सीएए का पड़ेगा असर वोट राजनीति पर

 - शशिधर खान

	



लोकसभा चुनाव कार्यक्रम ऐलान से पहले केंद्र की भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ सरकार ने सीएए लागू करने की अधिसूचना जारी कर दी । इसके साथ ही नागरिकता संशोधन एक्ट (सीएए), २०१९ को चुनावी मुद्दा बनाने की भाजपा की योजना पर कानूनी मुहर लग गयी । केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह समेत केंद्रीय गृह मंत्रालय और अन्य केंद्रीय मंत्री पहले से ही सीएए को अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के बाद दूसरा वोट मुद्दा बनाने का वायदा कर रहे थे । इसमें निशाने पर मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस सरकार है, जहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मजबूती भाजपा को खटक रही है । पश्चिम बंगाल में बांग्लादेश से आए अल्पसंख्यकों की आबादी असम के बाद दूसरे नंबर पर है । असम में तो भाजपा को वोट ध्रुवीकरण का सियासी लाभ मिला है और दूसरी बार भाजपा सत्ता में आयी है । लेकिन पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी (दीदी) को अपदस्थ करने में भाजपा को सफलता नहीं मिल रहा है । इस लोकसभा चुनाव में दीदी को ज्यादा शिकस्त देने के लिए भाजपा ने पश्चिम बंगाल से ही यह जुमला खेला, ताकि बांग्लादेश से आकर बसे हिन्दू अल्पसंख्यकों को नागरिकता देकर उन्हें अपना वोटर बनाया जाए । 



राजनीतिक विवाद सीएए नियम की अधिसूचना जारी होने के समय को लेकर खड़ा हुआ है । भाजपा ने योजनाबद्ध तरीके से यह कदम उठाया है ताकि इसका चुनावी लाभ उठाया जा सके । वास्तव में नागरिकता संशोधन एक्ट (सीएए) २०१९ बनने के समय से ही विवादित है और इसको लेकर देश में दंगा, हिंसा भड़क चुका  है । मुख्य रूप से असम, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में २०२० में हिंसा भड़की । हिंसा को लेकर सबसे ज्यादा तूफान दिल्ली में मचा, जहां के शाहीन बाग में 100 दिनों तक धरना, प्रदर्शन चला । 50 से ज्यादा लोग मारे गए । 

दिसंबर, २०१९ में संसद में सीएए पेश हुआ और जनवरी, २०२० में लागू होते ही इसके विवादित प्रावधानों को लेकर बवाल मच गया । उसका चुनावी लाभ भाजपा को उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और असम में मिला । आम आदमी पार्टी को दिल्ली में मिला । जबकि २०२० में विवादित प्रावधानों के अनुसार नागरिकता प्रदान करने के नियम नहीं बने थे । सीएए के तहत मात्र तीन पड़ोसी देशों से धार्मिक प्रताड़ना के शिकार होकर      31-12-2014 तक भारत आए गैर-मुस्लिम समुदायों को नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान किया गया है । इस्लामी देश पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान से भारत आए हिंदू, सिख, इसाई, बौद्ध, जैन, पारसी समुदायों को नागरिक बनाने का प्रावधान किया गया । पड़ोसी बौद्ध देश म्यांमार, श्रीलंका से आए किसी भी समुदाय के लिए सीएए में प्रावधान नहीं था । सीएए के अंतर्गत नागरिकता प्रदान करने के नियम बनाने का काम केंद्र सरकार टालती रही । चार वर्षों बाद आम चुनाव के समय अधिसूचना जारी करने का मकसद स्पष्ट है कि भाजपा को अब विवाद के आलोक में मजहबी आधार पर वोटों का सामाजिक विभाजन देखना है । दिसंबर, २०१९ में ही केरल के बाद पंजाब, राजस्थान और पश्चिम बंगाल विधान सभाओं से सीएए के विरोध में प्रस्ताव पारित हो चुका है । इसमें सिर्फ राजस्थान में सरकार बदली है और भाजपा सत्ता में लौटी है । दिल्ली के आम आदमी पार्टी मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने वही कहा जो भाजपा देखना चाहती है । मतदाता चुनाव में जवाब देंगे । अमित शाह ने सीएए अधिसूचना जारी होने के बाद 11 मार्च को कहा कि सरकार ने अपनी प्रतिबद्धता पूरी की, लेकिन अंदेशा है कि इससे अशांति फैलेगी और शांतिपूर्ण मतदान में बाधा आएगी । भाजपा शासित असम में अतिरिक्त पुलिसकर्मियों की तैनाती तुरंत हो गयी । बांग्लादेश से आए अवैध प्रवासियों को लेकर 1979 में छात्र आंदोलन असम में ही शुरू हुआ था । ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन ने कह दिया कि वह कानूनी लड़ाई लड़ेगा । 1955 में बने नागरिकता कानून में यह छठा संशोधन है और सुप्रीम कोर्ट की सीधी मानीटरिंग के बावजूद असम का यह विवाद नहीं सुलक्षा है । सीएए, २०१९ की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठानेवाली कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर की गयीं । सीएए लागू होने के बाद उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार के तोड़फोड़ में उचित रूप से शामिल मुसलमानों के प्रति सख्त रवैए का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में गया और शीर्ष कोर्ट से उन्हें राहत मिली । दिल्ली में जामिया मिलिया इस्लामिया छात्रों पर पुलिस कार्रवाई में फंसे छात्र अभी तक छुटकारा पाने के लिए अदालतों में दौड़ रहे   हैं । 

इन विवादों के कारण केंद्र सरकार को सीएए नियम अधिसूचित करने में चार साल से ज्यादा लग गए । इस पर विवाद कर रही संसदीय समिति से केंद्र ने ९ बार बिस्तार मांगा । संवैधानिक प्रावधान के अनुसार सीएए लागू होने के ६ महीने के अंदर केंद्र को नियम बनाने हैं । ऐसा नहीं कर पाने पर अवधि का विस्तार मांगना होता है, जो एक बार में ६ महीने से ज्यादा का नहीं मिलता । 

सीएए में प्रावधान तो अन्य अल्पसंख्यक समुदायों का भी है । मगर यह मामला हिंदू-मुस्लिम तनाव का ही बना । दंगे, हिंसा में भी यही दोनों समुदाय आमने-सामने थे । कांग्रेस समेत सभी गैर-भाजपा दल इसे भाजपा का विभाजनकारी और मतों का ध्रुवीकरण रवैया बता रहे हैं । पूर्वोत्तर में भाजपा सरकार परचम पर केंद्र की नजर  है । इसलिए असम, मेघालय और त्रिपुरा के आदिवासी इलाकों तथा अरूणाचल प्रदेश, मिजोरम, नगालैंड में आईएलपी (इनर लाईन परमिट) के अंतर्गत वाले क्षेत्रों को सीएए नियम से बाहर रखा गया है । नागरिकता आवेदन करनेवालों को पहले की तरह 11 साल के बजाए ६ साल प्रवास का प्रमाण देना होगा । 






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