नागरिक संशोधन एक्ट लागू होने पर अनिश्चय / विवाद

                                                                                                 - शशिधर खान

	



विवादास्पद नागरिक संशोधन एक्ट (सीएए), २०१९ पास हुए तीन साल गुजर जाने के बावजूद विधिवत् लागू नहीं हो पा रही है । क्योंकि केंद्र सरकार अभी तक इसके लिए नियम नहीं बना पायी है । केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सीएए, २०१९ लागू होने के नियम तय करने के लिए फिर से ६ महीने का अतिरिक्त समय मांगा है । पास होने के बाद से ही विवाद के घेरे में चल रहे सीएए संसदीय समिति के पास विचाराधीन है । संसदीय समिति के बार-बार रिमाइंडर देने के बावजूद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने नागरिकता संशोधन कानून लागू करने के नियम बनाने के लिए निर्धारित अवधि में 30 जून तक की बढ़ोतरी मांगी है । ऐसा सातवीं बार हुआ है, जब गृह मंत्रालय के संसदीय समिति से ६ महीने बढ़ोतरी का आग्रह किया है । 

लेकिन कोई भी केंद्रीय मंत्री जब भी कोई अवसर मिलता है, यह कहने से नहीं चूकते कि नागरिकता संशोधन कानून लागू होकर रहेगा और जल्द लागू होगा । गैर-भाजपा शासित राज्यों में इस बात को ज्यादा दुहराया जाता है । सीएए, २०१९ पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश से भारत आए गैर-मुस्लिम समुदायों को बिना किसी कागजात के नागरिकता प्रदान करने के लिए पास कराया गया । इस एक्ट के अंतर्गत हिंदू, सिख, पारसी, इसाई, बौद्ध और जैन समुदायों के वैसे लोगों को भारतीय नागरिक बनाने का प्रावधान किया गया, जो 31-12-2014 से पहले पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से भारत आए । विवाद का कारण यह था कि वैसे लोगों में मुसलमान शामिल नहीं किए गए । इसके विरोध में पूरे देश में हिंसा भड़की । दंगा, आगजनी, तोड़फोड़ का सिलसिला २०२० पूरे वर्ष चला । विभिन्न राज्यों में चुनावी मुद्दा भी बना । धरना, प्रदर्शन का सबसे चर्चित केन्द्र राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली रहा । 

उसके बाद हुए दिल्ली विधान सभा चुनाव में भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच टकराव का मुख्य मुद्दा सीएए था, जिसमें आम आदमी पार्टी ने अपनी सत्ता बरकरार रखी । दिल्ली पुलिस से लेकर निचली अदालत, दिल्ली हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट तक में इससे संबंधित ‘देशद्रोह’मुकदमे चल रहे हैं । 

नागरिकता संशोधन कानून कब लागू होगा, लागू हो पाएगा या नहीं, इसके बारे में कुछ कहना मुश्किल है । लेकिन केंद्रीय मंत्री विरोधियों को निशाना बनाने के लिए जब सीएए पर बयानबाजी करते हैं और इससे कोई नया राजनीतिक मतभेद उभरता है, तब विवाद चर्चा में आता   है । केंद्रीय गृह मंत्रालय जब-जब ६ महीने की बढ़ोतरी चाहता है, तब खबर बनती है । यह सिलसिला जारी है । गृह मंत्रालय ने राज्य सभा कमिटी को कुछ हफ्ते पहले सूचित किया कि सीएए लागू करने के नियम बनाने के लिए 31-12-2022 तक के समय की जरूरत है । जबकि लोकसभा कमिटी से गृह मंत्रालय ने 09-01-2023 तक का समय मांगा । इस मामले पर संसद के दोनों सदनों की कमिटी अलग-अलग विचार कर रही है । प्राप्त रिपोर्ट के अनुसार फिर जनवरी, २३ में मंत्रालय ने लोकसभा और राज्यसभा दोनों से ६ महीने (30 जून तक) का समय मांगा । 

