पुस्तक समीक्षा

पुस्तक का नाम - कुछ अनसुलझे राज

नेताजी सुभाषचन्द्र बोस पर गुंटर ग्रास

लेखक - शशिधर खान

प्रकाशक - शुभदा बुक्स,   B-140/5-2  शालीमार गार्डन एक्सटेंशन

                      साहिबाबाद - 201005, गाजियाबाद (यूपी)



शशिधर खान जाने-माने पत्रकार और लेखक हैं । देश-विदेश की राजनीतिक घटनाओं और सामाजिक विषयों पर उनके बेबाक विश्लेषण से हिन्दी अखबार कई वर्षों से भली भांति परिचित हैं । लगभग चार दशकों की सक्रिय पत्रकारिता करते हुए पुस्तक-लेखन की दुनिया में भी शशिधर खान ने सफलतापूर्वक पैर जमाया है । 

शशिधर खान की शुभदा बुक्स से प्रकाशित ताजा किताब विवादास्पद जर्मन लेखक गुंटर ग्रास के भारत खोज अनुभवों पर आधारित है । प्रायः विवादित अनसुलझे विषयों पर शोध और खोजी कलम चलानेवाले शशिधर खान ने नोबेल पुरस्कृत गुंटर ग्रास की भारत प्रवास के दौरान एकत्रित सामग्रियों पर ही पूरी पुस्तक को केंद्रित रखा है । 

गुंटर ग्रास का लेखन में उतरने से पहले और उसके बाद का कैरियर विवादास्पद होने के कारण चर्चा में रहा । नाजी जर्मनी के शासक हिटलर के खुफिया एजेंट रह चुके गुंटर ग्रास का नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का फैन होना और उन्हीं के बारे में सूचनाएं बटोरने कोलकाता आकर महीनों रहना अपने-आप में पाठकों की जिज्ञासा बढ़ाता है । क्योंकि पढ़ने-लिखने में रूचि रखनेवालों के बीच सुभाषचन्द्र बोस का दूसरे विश्वयुद्ध के समय भारत को इंगलैंड के कब्जे से मुक्त कराने के लिए हिटलर से सैनिक सहायता मांगने जर्मनी जाना और फिर युद्ध समाप्त होने के बाद नेताजी की कथित विमान हादसे में रहस्यमय मृत्यु दोनों ही विवादित है । 

गुंटर ग्रास चर्चा के क्रम में लेखक ने काफी समय तक शोध किया है और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन दूसरे विश्वयुद्ध के समय किस स्थिति में था, उसके सभी पहलुओं का तथ्यपरक विश्लेषण प्रस्तुत किया है । जैसा शशिधर खान बताते हैं कि गुंटर ग्रास बड़ी मुश्किल से मुंह खोलते थे, वैसे में उनके माध्यम से इतने सारे तथ्य जुटाना जुझारू पत्रकारिता का प्रमाण है । 

शशिधर खान ने गुंटर ग्रास की डायरी से जर्मन अखबार के जरिए से जो विवरण प्रस्तुत किया है, उससे दो बातें एक नजर में सामने आती हैं । 

गुंटर ग्रास भारतीय संस्कृति से प्रभावित होकर भले ही बार-बार भारत आकर यायावरी करते रहे हों, मगर उनका नजरिया वही था जो पश्चिम के लेखक भारत के बारे में प्रायः रखते आए हैं । गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर को अगर नोबेल साहित्य पुरस्कार नहीं मिला होता तो गुंटर ग्रास उनके फैन नहीं होते । 

गुंटर ग्रास की यह मानसिकता राजनीतिक के साथ-साथ साहित्यिक टिप्पणियों से भी झलकती है । वामपंथ के प्रति गुंटर ग्रास की सोच भारत पर भी हावी दक्षिणपंथी रूख और पश्चिमी यूरोप का प्रभाव दर्शाती है । 


काली मंदिर में देवी की लंबी लाल जीभ में गुंटर ग्रास को भारतीय परंपरा, संस्कृति की जगह विदेशी सोच दिखाई दी । कुल मिलाकर पुस्तक हर तबके के लिए पठनीय और पुस्तकालय के साथ-साथ घर में भी संग्रहणीय है ।