ण’रवैए का मामला है । उसके बावजूद कन्नूर यूनिवर्सिटील के कुलपति गोपीनाथ रवीन्द्रन उस नियुक्ति को उचित ठहराते रहे । 


उसके पहले केरल सरकार ने अध्यादेश लाकर कुलपति नियुक्ति में राज्यपाल के पावर कम करने के असफल प्रयास किए । 8 अगस्त को लैप्स (स्वतः समाप्त) होनेवाले 11 अध्यादेशों में वो भी शामिल था । राज्य सरकार जनवरी, २०२२ में राज्यपाल से उन अध्यादेशों को दोबारा जारी करवाना चाहती थी । जबकि राज्यपाल ने दिसंबर में ही राज्य सरकार को लिखे गए कड़े पत्र में कहा कि मुख्यमंत्री विश्वविद्यालय कानूनों में संशोधन करके खुद को चांसलर नियुक्त करना चाहते हैं । 


कुलपति नियुक्ति से उठा मतभेद राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच शासकीय मामलों में भी पसर गया है । संवैधानिक प्रमुख के रूप में राज्यपाल और निर्वाचित सरकार में टकराव बढ़ता जा रहा है । राज्यपाल ने मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन को अपने वित्त मंत्री के॰ एन॰ बालगोपाल के खिलाफ ‘संवैधानिक रूप से उचित’एक्शन लेने कहा, लेकिन मुख्यमंत्री ने इन्कार कर दिया । राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को इस आधार पर एक्शन लेने कहा कि ‘वित्तमंत्री के॰ एन॰ बालगोपाल मेरी अप्रसन्नता से पद पर हैं, क्योंकि मैंने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलायी है ।’मुख्यमंत्री ने तुरंत यह कहकर राज्यपाल की मांग खारिज कर दी कि वित्तमंत्री के प्रति मेरा ‘विश्वास और भरोसा लगातार कायम है ।’ 

इसी से मिलता-जुलता कुलपति नियुक्ति विवाद पंजाब के आम आदमी पार्टी मुख्यमंत्री भगवंत मान और राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित के बीच तूल पकड़ा हुआ है । दोनों ने ही कुलपति निुयक्ति मामले में एक-दूसरे के पावर को चुनौती दे रखी है । सुप्रीम कोर्ट के केरल यूनिवर्सिटी कुलपति के संबंध में दिए फैसले का हवाला देते हुए २१ अक्टूबर को ही पंजाब के राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को कहा कि ‘मैं राज्य के संवैधानिक प्रमुख के रूप में वे बिना पूर्वाग्रह के अपना कर्त्तव्यपालन करता रहुंगा ।’ राजभवन में प्रेस कान्फ्रेंस बुलाकर राज्यपाल ने सुप्रीम कोर्ट का हवाला देकर मुख्यमंत्री को लिखे गए अपने उस पत्र को उचित ठहराया, जिसमें पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) के कुलपति के रूप में डा॰ सतवीर सिंह गोसाल की नियुक्ति वापस लेने कहा गया । पुरोहित ने पंजाब सरकार को बताया कि राज्यपाल के साथ-साथ विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति के रूप में भी उनकी भूमिका और दायित्व है । राज्यपाल ने कहा कि ‘सरकार मेरे महकमे में हस्तक्षेप कर रही है, मुख्यमंत्री को भूलना नहीं चाहिए कि उन्हें पद की शपथ मैंने ही दिलायी है ।’

उसके एक दिन पहले २० अक्टूबर को पंजाब के मुख्यमंत्री ने राज्यपाल को पत्र लिखकर कहा कि ‘वे सरकार के काम में दखलंदाजी कर रहे हैं और इस आरोप को खारिज कर दिया कि पीएयू कुलपति के रूप में गोसाल की नियुक्ति विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के मानदंडों की अवहेलना करके चासंलर की मंजूरी के बगैर की गयी है । 

भगवंत मान ने यह भी लिखा - ‘सतवीर सिंह गोसाल सम्मानित पंजाबी सिख हैं और उनकी नियुक्ति करने के आपके आदेश से पंजाबियों में काफी रोष है ।’

उसका जवाब राज्यपाल ने २१ अक्टूबर को राजभवन में संवाददाताओं के माध्यम से दिया कि ‘इसे सांप्रदायिक रंग देने की जरूरत नहीं है ।’

उसके पहले 11 अक्टूबर को पंजाब के राज्यपाल ने प्रसिद्ध हृदय रोग विशेषज्ञ डा॰ गुरप्रीत सिंह वान्देर की बाबा फरीद स्वास्थ्य सेवा विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में नियुक्ति को क्लियर करने से इन्कार कर दिया । 


पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस सरकार और पूर्व राज्यपाल जगदीप धनखड़ के समय से चल रहे कुलपति नियुक्ति विवाद का पटाक्षेप 11 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने कर दिया । मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सोनाली चक्रवर्ती बनर्जी को कलकत्ता यूनिवर्सिटी की कुलपति दोबारा बना दिया, जबकि राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने उसे मंजूरी नहीं दी थी । उपराष्ट्रपति बनने से पहले जगदीप धनखड़ तीन साल पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रहे और वहां भी कुलपति नियुक्ति से लेकर हिंसा, कानून व्यवस्था जैसे मुद्दे पर राज्य सरकार-राज भवन में मतभेद चलता रहा । 

सोनाली चक्रवर्ती बनर्जी पूर्व मुख्य सचिव अलपन बंद्योपाध्याय की पत्नी हैं । रिटायर होने के बाद अलपन सलाहकार बन गए । सोनाली चक्रवर्ती बनर्जी को पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्यपाल की असहमति के बावजूद अगस्त, २०२१ में दोबारा कलकत्ता यूनिवर्सिटी की कुलपति नियुक्त कर दिया । सोनाली बनर्जी का पहला चार साल का कार्यकाल 27 अगस्त, २०२१ को समाप्त हुआ और राज्य सरकार ने उन्हें फिर से चार साल के लिए कुलपति नियुक्त कर दिया । 

कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस प्रकाश श्रीवास्वत की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने 13 सितंबर, २०२२ को अपने आदेश में उस नियुक्ति को खारिज करते हुए कहा कि कलकत्ता यूनिवर्सिटी एक्ट के अंतर्गत राज्य सरकार को कुलपति नियुक्ति या दोबारा नियुक्ति का पावर नहीं है और बिल्कुल स्पष्ट तौर पर यह राज्यपाल का अधिकार क्षेत्र है । कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले को पश्चिम बंगाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी । सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस डी॰ वाई॰ चन्द्रचूड़ और जस्टिस हिमा कोहली की पीठ ने 11 अक्टूबर को कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए तृणमूल कांग्रेस सरकार की अपील खारिज कर दी ।