संसदीय कार्य मैनुअल कहता है कि अगर कोई मंत्रालय किसी पास एक्ट के लागू होने के नियम निर्धारित ६ महीने की अवधि के अंदर नहीं बना पता है तो संसदीय समिति से बढ़ोतरी का कारण बताकर समय मांगना चाहिए । यह पता नहीं चला है कि गृह मंत्रालय ने सात बार किन-किन कारणों से समय बढ़वाया है । 

गत वर्ष 24/11 को केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक न्यूज चैनल द्वारा आयोजित मीडिया कन्क्लेव में कहा कि सीएए लागू होने के नियम बनने के प्रोसेस में है और कोरोना के कारण इसमें देर हुई । उन्होंने जोर देकर कहा - ‘सीएए भारतीय जमीन का कानून है और लागू होगा । जो लोग इसके लागू न होने का स्वप्न देख रहे हैं, वे भ्रम में हैं’। 

सीएए सबसे ज्यादा पश्चिम बंगाल में विवादित है, जो अभी थमा नहीं है । अमित शाह ने २०२१ में पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव प्रचार के दौरान बार-बार कहा कि सीएए लागू करेंगे । पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस तीसरी बार सत्ता में आयी । मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (दीदी) पश्चिम बंगाल विधान सभा से सीएए के खिलाफ प्रस्ताव पारित करा चुकी हैं ।

नवंबर, २०२२ में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सीएए लागू करने की बात दिल्ली में कही और केंद्रीय गृह राज्य मंत्री निसिथ प्रमाणिक ने उसके बाद 28/11 को कोलकाता जाकर वही बात दुहराते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल में सीएए जल्द लागू किया जाएगा । कूच बेहार जिले में एक जनसभा में उन्होंने कहा - ‘पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से हिन्दुओं को भगाया गया   है । वैसे लोगों को नागरिकता देने के लिए सीएए लाया गया । यह कानून किसी की नागरिकता नहीं छीनेगा । सीएए शीघ्र ही पूरे देश में और पश्चिम बंगाल में भी लागू होगा’।

पश्चिम बंगाल विधान सभा में विपक्षी नेता (भाजपा) सुवेन्दु अधिकारी ने उसके पहले कहा कि सीएए राज्य में एक सचाई बन जाएगी । 

तृणमूल कांग्रेस के राज्य सचिव कुणाल घोष ने केंद्रीय मंत्री के भाषण पर प्रतिक्रिया दी - ‘जहां-जहां चुनाव होता है, भाजपा सीएए मुद्दा उठाती है । जब उन्हें लोगों को भ्रम में डालना होता है तो सीएए लागू करने का वायदा करते हैं’यह भाजपा की राजनीतिक चाल है’।

विदित हो कि यह विवाद सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं । 

ठीक उसी समय 30 नवंबर को तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी द्रमुक (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) ने इस विवाद में एक नया अध्याय जोड़ा । तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर करके कहा कि सीएए-2019 तमिल समुदाय के खिलाफ है, क्योंकि श्रीलंका से भारत आए तमिल शरणार्थियों को इसके दायरे से बाहर रखा गया है ।  

पार्टी के संगठन सचिव आर॰ एस॰ भारती के अनुसार - ‘ये तमिल हिंदू हैं और धार्मिक प्रताड़ना के शिकार होकर भारत आए हैं । दशकों से भारत में रह रहे ये तमिल नागरिकता न होने के कारण मौलिक अधिकार तथा अन्य अधिकारों से वंचित हैं । भारत सरकार ने तमिल शरणार्थियों के मामले में चुप्पी साध रखी है और यह उनके साथ सौतेला व्यवहार है । भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में किए गए अपने काउंटर-हलफनामा में तमिल शरणार्थियों का जिक्र नहीं किया है । सीएए में भी सिर्फ पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश से आए सारे गैर-मुस्लिम समुदायों को नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान किया गया है और श्रीलंका से आए हिंदू तमिल इसमें शामिल नहीं किए गए     हैं ।’

