जब बाबा नागार्जुन देर रात कविता सुनाते थे
- शशिधर खान
बाबा नगार्जुन एकमात्र ऐसे जनकवि साहित्यकार हैं, जिनके नाम का उच्चारण करते ही साहित्य और पत्रकारिता में गहरी रूचि रखनेवाले व्यक्तियों की जुबान पर भी उनकी एकाध पक्तियां आ जाती हैं । सिर्फ हिन्दी में ही नहीं, बांग्ला, मैथिली, संस्कृत में भी बाबा नगार्जुन की काव्य पंक्तियां जनमानस में कबीर के दोहे, तुलसीकृत रामचरित्र मानस की चौपाइयां और उर्दू शायरी की तरह छायी रहती हैं । ऐसी अतुलनीय प्रभावशाली लोकप्रियता के शिखर स्तंभ पर विराजमान शलाका पुरूष हैं, बाबा नगार्जुन । उन्हें आधुनिक कबीर कहा ही जाता है । बाबा का व्यक्तित्व और कृतित्व यथार्थ में लोकचरित मानस पर केन्द्रित है ।
घुमन्तू बाबा नागार्जुन कहीं रवाना होने से पहले यह सोच-विचार नहीं करते थे कि कहां जाएं, किसके यहां ठहरें किसके घर 10-15 दिन या महीना दिन गुजारें । बस एक छोटा बक्सा, जिसके आधे में किताबें, पत्रिकाएं रहती थीं और एक छोटा रेडियो उठाया, बैठ गए ट्रेन के स्लीपर क्लास में । कहीं भी चल दिए, किसी भी साहित्य प्रेमी के घर पहुंच गए । उसके पद और हैसियत से नहीं, पारिवारिक परिवेश से सरोकार रखना बाबा का ध्येय था । इसलिए देश भर में ऐसे व्यक्तियों की संख्या अनगिनत हैं, जिनके पास बाबा के साथ बिताए क्षणों और अनुभवों के संस्मरण हैं । बाबा नागार्जुन के संपर्क में जो भी आए, जिनका भी बाबा से अंतरंग संबंध बना उसके जीवन में बाबा अमिट छाप छोड़ गए ।
बाबा नागार्जुन कदाचित् इस माएने में भी अद्वितीय थे कि वैसे तो हर उम्र के व्यक्तियों के साथ रम जाते थे, मगर युवकों के बीच बैठना ज्यादा पसंद करते थे । समाज की बुर्जआ सोच कहीं से भी नहीं उन्हें छू पायी थी । उनकी कविताएं भी बुर्जुगों से ज्यादा युवाओं के बीच लोकप्रिय हुई हैं । कहीं किसी के घर रहते हुए या कॉफी हाउसों में भी बाबा नागार्जुन नौजवानों से घिरे रहते थे ।
बाबा के साथ गुजारे दिनों और आत्मीय संसर्ग के मेरे पास की कुछ संस्मरण हैं । कई अवसर आए, जब बाबा नागार्जुन ने अपने निराले व्यक्तित्व की अनूठी यादें छोड़ी । वो अदभुत स्मृतियां मानस पटल पर आज भी ऐसे अंकित है मानो हाल-फिलहाल की बात हो । बिना किसी प्रयास के यह धरोहर तरोताजा बनी हुई है । मैं यह दावा तो नहीं कर सकता कि ऐसा अनुभव सिर्फ मुझी को प्राप्त हुआ है । हो सकता है, अन्य महानुभावों के पास भी हो । क्योंकि बाबा का संबंध सरोकार काफी विस्तृत और देशव्यापी था । एक यात्रा पूरी करने के बाद कहीं किसी के यहां पड़ाव डाले हुए बाबा अगली यात्र की तैयारी में जुटे रहते थे । मैथिली साहित्य में बाबा नागार्जुन ‘यात्री’नाम से ही प्रसिद्ध हैं । चिट्ठी पत्री लिखने का सिलसिला तो बाबा की दिनचर्या का एक हिस्सा था ।
बाबा से जुड़ा मेरा संस्मरण संभव है, पाठकों को थोड़ा भिन्न लगे । क्योंकि मुझे बचपन से लेकर पढ़ाई पूरी करने और पत्रकार बनने तक बाबा के संसर्ग में रहने का सौभाग्य मिला है । मेरा संबंध दरअसल नागार्जुन चचा से था । क्योंकि वे मेरे स्वतंत्रता सेनानी पिता श्री बहादुर खां के अनन्य मित्र थे । साहित्य पुरोधा बाबा नागार्जुन से मेरा परिचय बहुत बाद में हाईस्कूल की पढ़ाई करने के बाद हुआ ।