तमिलनाडु सरकार की ओर से सीएए लाने के मकसद और कारणों पर दिए गए सरकार के वक्तव्यों की तरफ सुप्रीम कोर्ट का ध्यान आकर्षित किया गया है । उसके अनुसार सिर्फ तीन देशों - पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश का नाम सीएए में देने के पीछे भारत सरकार की दलील है कि इन देशों का संविधान खास मजहब के हिसाब से बनाया गया है, जो उनका राजधर्म है और इसलिए धार्मिक अल्पसंख्यक धर्म के आधार पर प्रताड़ित किए गए । 

द्रमुक सरकार ने अपने हलफनामे में सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वैसी ही धार्मिक प्रताड़ना के शिकार श्रीलंकाई तमिल होते रहे हैं, क्योंकि बौद्ध धर्म श्रीलंका का राजधर्म है । 

बौद्ध मतावलंबी श्रीलंका के बहुसंख्यक सिंहलियों ने हमेशा से तमिल हिंदुओं को धर्म के आधार पर प्रताड़ित किया और तमिल भागकर भारत आए । भारत में भी वे वोट देने के अधिकार, सरकारी या निजी क्षेत्र में रोजगार के अवसर, संपत्ति के अधिकार समेत सारे नागरिक अधिकारों से वंचित है । इनका कोई देश नहीं है और इन तमिलों का भविष्य अधर में लटका है । 

द्रमुक के संगठन सचिव आर॰ एस॰ भारती की ओर से शीर्ष कोर्ट में दायर अतिरिक्त हलफनामा में कहा गया है कि सीएए में इन तमिलों को नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान न होने से ये भारत से निकाले जाने के भय में जी रहे  हैं । 

इसी महीने केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा संसद के दोनों समितियों से ६ महीना और समय बढ़ाए जाने की मांग की गयी । उसके बाद नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने कोलकाता में सीएए पर विस्तृत चर्चा की, जो भाजपा विरोधियों की सोच से मिलती है । 

एक समाचार एजेंसी से बातचीत में अमर्त्य सेन ने कहा कि सीएए से देश में अल्पसंख्यकों की भूमिका कम हो सकती है और बहुसंख्यक ताकतों को बढ़ावा मिल सकता है । नोबेल विजेता अर्थशास्त्री ने कहा - ‘सीएए लागू करने के विषय में जहां तक मैं समझता हूँ, भाजपा का मकसद प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अल्पसंख्यकों की भूमिका और उनका महत्व कम करना तथा हिंदू बहुसंख्यक ताकतों की भूमिका बढ़ाना है ।’ 

उन्होंने कहा - ‘भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष और विविधता वाले देश के लिए यह बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण है कि इसका इस्तेमाल अल्पसंख्यक घोषित करके विभिन्न समुदायों में भेदभाव पैदा करने के लिए किया जा रहा है, चाहे वो बांग्लादेश के हों या पश्चिम बंगाल के ।’

पश्चिम बंगाल में ज्यादा विवादित होने का एक प्रमुख कारण है यहां के (मटुआ  MATUA) समुदाय को सीएए में नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान किया जाना । मटुआ समुदाय अपना मूल बांग्लादेश को मानता है, जिन्होंने चुनाव में भाजपा को वोट दिया है । तृणमूल कांग्रेस सीएए का इसलिए भी विरोध कर रही है । 

उत्तर पूर्वी राज्यों के अधिकांश हिस्सों को सीएए के दायरे से अलग-अलग कारणों से बाहर रखा गया है । असम, मेघालय, मिजोरम या त्रिपुरा के आदिवासी इलाके संविधान की 6वीं अनुसूची में शामिल हैं । अरूणाचल प्रदेश, मिजोरम, नगालैंड और मणिपुर राज्य सीएए के दायरे से बाहर हैं ।