इस बैग्राउंड को ध्यान मे रखते हुए अब आते हैं सीधे मुद्दे पर । बात 1978-79 की है, जब मैं पटना यूनिवर्सिटी से राजनीतिशास्त्र में एम॰ ए॰ कर रहा था । साहित्यिक माहौल मुझे पारिवारिक विरासत में मिला था । पिता साहित्य और संस्कृत शास्त्र के मर्मज्ञ । बड़े भाई रामचन्द्र खान आईपीएस अधिकारी होने के बावजूद साहित्य चिंतक । भाभी उषाकिरण खान । बाबा नगार्जुन उन दिनों दिल्ली प्रवासी हो गये थे, लेकिन उनका पटना आना-जाना हमेशा लगा रहता था । पटना में बाबा के रहने-ठहरने के कई स्थान थे । लेकिन वे प्रायः मेरे बड़े भाई के आवास में पहुंचते थे और ज्यादा समय वहीं रहते थे । उस आवास में भी बाबा नागार्जुन मेरे कमरे में ही सोना पसंद करते थे । मेरे वाले कमरे में ही बाबा के लिए एक चौकी पर बिस्तर लगा दिया जाता था । रात को सबके सो जाने के बाद हमारी रात की बात शुरू होती थी । विभिन्न प्रादेशिक भाषाओं के गीत रेडियो पर सुनने के बाद बाबा सो जाते हैं । दमा पीड़ित होने के कारण सांस फूलने पर बाबा जगते हैं और बलगम इधर-उधर नहीं फेंककर एक अखबार में लपेटकर बिस्तर के नीचे डालते जाते हैं । सुबह मैं उसे फेंक दिया करता हूं । रात के डेढ़-दो बजे जगकर मसहरी में टॉर्च जलाकर लिखते मैंने बाबा को कई बार देखा । मेरी नींद में बाधा न पड़े, इसलिए लाईट की स्विच नहीं दबाते थे । कभी-कभी ऐसा भी हुआ, जब बाबा ने कविता लिखकर रात में ही जगाकर मुझे सुनाया ।
बाबा को बाएं हाथ में टॉर्च जलाए लिखते समय मेरी नींद खुलती है और मैं देखकर फिर सो जाता हूं । उनसे कभी नहीं पूछा कि लाईट जला दूं या नहीं । ज्यों ही मैं सोता हूं कि बाबा जगाते हैं - उठो, बहुत सोते हो, आज तो तुम सबेरे सो गए थे, सुनो - ‘खेतों में बंदूकें बनती टके सेर तो बम बिकता है ..........., पर में घुसकर क्या लिखता है .......... आधी-अधूरी ये पंक्तियां मैंने आंखें मलते झुंझलाते हुए सुनी और फिर लेट गया । बाबा ने बताया कि ये कविता उन्होंने नक्सलियों के खूनी आंदोलन की प्रतिक्रिया में लिखी । इस कविता से कई पाठक परिचित होंगे । यहां मेरा मकसद बाबा नागार्जुन के साहित्य की नहीं, उनके सृजन संसार के अन्य रोचक पहलुओं की चर्चा करना है । अगले दिन फिर से बाबा ने अर्ध रात्रि के बाद जगाया और गंभीर स्वर में सुनाया - ‘महासिद्ध मैं नागार्जुन ............. फिर हम दोनों बाहर निकलकर टहलने लगे । बाबा के मुंह से उच्चरित दिव्य ज्ञान मैं चुपचाप धैर्यपूर्वक सुनता रहा - ‘शब्द ब्रम्ह है, तुम्हारे मन में दिमाग में उत्पन्न भाव अमरत्व प्राप्त होते हैं । वही भाव शब्दों में उभरते हैं । भाव या विचार शब्दों की अविनाशी लड़ी है, जो पनपती है, परंतु मरती नहीं है । विचार मेघ की तरह घुमड़ते रहते हैं, जबतक व्यक्त होकर बरसेंगे नहीं तुम्हारे मन में गर्जन करते रहेंगे’ । फिर बाबा ने मेरे जन्म से पहले लिखी प्रसिद्ध कविता की पंक्ति - ‘बादल को घिरते देखा है .......... मेघ बजे धिन धिन’सुनाते हुए कहा कि ये भाव मेरे मन को काफी समय तक आच्छादित किए रहे, बाहर बरसने के बाद मुक्ति मिली ।’बाबा और हम उतनी रात को टहलते रहे । संस्कृत के प्रकांड पंडित बाबा के मुंह से वेदवाक्य निकलते रहे और मैं चुपचाप आशीर्वचन हृदयंगम करता रहा । बाबा आगे बोले - ‘यह दिमाग बर्तन की तरह है, जितना मांजोगे, उतना ही चमकेगा । ब्रम्ह रूपी इस दिमाग को जितना ज्यादा खुरचोगे, उतना ही दीप्त होगा । मैं समाज की कुरीतियां खरोंचने के लिए अपनी आर्थिक समस्या के बजाए सृजन की उलझन में दिमाग को उलझाए रखता हूं ।’
मेरी छिटपुट कविताएं छपी थीं और अखबारों में लेख नियमित छपने लगे थे । बाबा सब पढ़ लेते थे । उसके आधार पर बाबा नागार्जुन ने रात को ही सीख दी - ‘तुम्हारे गद्य लेखन में प्रवाह है, कविता में बीच-बीच में ठहराव आ जाता है, जो ठीक नहीं है । इसलिए लेख पर केंद्रित करो, तुम्हारे लिए सफल गद्यकार बनना आसान है ।’और मैं अखबारी लेखन और पत्रकारिता के रास्ते पर चल पड़ा । जब कदम बढ़ाया तो पीछे मुड़कर देखने की नौबत नहीं आयी ।
बाबा के साथ मध्य रात्रि संवाद के कई यादगार प्रसंग हैं । सबको समेटें तो पूरी पोथी तैयार हो जाएगी । लेकिन यहां सीमित समय और शब्दों में उन चंद पलों का जिक्र कर रहा हूं जो बाबा के काव्य कर्म का प्रथम या रात के दूसरे पहर के भाग्यशाली श्रोता के रूप में गुजरे ।
बाबा नागार्जुन ने अधोरपंथ से मिलता-जुलता जीवनवृत्त अपनाया था । न वे नहाते थे, न दांत साफ करते थे । कपड़े या बिस्तर की साफ-सफाई की भी परवाह नहीं करते थे । बाबा नास्तिक नहीं थे, पर पूजा-पाठ पोंगा पंडित में भरोसा नहीं करते थे । बाबा वामपंथी रूझान के थे, मगर कम्यूनिस्ट नहीं थे । कम्यूनिस्ट कट्टरपंथ से वे चिढ़ते थे । एक रात बाबा ने संस्कृत में लिखे पद्य सुनाए, जो कालिदास रचित महाकाव्य ‘कुमारसंभवम्’सदृश शिव-पावृति विवाह से संबंधित थे । वो कविता मुझे ठीक याद नहीं है । लेकिन बाबा ने बताया था कि उन्होंने इसमें कालिदास की शैली वाले छंद का प्रयोग तपस्यारत पार्वती के सौंदर्य वर्णन के लिए किया है । बाबा का ‘भस्माकुंर’प्रबंध काव्य उसी उपजाति छन्द पर लिखा गया है ।
बहरहाल, बाबा ने भोजन समाप्त करने के बाद बांग्ला पाठिका की श्रद्धा और आदर से प्रभावित होकर उसके लिए बांग्ला में कविता की दो-तीन पंक्तियों के साथ अपने ऑटोग्राफ दे दिए ।
उन्हीं दिनों साहित्य अकादेमी का वार्षिक पुरस्कार समारोह कवर करने के दौरान तत्कालीन साहित्य अकादेमी सचिव के॰ सच्चिदानंदन से मेरी लंबी बातचीत हुई । बाबा गंभीर रूप से अस्वस्थ रहने लगे थे । मैंने सच्चिदानंदन से आग्रह किया कि बाबा नागार्जुन साहित्य अकादेमी सम्मान प्राप्त साहित्यकार हैं और हिन्दी, मैथिली, बांग्ला के चोटी के गिने-चुने मनीषियों में से हैं । अर्थाभाव के कारण उनका समुचित इलाज नहीं हो पा रहा है । साहित्य अकादेमी की ओर से बाबा के लिए मानदेय की व्यवस्था अगर हो जाती तो बड़ा पुण्य का काम होता । सचिव महोदय ने कहा कि इसके लिए विमर्श किया जाएगा । यह टालनेवाली बात थी । बाबा स्वर्ग सिधार गए, साहित्य अकादेमी मानदेय पर विचार करती रह गयी । शायद अकादेमी ने इसे विचारयोग्य समझा भी न हो । लेकिन उसी साहित्य अकादेमी से 1998 में बाबा की मृत्यु के बाद जब मैंने शोक सभा के लिए जगह मांगी तो तुरंत देने को तैयार हो गया । उस शोक सभा का रोचक और दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह था कि साहित्य अकादेमी के कोई अधिकारी उसमें शामिल नहीं हुए । प्रमुख व्यक्तियों में डा॰ वेदप्रताप वैदिक और दिवंगत प्रभाकर श्रेत्रियजी की उपस्थिति उल्लेखनीय रही । बाबा का देहावसान अपने गृह जिला दरभंगा के मुख्यालय लहेरियासराय में नवंबर, 1998 में हुआ । अंतिम समय तक उनका हालचाल लेने कोई सरकारी गुमाश्ता नहीं गया ।
बिहार सरकार के सर्वोच्च सम्मान राजेंद्र शिखर पुरस्कार बाबा नागार्जुन को प्रदान करने की कहानी सुनिए । मैं उसका प्रत्यक्षदर्शी था चश्मदीद गवाह हूं । उस वक्त बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद थे और मेरा दिल्ली से पटना तबादला हुआ था । ध्यान रहे कि लालू प्रसाद उसी जे पी आंदोलन से उपज नेता हैं, जिसमें भाग लेकर इंदिरा गांधी के खिलाफ कविता पढ़ने के कारण बाबा जेल गए थे । बाबा की तबियत बिगड़ जाने के कारण उनके बड़े पुत्र शोभाकांत जी के साथ जाकर 1975 में इमर्जेंसी में बाबा की अग्रिम जमानत मैंने करायी थी ।
लालू प्रसाद यादव जब बिहार के मुख्यमंत्री थे, उस वक्त बाबा नागार्जुन ज्यादा ही बीमार रहने लगे । शोभाकातंजी दरभंगा में रहते थे, इसलिए बाबा दिल्ली छोड़कर दरभंगा में स्थायी निवास करने लगे । यात्र करने की स्थिति में नहीं थे । घटना 1994 की है । मैं दिल्ली से तबादला होकर पीटीआई भाषा संवाददाता के रूप में पटना ब्यूरो कार्यालय आ गया था । उसी समय बिहार सरकार ने अपना सर्वोच्च साहित्य पुरस्कार राजेन्द्र शिखर सम्मान बाबा को प्रदान करने का फैसला किया ।
पुरस्कार समारोह समाप्त होने के बाद बाबा के साथ मैं राजकीय अतिथि गृह के कमरे तक आया । बाबा ने कुछ खाने की इच्छा व्यक्त की । ब्रेड मंगवाया गया, लेकिन साथ में मक्खन या और कुछ लाने से बाबा ने मना कर दिया । अब आगे का आंखोंदेखा हाल पढ़िए । बाबा च्यवनप्राश का डिब्बा खुलवाते हैं और खुद ब्रेड का पैकेट फाड़ते हैं । ब्रेड का एक स्लाइस हाथ में लेकर अपने से चम्मच से च्यवनप्राश निकालते हैं और मक्खन की तरह, ब्रेड में लगाकर खाने लगते हैं । दूसरे स्लाईस में च्यवनप्राश लगाते हुए बाबा अपने निराले व्यंग्यात्मक अंदाज में टिप्पणी करते हैं - ‘इस च्यवनप्राश का स्वाद तो गजब का है प्यारे, सरकारी है न । च्यवनप्राश तो मैंने खाए हैं । मगर ऐसा कमाल का मजगर स्वाद पहले कभी नहीं मिला । अभिनय में लालू प्रसाद शत्रुध्न सिन्हा का नाना है, देखना लालू की नटलीला इसे दुबारा मुख्यमंत्री बना देगी ।’
लालू का दिया च्यवनप्राश ब्रेड में लगाकर खाते बाबा नागार्जुन
बाबा के साथ-साथ कवि केदारनाथ सिंह और गुणाकर मुले भी सम्मानित किए गए । तीनों को राजभाषा विभाग की ओर से पर्यटन विकास निगम के होटल में ठहराया गया । होटल के कमना नं॰ - 102 में एक चरमराते पलंग पर बैठे 83 वर्षीय बाबा ब्रेड पर च्यवनप्राश लगाते हैं और अपनी व्यंग्यात्मक स्टाईल छेड़ते हैं । लालू समारोह में कहता है - ‘रउआ के जियावे के बाबा, हेतना जल्दी हम जाए ना देब, हई ली च्यवनप्राश के डिब्बा ।’इसके बाद बाबा के उदगार - ‘हां, हड्डी तो गल रही है, अब लालू मेरी खलड़ी (चमड़ी) के लिये मुझे जिन्दा रखना चाहता है । देखों तो च्यवनप्राश किस ब्रांड का है, इतना प्रचार हो रहा है, उसे भुगतान करना चाहिए ।’
कमरे में बाबा से बातचीत के दौरान होटलवाला दो बार बिल के बारे में पूछने आ गया । बाबा के सबसे बड़े पुत्र, शोभाकांतजी के यह कहने पर कि ‘भुगतान राजभाषा विभाग की ओर से किया जाएगा’। बैरा आश्वस्त नहीं होता । थके बाबा को जरा-सी झपकी आयी कि टैक्सी वाला भुगतान मांगने आ गया । बाबा ने अपनी लाचारी बताकर राजभाषा विभाग से पटना आने के लिए वाहन की व्यवस्था करने कहा तो सरकारी गाड़ी की जगह टैक्सी भिजवाकर विभाग ने किनारा कर लिया ।
समाप्त जब बाबा नागार्जुन देर रात कविता सुनाते थे
Baba Nagarjuna